क्या ऐसा आडवाणी को राष्ट्रपति पद से दूर रखने के लिए हुआ?

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के बुधवार को आए अहम फैसले को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले आगामी चुनाव के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है।...

तेजवानी गिरधर

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के बुधवार को आए अहम फैसले को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले आगामी चुनाव के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया तो इस सवालों से अटा पड़ा है कि क्या ऐसा पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को इस पद की दौड़ से अलग करने के लिए किया गया है?

उल्लेखनीय है कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत 12 नेताओं पर आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने के आदेश हुए हैं और दूसरी ओर आडवाणी राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार माना जाते हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, ऐसे में मूल रूप से इस तरह का सवाल बेमानी है, मगर पिछले सालों में सीबीआई की भूमिका को लेकर जिस तरह से प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं, इस कारण लोगों को इस तरह की संभावना पर सहसा यकीन भी हो जाता है।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने तो बाकायदा अपने बयान में ऐसा कह ही दिया, जिसकी प्रतिक्रिया में भाजपा के रविशंकर प्रसाद की ओर से इतना भर जवाब आया कि वे खुद व खुद के परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर ध्यान दें।

एक बात और। वो यह कि इस फैसले से यह संदेश भी तो गया ही है कि सरकार सीबीआई व सुप्रीम कोर्ट के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती, भले ही भाजपा के दिग्गजों का मसला हो।

ज्ञातव्य है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी सरीखों को जिस तरह से मार्गदर्शक मंडल के नाम पर हाशिये पर रख छोड़ा गया है, पार्टी के अधिसंख्य लोगों के लिए यह तकलीफ है कि जिन नेताओं ने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है, उनकी यह दुर्गति ठीक नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह एक तानाशाह की तरह मजबूत बने हुए हैं, उनको पार्टी में कोई चुनौति देने वाला नहीं है, मगर फिर भी आडवाणी व जोशी जैसे नेताओं के कुछ न कुछ गड़बड करने का अंदेशा बना ही रहता है। इस कारण पार्टी के भीतर इस प्रकार की राय बनाई जाने लगी कि आडवाणी को राष्ट्रपति बना कर उपकृत कर दिया जाए। इससे वह काला दाग भी धुल जाएगा कि पार्टी में वरिष्ठों को बेकार समझ कर अलग-थलग कर दिया जाता है। मगर साथ यह भी ख्याल रहा कि अगर आडवाणी सर्वोच्च पद पर बैठा दिए गए तो कहीं वे सरकार के कामकाज में दिक्कतें न पैदा करते रहें। चाहे कुंठा की वजह से ही, मगर आडवाणी का इस प्रकार का स्वभाव सामने आता रहा है। कदाचित प्रधानमंत्री मोदी की भी यही सोच हो, इस कारण उन्हें उलझा दिया है, ताकि उन्हें राष्ट्रपति बनाने का जो दबाव बन रहा है, उसकी हवा निकल जाए।

इसी सिलसिले में पिछले दिनों जिस तरह से संघ प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की मांग उठी है, उसे भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है, ताकि आडवाणी के नाम से ध्यान हटे।

ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों मुस्लिम युवा आतंकवाद विरोधी समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष शकील सैफी ने अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हाजिरी दे कर यह दुआ मांगी कि भागवत को राष्ट्रपति बनाया जाए। अगर मुस्लिम ही हिंदुओं के शीर्षस्थ नेता को राष्ट्रपति बनाने की मंशा जाहिर करें तो वह वाकई चौंकाने वाला था। जियारत की प्रस्तुति से ही लग रहा था कि यह सब प्रायोजित है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से सब भौंचक्क हैं। हर कोई अपने हिसाब से आकलन कर रहा है। कुछ का कहना है कि ऐसा उन नेताओं को शिकंजे में रखने के लिए किया गया है, जिनकी राम मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका है और इसी वजह पार्टी में उनकी अलग ही अहमियत रहती है। मोदी कभी नहीं चाहते कि बुरे वक्त में पार्टी को खड़ा करने वाले अपने बलिदान के नाम पर उन पर किसी प्रकार कर दबाव बनाए रखें। बतौर बानगी इन्हीं में से एक उमा भारती का बयान देखिए वे तो कह रही हैं कि बाबरी विध्वंस के लिए साजिश का तो सवाल ही नहीं उठता, जो कुछ हुआ खुल्लमखुल्ला हुआ। उन्हें तो गर्व है कि वे मन, वचन व कर्म से राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई रही हैं। है न बिंदास तेवर। 

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