गौ-आतंकियों की करतूत : एक कत्ल और गाय के नाम

भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार के लगभग तीन वर्ष पूर्व सत्ता में आने के बाद से गौरक्षकों की मनमानी और उनकी हिम्मत में जबरदस्त इजाफा हुआ है। उन्हें ऐसा लगता है कि ‘सैयां भए कोतवाल अब डर काहे का‘।...

गौ-आतंकियों की करतूत : एक कत्ल और गाय के नाम
हाइलाइट्स
  • गौरक्षा के नाम पर एक और हत्या
  • भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार के लगभग तीन वर्ष पूर्व सत्ता में आने के बाद से गौरक्षकों की मनमानी और उनकी हिम्मत में जबरदस्त इजाफा हुआ है

राम पुनियानी

हरियाणा के पहलू खान, जयपुर के एक पशु मेले में भैंस खरीदने पहुंचे। उनकी डेयरी है। वे आए तो भैंस खरीदने थे परंतु उन्हें वहां ज्यादा दूध देने वाली एक गाय पसंद आ गई और उन्होंने उसे खरीद लिया। जब वे गाय के साथ अलवर जा रहे थे तब रास्ते में गौरक्षकों ने उन्हें रोक लिया और उनकी जमकर पिटाई लगाई (अप्रैल 5, 2017)। इस पिटाई से पहलू खान की मौत हो गई। जब उन्हें निर्ममतापूर्वक पीटा जा रहा था उस समय वहां पुलिस का कोई अता-पता नहीं था।

पुलिस का कहना है कि गायों के कई तस्करों, जो उसकी निगाह से बच निकलते हैं, को गौरक्षकों द्वारा पकड़ा जाता है।

यह हत्या दिन दहाड़े की गई और हत्यारे इतने दुःसाहसी थे कि उन्होंने घटना की वीडियो क्लिप को सोशल मीडिया पर शेयर किया।

राजस्थान के संबंधित मंत्री ने कहा कि गौरक्षकों द्वारा गाय के तस्करों को पकड़ने में कुछ भी गलत नहीं है, परंतु उन्हें कानून अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए।

भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने तो इस तरह की घटना होने से ही इंकार कर दिया।

ज्ञातव्य है कि पहलू खान के पास गाय की खरीदी की रसीद और उसे हरियाणा ले जाने की अनुमति से संबंधित सभी कागजात थे।

यह गौरक्षा के नाम पर हत्याओं की श्रृखंला में सबसे ताजा कड़ी है।

इसके पहले उत्तरप्रदेश के दादरी में खून की प्यासी एक भीड़, जिसमें कई भाजपाई शामिल थे, ने मोहम्मद अखलाक की इस आरोप में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी कि उनके घर में गौमांस रखा है।

हमारे देश की पुलिस कितनी साम्प्रदायिक हो गई है यह इससे जाहिर है कि मौहम्मद अखलाक के परिजनों पर ही गौहत्या का मुकदमा कायम कर दिया गया और पहलू खान के विरूद्ध गाय की तस्करी करने के आरोप में प्रकरण दर्ज किया गया है।

हम सभी को गुजरात के ऊना की घटना याद है, जहां कुछ दलितों की मरी हुई गाय की खाल उतारने के आरोप में निर्ममतापूर्वक पिटाई लगाई गई थी।

भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार के लगभग तीन वर्ष पूर्व सत्ता में आने के बाद से गौरक्षकों की मनमानी और उनकी हिम्मत में जबरदस्त इजाफा हुआ है। उन्हें ऐसा लगता है कि ‘सैयां भए कोतवाल अब डर काहे का‘।

इस संबंध में कानून क्या कहता है? काफिला डाट इन में रजनी के. दीक्षित हमें बतातीं हैं कि ‘‘भारत के संविधान में गौहत्या पर प्रतिबंध, राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है। ये नीति निर्देशक तत्व, राज्य और केन्द्र सरकारों को नीति निर्धारण में पथप्रदर्शन के लिए हैं और इन्हें किसी अदालत द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता।

गौहत्या के संबंध में संविधान का अनुच्छेद 48 कहता है

‘राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियो से संगठित करने का प्रयास करेगा। और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा‘‘‘।

(https://kafila.online/2017/04/04/bovines-india-and-hinduism-rajani-k-dixit/ )

यह स्पष्ट है कि यह प्रतिबंध केवल दुधारू मवेशियों पर लागू होता है अन्यों पर नहीं।

यह भी साफ है कि संविधान, गौहत्या के प्रतिषेध की वकालत आर्थिक और पर्यावरणीय उद्धेश्यों से करता है, धार्मिक से नहीं। भाजपा-आरएसएस के सत्ता में आने के बाद से भाजपा-शासित राज्यों में गौरक्षा के लिए अत्यंत कठोर कानून बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा, इन राज्यों की सरकारों के दबाव में वहां की पुलिस इन पहले से ही अत्यधिक कठोर कानूनों की गलत व्याख्या कर रही है और निर्दोष लोगों को फंसाया जा रहा है।

यह स्पष्ट है कि जो कानून बनाए जा रहे हैं वे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों की भावना के प्रतिकूल हैं।

ये कानून केवल गाय, न कि सभी दुधारू पशुओं के वध को प्रतिबंधित करते हैं और इनके पीछे आर्थिक नहीं बल्कि धार्मिक कारण हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि उनकी सरकार गौहत्या करने वालों को फांसी पर लटकाएगी।

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी चाहते हैं कि गौहत्या की सजा आजीवन कारावास हो। उन्होंने यह संकल्प भी लिया है कि वे गुजरात को पूर्णतः शाकाहारी राज्य बनाएंगे।

योगी आदित्यनाथ गौहत्या के विरोधी तो हैं ही (वैसे भी यह उत्तरप्रदेश में प्रतिबंधित है), वे तो मटन और चिकन बेचने वालों के भी दुश्मन हैं। दादरी घटना के बाद योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं को बंदूकें उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव किया था।

योगी से प्रेरणा लेकर उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और राजस्थान की भाजपा सरकारें भी पशुवधगृहों और मांस की दुकानों के खिलाफ तरह-तरह की कार्यवाहियां करने की योजनाएं बना रही हैं।

परंतु भाजपा के गौप्रेम का एक दूसरा पक्ष भी है।

केरल के मल्लापुरम से भाजपा प्रत्याशी एन. साईंप्रकाश ने यह वायदा किया है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो वे अपने चुनाव क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता के गौमांस की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएंगे। उनके अनुसार, ‘‘भाजपा को गौमांस भक्षण से कोई आपत्ति नहीं है, वह तो केवल गौहत्या के खिलाफ है! उसने किसी राज्य में गौमांस भक्षण पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। भाजपा यह मानती है कि सभी को अपनी पसंद का भोजन करने का पूरा हक है‘‘।

केरल और उत्तर-पूर्वी राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने गौरक्षा के मुद्दे को भूलकर भी नहीं उठाया। असम में तो उसने यह वायदा किया कि वह लोगों के खानपान में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।

योगी आदित्यनाथ के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद से दो मुद्दों पर जबरदस्त ढंग से जुनून भडकाया जा रहा है। पहला है गौरक्षा और दूसरा, मांसाहार। मांसाहार करने वालों का खलनायकीकरण किया जा रहा है और मटन और चिकन के व्यापारियों को बेइंतहा परेशान किया जा रहा है। बंगाल में मछली के उपभोग की निंदा की जा रही है। गुजरात में तो सरकार इस तैयारी में है कि सभी नागरिक केवल साग-सब्जी खाएं।

क्या यह धार्मिक मुद्दा है? कतई नहीं।

इस मुद्दे पर ‘काऊ बेल्ट‘ (उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश) में भाजपा की भाषा अन्य राज्यों (केरल, गोवा, कश्मीर और उत्तरपूर्व) से एकदम भिन्न है।

‘काऊ बेल्ट‘ से इतर क्षेत्रों में वह स्थानीय लोगेां की खानपान की संस्कृति का सम्मान करने की बात कहती है। परंतु क्या जिन राज्यों में तथाकथित गौरक्षक हुड़दंग मचा रहे हैं, वहां लोगों की खानपान की आदतों में विविधता नहीं है? जाहिर है कि इन क्षेत्रों में भी लोगों की खानपान की अलग-अलग आदतें हैं। गौरक्षक जो कुछ कर रहे हैं वह भारतीय संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों के खिलाफ है। यह आरएसएस-भाजपा के और ब्राम्हणवादी मूल्यों को पूरे देश पर थोपने का प्रयास है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि इस सबके भयावह आर्थिक नतीजे होंगे। देशभर में विभिन्न स्थानों पर पशु मेलों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं और पशुपालकों व पशुओं का व्यापार करने वालों के साथ क्रूर हिंसा की जा रही है। इससे मांस का निर्यात घटेगा और डेयरी चलाने वाले किसान बर्बाद हो जाएंगे। 

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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