खतरनाक इशारे योगी राज के

उत्तर प्रदेश को एक खतरनाक तजुर्बे से गुजरना होगा। उसने ऐसा ही एक तजुर्बा नव्बे के दशक के शुरू में कल्याण सिंह के राज में झेला था, जिसकी परिणति बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई थी...

0 राजेंद्र शर्मा

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दीख जाते हैं।

यूपी में  योगी राज की धमाकेदार शुरूआत से ही कम से कम इसका इशारा तो मिल ही जाता है कि इस राज की दिशा क्या है।

सरकार बनते ही नये राज ने चार चीजें बंद कराने का एलान किया है--वीआइपी लालबत्ती, दफ्तरों में पान-गुटखा, शहरों में कट्टीखाने और सड़कों पर रोमियो।

वैसे उत्तर प्रदेश के नये मुख्यमंत्री ने लोकसभा में अपने विदाई भाषण में और भी बहुत कुछ बंद कराने की बात कही थी, हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस सूची में और क्या-क्या आने जा रहा है।

खैर! सबसे पहले इन्हीं चार चीजों के बंद किए जाने से योगी राज की प्राथमिकताओं का कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है। इनमें भी लाल बत्ती के बंद किए जाने का किसी ने शायद ही कोई नोटिस लिया है।

                आदित्यनाथ के गेरुआ वेष और उनकी अब तक की ख्याति को देखते हुए, उनके राज की ऐसी प्राथमिकताएं स्वाभाविक लग सकती हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए भाजपा के घोषणापत्र का भी ऐसी प्राथमिकताओं से कोई झगड़ा नहीं है। उल्टे ये सभी प्राथमिकताएं घोषणापत्र में बाकायदा और पर्याप्त प्रमुखता के साथ मौजूद थीं। इसलिए, यह दलील भी दी जा सकती है और वास्तव में दी जाने लगी है कि चुनावी वादे पूरे करने की योगी सरकार की तत्परता प्रशंसनीय है।

...लेकिन, पूत के पांव दिखाई दे रहे हैं और सांप्रदायिक स्वर रखने वाली मुहिम को जिस तरह चलाया जा रहा है उसमें दिखाई दे रहे हैं। और इस सचाई में भी कि किसानों की कर्जमाफी तथा गन्ना किसानों के बकाया दिलाने समेत बाकी सब वादे तो अभी इंतजार कर सकते हैं। पर कट्टïीखानों तथा रोमियो के खिलाफ मुहिम नहीं।

                अचरज नहीं कि इन दोनों मुहिमों की ही खासतौर पर चर्चा है। पान-गुटखा बंदी तो जैसे सिर्फ इस सब पर ‘‘स्वच्छता’’ की चिंता का आवरण डाले जाने के लिए ही है। वैसे इन दोनों अभियानों पर शोर मचने के बाद,

 सरकार की तरफ से इन दोनों मामलों में कई स्पष्टीकरण भी दिए गए हैं। कट्टीखानों के विरुद्ध मुहिम के सिलसिले में बीच-बीच में यह याद दिला दिया जाता है कि यह मुहिम अवैध कट्टीखानों के खिलाफ है।

वैसे इसमें थोड़ा कन्फ्यूजन भी बनाए रखा जा रहा है, क्योंकि भाजपा के चुनाव प्रचार में तथा घोषणापत्र में भी, मशीनीकृत बूचडख़ानों के बंद कराए जाने की बात थी। यह छोटे या घरेलू पशु वध या छोटे कारोबार और जाहिर है कि दुकानों को भी कम से कम औपचारिक रूप से पाबंदी के दायरे से रखता था।

अवैध-बूचडख़ानाविरोधी मुहिम के नाम पर इस तर्क को ही पलट दिया गया है। और बाद में सूझे तर्क की तरह इसमें यह भी जोड़ दिया गया है कि यह पर्यावरण की रक्षा के लिए राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल के आदेशों पर किया जा रहा है।

                इसी तरह, रोमियोविरोधी मुहिम के सिलसिले में खुद पुलिस के आला अधिकारियों समेत, शासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह ‘मॉरल पुलिसिंग’ का मामला नहीं है और लड़कियों की शिकायत पर ही कार्रवाई की जाएगी।

खुद मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि उन्होंने पुलिस से कहा है कि अपनी मर्जी से कहीं बैठे, आते-जाते जोड़ों को परेशान नहीं किया जाए। लेकिन, अखबार और चैनल भी इसकी खबरों से भरे पड़े हैं कि वास्तव में जो हो रहा है, उसका सरकार के स्पष्टीकरणों से दूर-दूर तक कोई मेल नहीं है।

एंटी रोमियो स्क्वैड के नाम पर पुलिसवालों द्वारा युवा जोड़ों को पकडक़र बाकायदा नैतिक ‘शिक्षा’ दी जा रही है। इसी तरह हर तरह के कट्टीखानों से लेकर मांस की दूकानों तक, मांस के समूचे कारोबार में लगे लोग हमले के निशाने पर हैं।

                और समस्या सिर्फ इतनी नहीं है कि सरकारी मशीनरी, सरकारी आदेश को ठीक से समझ नहीं पा रही है या शुरूआत में उसका आशय समझने में यहां-वहां गलतियां हो रही हैं। यह एडजस्टमेंट के लिए कुछ मोहलत की जरूरत का मामला हर्गिज नहीं है। उल्टे इन अभियानों के दायरे का ज्यादा से ज्यादा व्यापक होना तो, इन की प्रकृति और संदर्भ में ही निहित है।

औपचारिक सरकारी सफाइयां अपनी जगह, ये अभियान अगर सरकारी तंत्र के हाथों से निकलकर, ‘भीड़ की कार्रवाई’ की ओर बढ़ते नजर आते हैं, तो इसमें रत्तीभर अचरज की बात नहीं है। इसके चिंताजनक उदाहरण के रूप में अगर प्रशासन ने जगह-जगह मीट कारोबारियों के पुराने लाइसेंसों को अमान्य करते हुए कारोबार सील कराए हैं, तो हाथरस में मीट की दूकानें ही जलाए जाने जैसी भीड़ की कार्रवाइयां भी हुई हैं।

इस तरह की भीड़ की कार्रवाइयां कब, कहीं अखलाक की हत्या जैसा या मुजफ्फरनगर दंगे की पृष्ठभूमि बने कथित ‘छेड़छाड़ हत्याकांड’ जैसा कांड करा दें, कोई नहीं कह सकता है।

                योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद, इस फैसले को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की जा रही थी कि अब तक उनकी छवि चाहे जैसी रही हो, मुख्यमंत्री बनने के बाद एक भिन्न आदित्यनाथ देखने को मिलेंगे।

बहरहाल, मुख्यमंत्री की हैसियत से आदित्यनाथ के ये पहले कुछ कदम इस दावे से उल्टी ही दिशा में इशारा करते हैं। सब का साथ सब का विकास’ के प्रधानमंत्री के रस्मी नारे के जाप को छोड़कर, आदित्यनाथ ने व्यवहार में ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जो उनकी उग्र हिंदूवादी छवि को बदलने में रत्तीभर मददगार हो। उल्टे डोनाल्ड ट्रम्प की तरह वह तो चुनाव अभियान के दौर की और उससे भी पहले की अपनी विभाजनकारी छवि को ही सच साबित करते नजर आते हैं।

यह संयोग ही नहीं है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद, अपनी पहली गोरखपुर यात्रा में नागरिक अभिनंदन के अपने उत्तर में योगी आदित्यनाथ ने ‘सबका विकास, पर तुष्टीकरण किसी का नहीं’ की रस्मी घोषणाओं के अलावा एक और सिर्फ एक ठोस घोषणा की है--राज्य के मानसरोवर यात्रियों के लिए सहायता पचास हजार रु0 से बढ़ाकर एक लाख रु0 करने की और हज हाउस की तर्ज पर मानसरोवर यात्रा हाउस बनवाने की!

                वास्तव में भाजपा द्वारा देश के आबादी के लिहाज से सबसे बड़े और लगभग 20 फीसद मुस्लिम आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के पद के लिए, अपनी ऐसी छवि के साथ आदित्यनाथ के चुने जाने में ही, विभाजनकारी राजनीति के आगे बढ़ाए जाने के संकेत छुपे हुए हैं। प्रसिद्घ न्यायविद फाली एस नारीमन तो इसे हिंदू राष्ट्र की स्थापना का ही संकेत मानते हैं।

जाहिर है कि आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनाया जाना न तो पहले से तय था और न ही किसी मजबूरी में लिया गया फैसला है। यह तो मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा द्वारा अच्छी तरह से सोच-समझकर लिया गया फैसला है। इस फैसले के पीछे यह सिनिकल विचार काम कर रहा लगता है कि अब उत्तर प्रदेश की जनता और खासतौर पर उत्तर प्रदेश के हिंदू, योगी की शैली के उग्र और आक्रामक हिंदुत्व को, नया सामान्य मानने के लिए या विकास का नया माडल मानने के लिए तैयार हैं। इसके रास्ते से भाजपा, उत्तर प्रदेश में अपना आधार पुख्ता कर सकती है और 2019 के आम चुनाव में मोदी का रास्ता साफ कर सकती है।

                इसीलिए, सांप्रदायिक कढ़ाह को उबालते रखे जाने की तैयारियां नजर आ रही हैं। रोमियोविरोधी अभियान हो या कट्टीखानाविरोधी मुहिम, उनके मुस्लिमविरोधी संकेत किसी से छुपे हुए नहीं हैं। उनके पक्ष में होने वाली गोलबंदी से ये संकेत और स्पष्ट हो जाते हैं। ये संकेत ‘दूसरों’ के अतिक्रमणों से बहुसंख्यक हिंदुओं को, उनकी ‘इज्जत’ के रूप में स्त्रियों से लेकर, कथित रूप से उनके मूल्यों तथा खान-पान की परंपराओं तक को, बचाने के ही संकेत हैं। याद रहे कि यह सब अब शासन का सहारा लेकर किया जा रहा होगा। यह एक ओर तो मुस्लिम अल्पसंख्यकों को और पराया तथा और कटु बनाएगा तथा इस्लामी तत्ववाद को बढ़ावा देगा, और दूसरी ओर बहुसंख्यक हिंदुओं के जीवन में वास्तविक सुधार के तकाजों तथा मुद्दों को और भी हाशिए पर धकेल देगा। मोदी के राज में विकास की सारी बतकही के बावजूद, रोजगार के असली मुद्दे का पूरी तरह से हाशिए पर धकेला जाना इसी का सबूत है।

                उत्तर प्रदेश को एक खतरनाक तजुर्बे से गुजरना होगा। उसने ऐसा ही एक तजुर्बा नव्बे के दशक के शुरू में कल्याण सिंह के राज में झेला था, जिसकी परिणति बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई थी और भाजपा पहली बार केंद्र में सत्ता तक पहुंची थी। इस दूसरे तजुर्बे में क्या-क्या ध्वस्त होगा, इस पर अभी अटकलें ही लगायी जा सकती हैं, पर इसके फल के रूप में मोदी अपना दूसरा कार्यकाल देख रहे हैं। उत्तर प्रदेश और वास्तव में देशभर में, धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र वाकई खतरे में है।

क्या धर्मनिरपेक्षता और जनतंत्र में दिलचस्पी रखने वाली ताकतें इस खतरे को पूरी तरह पहचानती हैं? क्या जनता का इस खतरे की पहचान की वास्तविक और गंभीर मुहिम की उम्मीद करना भी बहुत ज्यादा है।

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