गौ रक्षा के नाम पर अत्याचार और लूट को रोके सरकार

​​​​​​​कुत्ते पालने वाले अचानक गाय माता के नाम पर घृणा क्यों फैला रहे हैं ?  क्या सरकार का एजेंडा दूध की पूरी ठेकेदारी अम्बानी और अडानी को देने की तो नहीं है ? ...

Vidya Bhushan Rawat

विद्या भूषण रावत

एक अप्रैल को राजस्थान के 'गौभक्तों'' ने अपनी 'देशभक्ति'' का परिचय देते हुए एक निरपराध किसान को राष्ट्रीय राजमार्ग अलवर बहरोड़ रोड में बेरहमी से मार डाला। उसका कसूर सिर्फ इतना के वह गाय पालने वाला मुसलमान था और जयपुर से दो नयी गायें खरीदकर अपने दूध के कारोबार को बढ़ाना चाहता था।

मेवात के नूह ब्लॉक के जैसिंहपुर गाँव में पहलू खान की दूध डेयरी में लगभग 15 भैंसे और 4 गाय हैं।

रमजान से पूर्व दूध की जरूरतों को दूर करने के लिहाज से पहलू अपने दो बेटों इरशाद, आरिफ और अन्य साथियों अजमत के साथ जयपुर के सरकारी पशु हटवाड़े से गाय खरीदकर ला रहे थे और उनके पास खरीद से लेकर अन्य सभी जरूरी बातों की प्रशासनिक रिसीप्ट थी।

पहलू खान की दूध डेयरी गुड़ग़ांव फरीदाबाद में एक दिन में लगभग दो कुंतल दूध सप्लाई करती थी।

शर्मनाक बात यह है कि हमलावरों ने उसके ड्राइवर अर्जुन को छोड़ दिया और पहलू खान और उसके सहयोगी अजमत को बर्बरता से पीटा।

अर्जुन को हिन्दू होने के नाते छोड़ दिया गया। पुलिस ने 24 घंटे तक इन्हें थाने में परेशान करके रखा जिसके फलस्वरूप पहलू खान की मौत 3 अप्रैल को अस्पताल में हो गयी और अजमत अपने जीवन को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विषय में अपना मुंह तक नहीं खोला है हालाँकि उनके गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि गौ रक्षकों को उन्हें मारना नहीं चाहिए था। उन्होंने कहा कि पुलिस जांच कर रही है।

इधर एक बड़े पुलिस अधिकारी ने कहा कि पहलू खान गौतस्कर था। सबसे पहले तो ये सारी बाते झूठ साबित हो चुकी हैं और दूसरे यह कि कौन व्यक्ति गौतस्कर है और कौन ईमानदार इसके लिए एक व्यवस्था बनी हुयी है और इसकी जिम्मेवारी गौरक्षकों के स्वयंभू ठेकेदारों के ऊपर नहीं है। किसी को सरेआम सड़क चलते बेरहमी से मार डालना धर्म के नाम पर हिंदुत्व के लोगों के तालिबानीकरण की ओर इशारा करता है।

यदि पहलू खान गौ तस्कर था, तो पूरे केस में उसके साथी ड्राइवर अर्जुन को क्यों छोड़ दिया गया। बीजेपी नेताओं और सरकार की तरह मीडिया भी बिना जांच पड़ताल के बेशर्मी से पहलू खान के लिए गौतस्कर शब्द का इस्तेमाल कर रहा है।

एक बात बहुत जरूरी है और वो इसलिए क्योंकि यदि सड़क पर अफवाहों के चलते हरेक गुंडा मवाली अगर सड़कों पर सही गलत का निर्णय देने लगे तो देश में लोकतंत्र को बचा के रखना मुश्किल हो जायेगा।

मुझे ये बात कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि पहलू खान और उनके साथियों ने कानून का कोई उल्लंघन किया है तो उन पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत कार्यवाही हो, लेकिन उनके हत्यारे और लुटेरे क्यों अभी तक खुले में घूम रहे हैं ? आखिर पुलिस और प्रशाशन किस बात का इंतज़ार कर रहा है ?

शर्मनाक बात यह है कि मृतक के हत्यारों को पकड़ने हेतु न पुलिस ने कोई कार्यवाही की न ही भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस प्रश्न को गंभीरता से लिया क्योंकि संसद में मुख़्तार अब्बास नक़वी ने तो इस घटना के होने तक से इंकार कर दिया। पुलिस ने पहलू और अजमत के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है।  

गाय के नाम पर डकैती और गुंडागर्दी करने वालो ने उनकी दो गायें और लगभग 70 हज़ार रुपैये, उनकी गाड़ी छीन ली और पुलिस ने इस छिनैती के विरद्ध कोई कार्यवाही नहीं की।

हमारे प्रधानमंत्री जी दुनिया भर में आतंक की घटनाओं पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लेकिन भारत के अंदर आतंकवाद पर अपनी चुप्पी साधे हुए हैं जो गौ-रक्षा के नाम पर स्वयंभू संगठनों और संस्थाओं के द्वारा मुसलमानों और दलितों के साथ किया जा रहा है।

सरकार और राजनेताओं ने पहलू खान के परिवार के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अखिल भारतीय किसान महासभा ने उनकी माँ को तीन लाख रुपए का चेक दिया।

इस अवसर पर घायल अजमत के इलाज़ के लिए भी पचास हज़ार रुपए का एक चेक अखिल भारतीय किसान महासभा ने दिया।

ये बात अच्छी लगी कि भारत के किसानों को समझ आ रहा है कि कुत्ते पालने वाले अचानक गाय माता के नाम पर घृणा क्यों फैला रहे हैं। ये साफ़ तौर पर किसानों को ख़त्म करने की साजिश है। आज गौशालाओं पर कोई सीलिंग कानून लागू नहीं होता और बड़े बाबाओं और महंतों पूंजीपतियों के साथ मिलकर साजिश की है ताकि किसान गाय पालना स्वयं ही छोड़ दे। ऐसी परिस्थितयां पैदा की जा रही हैं।

सरकार बताए कि बूढ़ी गाय भैंसों का किसान क्या करे ? अगर वो उसको नहीं दे पाए तो उसको खिलाने के लिए खर्च किसान के पास नहीं है।

गाँव के गौचर, चरागाह तो सरकार और दबंगों ने या तो कब्ज़ा किये हुए हैं और या वो बड़ी कंपनियों को दिए जा रहे हैं। गाय भैंसो के लिए चारे पर भी कोई छूट नहीं है।

सरकार बताये कि गाय भैंसों को बचाने और उपयोगी बनाने के लिए वो किसानों की क्या मदद करेगी। क्या सरकार का एजेंडा दूध की पूरी ठेकेदारी अम्बानी और अडानी को देने की तो नहीं है ?

जिस बीफ को लेकर इतना हंगामा है भारत उसका सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है। सरकार को भारत की बीफ उद्योग पर एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए कि इस उद्योग में शामिल मुख्य उद्योगपति कौन हैं। क्या सरकार तीस हज़ार करोड़ की इस इंडस्ट्री को ऐसे ही चलाती रहेगी और क्या बीफ निर्यात से हिन्दुओ और हिन्दू धर्मगुरुओं की कोई भावना आहत नहीं होती ? क्या भावनायें तभी आहत होती हैं जब कोई अल्पसंख्यक-दलित इससे जुड़ा हो ?

मेवात के मेव किसान अन्य साथियों के साथ मिलकर आंदोलन का मन बना चुके हैं। वे कह रहे हैं अपने सारे मवेशियों के साथ जिला कलेक्टर के घर पर आंदोलन करेंगे और न्याय मांगेंगे। जो लोग गाय भेंसो की सेवा में लगें है उन्हें अपराधी बनाकर दोषियों को बचाने की खुलेआम कोशिश भारतीय संविधान की अवमानना है। चाहे वो झज्जर के दलितों की हत्या का मामला हो, या ऊना का, अख़लाक़ की हत्या हो पहलू खान की, इससे शर्मनाक बात क्या होगी कि अफवाहों को बाजार गर्म कर निर्दोषों को एक घृणित मानसिकता के तहत मारा गया है और बेहद चालाकी से बहस बदलने के लिए निर्दोषों को तस्कर बना दिया जाता है या पुलिस इस बात की जांच करती है कि अख़लाक़ के फ्रिज में क्या था जबकि हत्यारे खुले में घूमकर देशभक्ति की 'राजनीति' कर रहे हैं।

हिन्दुओं और मुसलमानों का साथ जन्मजन्मांतर का है। दोनों ने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है। भला भी और बुरा भी। दोनों आज़ादी की लड़ाई में साथ भी थे और विभाजन के वक़्त दोनों ने एक दूसरे का कत्लेआम भी किया है। लेकिन ये भी हकीकत है कि मुसलमानों की बड़ी तंजीमो ने विभाजन के खिलाफ बात की।

विभाजन एक बहुत बड़ी त्रासदी थी जिसने लाखों परिवारों को बर्बाद किया और उससे यही सीखा जा सकता है कि हिन्दू और मुसलमानों का विभाजन असंभव है। जब कोई बात असंभव है तो फिर क्या होना चाहिए। दोनों के पास साथ रहकर, एक दूसरे से साथ प्यार मोहब्बत के अलावा रहने के कोई चारा नहीं। दोनों बड़ी राजनीति का शिकार हुए और अभी भी दोनों धार्मिक धंधेबाज़ों का शिकार होते हैं और धर्म की पट्टी आँख में बांधकर अफवाहों को फ़ैलाने और उन पर विश्वास करने में माहिर हैं। भारत और पाकिस्तान की सरकारें अपने यहाँ पनप रहे इस धार्मिक अल्पसंख़्यकों की विरोधी मानसकिकता को रोकने में नाकामयाब रही हैं। धर्म का धंधा करने वाले अफवाहों का बाजार गर्म कर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं लेकिन जनता को अब सावधान रहने की जरुरत हैं.

अभी अप्रैल 13 को पाकिस्तान के मरदान शहर में अब्दुल वली खान विश्विद्यालय में पत्रकारिता के एक होनहार छात्र मशाल खान को उसके दोस्तों ने बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला। विश्वविद्यालय के गेट पर इकट्ठा हुए छात्रों को लगा कि मशाल ने इस्लाम और मोहम्मद साहेब की तौहीन की है जब कि मशाल खुद को एक मानवतावादी कहता था और वो कहता था कि आप हमें दूसरे सम्प्रदाय के प्रति घृणा करने वाला न बनाओ। वो पाकिस्तान की उन औरतों को सलाम करता था जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने वज़ूद की लड़ाई लड़ रही हैं। ऐसा व्यक्ति जो इंसान के हकों के लिए परेशान हो उससे धर्म के नाम पर धंधेबाज़ तो परेशान होंगे ही।

भारत और पाकिस्तान में ऐसे पाखंडी एक दूसरे के खिलाफ आग उगलकर अपनी राजनीति को मज़बूत करते हैं इनके कारण निर्दोष मारे जाते हैं।

मशाल की बेरहम हत्या के बाद विश्वविद्यालय ने उन्हें ईशनिंदा के आरोप में विश्वविद्यालय से निष्काषित कर दिया। ऐसा उन ताकतों के दवाब में जो पूरी बहस को आरोपियों से हटाकर केस ख़त्म कर देना चाहते हैं।

हिन्दू मुसलमान खतरे में नहीं हैं। खतरा इंसानियत को है क्योंकि धर्म के नाम पर सियासत करने वाले लोग आम जनता के सवालों पर कुछ नहीं बोलेंगे। दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले महीने से तमिलनाडु के किसान धरना प्रदशन कर रहे हैं लेकिन सरकार को फुरसत नहीं है।

किसान की हालत ख़राब है और हर दिन कोई न कोई आत्महत्या हो रही है, लेकिन हम चुप हैं, हमारे सामने सैकड़ों सवाल खड़े हैं जिस पर हमारे हुक्मरानों को सोचना चाहिए, लेकिन मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी खेलकर वे अपनी राजनीति को चमका रहे हैं। अख़लाक़ के साथ अभी तक न्याय नहीं हुआ है और ऐसी कई और घटनाएं हो चुकी हैं।

गौ सुरक्षा कानून पूरे देश में लागू हो चुका है और जैसे कि गुजरात के कानून से पता चल रहा है अब सजा भी आजीवन कारावास और पांच लाख का जुरमाना यानी किसी के भी बाहर निकलने का कोई मौका नहीं।

पाकिस्तान में तानाशाह जिआउल हक़ ने ईश निंदा कानून के तहत सजाये मौत का इंतज़ाम कर दिया और आज यही कानून वहाँ अल्पसंख्यंकों हिन्दू, ईसाई, समलैंगिक, शिया और अहमदी लोगो के विरुद्ध इस्तेमाल हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की आलोचना हो रही है क्योंकि सरकार की आलोचना करने वालों को ये कानून आसानी से चपेट में ले रहा है। सरकार के राजनैतिक विरोधियों और अकलियतों की जमीन और सम्पदा हड़पने के लिए भी इस कानून के नुस्खे अपनाये जा रहे हैं। ऐसा लगता है भारत में इस हिन्दू पुनर्जागरण काल के राष्ट्रवादी गौरक्षा के नाम पर पाकिस्तानी ईशनिंदा कानून यहाँ लगाना चाहते हैं ताकि पाकिस्तान की ही तरह हम भी अपनी अकलियतों को कानून की आड़ में परेशान कर सकें।

स्वतंत्र भारत का संविधान बाबा साहेब आंबेडकर ने बनाया जिसमें सभी को उनकी जाति धर्म से ऊपर हटकर बराबरी का अधिकार मिला है।

आज आवश्यकता इस बात की है हम न केवल अपना संविधान बचायें अपितु भारत को पाकिस्तान होने से भी बचाये क्योंकि इसकी ताकत उसकी रहन, सहन, भाषायी और धार्मिक विविधिता के कारण ही है।

धर्म की आड़ में किसी भी व्यक्ति पर हिंसा या प्रताड़ना सीधे सेक्युलर संविधान पर हमला है।

उम्मीद है सरकार, राजनैतिक दल, मीडिया और आम जन अपनी जिममेवारी ठीक से निभाकर समझदारी का परिचय देंगे। निर्दोष को समय पर न्याय मिल सकेगा तो ये लोकतंत्र मज़बूत होगा और यदि हमले जारी रहे तो स्थिति बहुत भयवाह हो सकती है। पूरी दुनिया हमारी ओर देख रही है और एक भी गलत कदम भारत की अंतर्राष्ट्रीय साख पर भी बट्टा लगा सकती है इसलिए असामाजिक तत्वों से कठोरता से निपटने का समय आ गया है।

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