जीत का जश्न मना लें, आगे अनंत अमावस्या है !

अमेरिका और बाकी दुनिया में भारतीय मूल के लोगों पर हमले तेज हो रहे हैं तो स्वदेश में भी आजीविका और रोजगार पर कुठाराघात है। मुक्तबाजार में नोटबंदी के बाद अब भुखमरी, बेरोजगारी, मंदी, असहिष्णुता, घृणा, ...

जीत का जश्न मना लें, आगे अनंत अमावस्या है !
हाइलाइट्स
  • जिस कारपोरेट फंडिंग के बिना संसदीय राजनीति नहीं चलती, उसके तार सीधे व्हाइट हाउस से जुड़े हुए हैं
  • आटोमेशन से नौकरियां, कंप्यूटर के बाद रोबोट के हमले में रोजगार, आजीविका खत्म
  • मुक्त बाजार में नोटबंदी के बाद अब भुखमरी, बेरोजगारी, मंदी, असहिष्णुता, घृणा, हिंसा और जुबांबंदी का सवा सत्यानाशी माहौल।


पलाश विश्वास

जीत का जश्न मना लें, आगे अनंत अमावस्या है।

अमेरिका और बाकी दुनिया में भारतीय मूल के लोगों पर हमले तेज हो रहे हैं तो स्वदेश में भी आजीविका और रोजगार पर कुठाराघात है।

मुक्तबाजार में नोटबंदी के बाद अब भुखमरी, बेरोजगारी, मंदी, असहिष्णुता, घृणा, हिंसा और जुबांबंदी का माहौल है। भारत में आईटी सेक्टर में काम करने वाले करीब 14 लाख कर्मचारियों का भविष्य एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। इनमें से ज्यादातर कर्मचारियों की नौकरी खतरे में है।

विकास दर के झूठे दावे और झोलाछाप अर्थशास्त्रियों के करिश्मे से सुनहले दिनों के ख्बाब और रामजी की कृपा से धार्मिक ध्रुवीकरण और आखिरी वक्त आईसिस के हौआ से भले ही यूपी जीत लें संघ परिवार, अर्थ व्यवस्था की गाड़ी पटरी पर लौटनेवाली नहीं है।

मसलन ग्लोबल मंदी और डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों से आईटी सेक्टर घबराया हुआ है। इंडस्ट्री में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इसी को देखते हुए नैसकॉम ने भी वित्त वर्ष 2018 का ग्रोथ अनुमान तीन महीने के लिए टाल दिया है। ऐसा पहली बार है जब नैसकॉम ने वित्त वर्ष शुरू होने से पहले ग्रोथ अनुमान टाला हो।

 इकॉनमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक, ये कंपनियां खुद को ऑटोमेशन और नई टेक्नॉलजी के हिसाब से ढालने में लगी हुई हैं। मिड लेवल की कंपनियों में करीब 14 लाख कर्मचारी हैं। उनके पास 8 से 12 साल का अनुभव है और उनकी सेलरी 12 से 18 लाख रुपए सलाना है। बताया जा रहा है कि री-स्किलिंग और री-स्ट्रक्चरिंग का असर इन्हीं पर है। आमतौर पर इनकी उम्र 35 साल के आस-पास ही होती है।

यूपी समेत पांच राज्यों में मीडिया सत्ता के साथ रहा है और पहले ही केसरिया सुनामी पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

नोटबंदी से लेकर राममंदिर और आखिरकार आतंकवाद जैसे पड़ाव पार करने के बाद मतदान पर्व समाप्त है और 11 मई तक भारतीय मीडिया में ज्योतिष शास्त्र वास्तुशास्त्र के तहत कुंडलीपर्व जारी रहना है।

बहरहाल कोई जीते या कोई हारे, यह हमारे सरदर्द का सबब नहीं है।

कामर्शियल, माफ करें चुनावी अंतराल के बाद संसद का बजट सत्र फिर चालू है और किसी ने सवाल दाग ही दिया कि अमेरिका में भारतीय मनुष्यों पर एक के बाद एक हमले पर प्रधान सेवक क्यों चुप हैं। सवाल कोई चाबी जाहिर है नहीं कि चुप्पी का सिंहद्वार खोल दें।

बहरहाल गृहमंत्री ने कहा कि सरकार सीरियस है।

तनिको इस सीरियस संवाद पर गौर फरमायें -

In recent weeks, at least two Indians have been killed in incidents of hate crime in the US. “Why is the Modi government silent on the attacks against Indian in the US? The Prime Minister tweets on every other issue, why doesn’t he talk on this issue? Why is he silent? He should make a statement today, ” Kharge said.

In his reply, Union Home Minister Rajnath Singh said that the government has taken a serious note of the recent incidents against Indians in US. He added that the government will make a statement on the issue next week in the Parliament. “What is happening in the US is being viewed seriously by the government and a statement would be made in the Parliament next week, ” he said during Question Hour. Parliamentary Affairs Minister Ananth Kumar also said the government was very much concerned about the incidents in the US.

(साभार इंडियन एक्सप्रेस)

     कुछ पल्ले पड़ा? सरकार सीरियस है लेकिन इस नस्ली घृणा अभियान की निंदा या विरोध करने की स्थिति में नहीं है। जाहिर है कि मामले को मटियाने के लिए संसद में बयान जारी कर दिया जायेगा।

जाहिर है कि मनुस्मृति शासन के सत्ता वर्गी की राजनीति और राजनय अमेरिकी हितों के खिलाफ चूं भी करने की हालत में नहीं है। जिस कारपोरेट फंडिंग के बिना संसदीय राजनीति नहीं चलती, उसके तार सीधे व्हाइट हाउस से जुड़े हुए हैं

सत्ता वर्ग नोटबंदी के मुक्तबाजार में किताना मालामाल है उसका एक उदाहरण पेश है। एक तरफ कहा जाता है कि नोटबंदी की वजह से व्यापार और कमाई में भारी गिरावट की आई है, वहीं आंध्र प्रदेश के अधकेसरिया मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के बेटे और युवा नेता नारा लोकेश की कमाई में इस दौरान 23 फीसद बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है।

सवाल यह है कि राष्ट्र को नागरिकों की जान माल की कितनी चिंता है और नागरिकों की देश विदेश में सुरक्षा की जिम्मेदार चुनी हुई सरकार है या नहीं।

धर्म कर्म से लेकर आतंकवाद तक जो अंध राष्ट्रवादी की सुनामी है, वहां राष्ट्र जाहिर है कि सार्वभौम है, सर्वशक्तिमान है, लेकिन उस राष्ट्र के नागरिकों का वजूद सिर्फ आधार नंबर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना करते हुए हर जरुरी सेवा के लिए आधार अनिवार्य किया जा रहा है, जो सबसे बड़ा आईटी टमत्कार है तो नागरिकों की गतिविधियों, उनकी निजता, गोपनीयता से लेकर उनके सपनों और विचारों की लगातार निगरानी का चाकचौबंद इंतजाम है।

अपने ही नागरिकों की कारपोरेट कंपनियों के हित में निगरानी करने वाले राष्ट्र के नागरिकों की देश विदेश में सुरक्षा करने की कितनी जिम्मदारी है और इस सिलसिले में सरकार और सत्ता तबक कितना सीरियस है जो पल-पल नागरिकों की जिंदगी नर्क बनाने में सक्रिय हैं, समझ लें।

मिड डे मिल पर दि वायर के वीडियो में मशहूर पत्रकार विनोद दुआ ने सही कहा है कि आधार है तो आपका वजूद एक नंबर है और आधार नहीं है तो आपका कोई वजूद नहीं है। राजकाज और राजधर्म से तो साबित है कि निराधार आधार का भी कोई वजूद नहीं है। नंबरदार गैरनंबरदार नागरिक कैसा भी हो, उसका कोई वजूद नहीं है।

अमेरिका के किसी नागरिक का दुनिया भर में कहीं बाल भी टेढ़ा हो जाये तो अमेरिका अपनी पूरी सैन्य शक्ति अपने उस इकलौते नागरिक के हक में झोंक देता है। उसी अमेरिका में जब किसी उपनिवेश के नागरिक की ऐसी तैसी या हत्या तक हो जाये तो जाहिर है कि उपनिवेश की सरकार के लिए जुबां पर तालाबंदी के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

तकनीकी जनता की हालत भी अदक्ष श्रमजीवी आम जनता से बेहतर नहीं है तकनीकी गैरतकनीकी क्रयशक्ति विभाजन की नोटबंदी के बावजूद। इस तकनीक कार्निवाल के कबंध नागरिकों का भी बाकी जनता का हाल होने वाला है।

फ्रांस में भी लेडी ट्रंप की ताजपोशी तय

मुश्किल यह है कि फ्रांस में भी लेडी ट्रंप की ताजपोशी तय है। भूमंडल में कहीं, शरणार्थी हो या आप्रवासी श्वेत आतंकवाद के निशाने से किसी का भी बच पाना मुश्किल है। यूरोप और अमेरिका के बाहर न्यूजीलैंट से लाइव स्ट्रीमिंग शुरु है।

विदेश में बारतीय नागरिकों पर हमले से बड़ी खबर यह है कि अब क्योंकि IT सेक्टर वक्त के साथ साथ नई टेक्नोलॉजी के हिसाब से बदल रहा है। यह दौर ऑटोमेशन का है। सत्ता तबके के मेधावी बच्चों पर शायद फिलहाल फर्क न पड़े।

क्योकि ऑटोमेशन से अगर सबसे ज्यादा खतरा है तो वे हैं कंपनी के मिड लेवल कर्मचारी। जो आम जनता और बहुजन परिवारों के मध्य मेधा वाले बच्चे हैं और तकनीक के अलावा कुछ नहीं जानते और दलील यह है कि इनकी जॉब खतरे में इसलिए है क्योंकि ये कर्मचारी खुद को बदलना नहीं चाहते हैं। कहा जा रहा है कि ये कर्मचारी एक अच्छे मैनेजर हैं जो मैनेज करना अच्छे से जानता है। बदलती टेक्नोलॉजी के साथ इन कर्मचारियों ने खुद को नहीं बदला।

इस आटोमेशन का जीता जागता नजारा भारतीय मीडिया का नंगा सच है। अब किसी भी अखबार में मार्केटिंग से नीति निर्धारण होता है और संपादकीय विभाग का कोई वजूद नहीं है तो आटोमेशन का कुल रिजल्ट पेड न्यूज है, मीडिया भोंपू है।

हर सेक्टर में मैनेजमेंट श्रम कानून और वेतनमान के झंझट से बचने के लिए आधुनिकीकरण के नाम पर कंप्यूटर और रोबोट से काम चलाने के लिए आटोमेशन का विकल्प आजमाने लगा है और इसपर सरकारी या राजनीतिक कोई अंकुश नहीं है और न इसके खिलाफ कोई ट्रेड यूनियन आंदोलन है।

जाहिर है कि सबसे मुश्किल यह है कि हमारी अब कोई उत्पादन प्रणाली नहीं है और न हमारी कोई अर्थव्यवस्था है।

कहने को तो शेयरबाजारी एक बाटमलैस ट्रिलियन डालर अर्थव्यवस्था है, जो सीधे तौर पर अमेरिकी डालर से नत्थी है यानी खुल्लमखुल्ला अमेरिकी उपनिवेश है।

परंपरागत कृषि आधारित उत्पादन प्रणाली सिरे से खत्म है और ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान जो पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली बनी थी औद्योगीकरण की वजह से, उसे भी मुक्तबाजार ने खत्म कर दिया है।

अब चुनावों में खैरात बांटकर नागरिकों को भिखारी मानकर नोटवर्षा करके जीत हासिल करने का लोकतंत्र है। विकास का मतलब है उपभोक्ता बाजार का विस्तार, सीधे तौर पर अंधाधुंध शहरीकरण और शहरीकरण के तहत उपभोग के चकाचौंध करने वाले बाजार के हित में सुपर एक्सप्रेस वे, हाईवे, मेट्रो, फ्लाईओवर, माल, मल्टीप्लेक्स, लक्जरी हाउसिंग, हेल्थ हब का विकास और यह सब कल कारखानों और देहात के श्मशानघाट या कब्रिस्तान पर गजब के शोर शराबे के साथ हो रहा है। जिसके तहत जल जंगल जमीन नागरिकता और मानवाधिकार, बहुलता, विविधता, लोकतंत्र विरोधी यह दस दिगंतव्यापी कयामती फिजां है और सारा देश गैस चैंबर में तब्दील है।

अब तो वामपंथी भी चुप हो गये

आर्थिक सुधारों से पहले वामपंथी मशीनीकरण और कंप्यूटर का विरोध कर रहे थे। लेकिन बाद में वामपंथी भी चुप हो गये। वे भी पूंजीवादी विकास की अंधी दौड़ में शामिल हो गये और पिछले 26 साल से वे लगातार हाशिये पर जाते हुए भी खुश हैं और जनता के बीच खड़े होने से मुंह चुरा रहे हैं।

नतीजतन अब हालत यह है कि रोजगार का एकमात्र साधन कंप्यूटर है।

पिछले छब्बीस साल से कंप्यूटर यानी आईटी की आटोमेशन की कृत्तिम मेधा ही इस देश में रोजगार की धुरी है। मानवीय मेधा और मनुष्यता तेल लाने गयी हैं।

हावर्ड बनाम हार्डवर्क पहेली का हल यही है कि उच्च शिक्षा, शोध और विश्वविद्यालय गैरजरुरी है क्योंकि तकनीक जानना ही आजीविका के लिए पर्याप्त है। पहले विदेशों में डाक्टर इंजीनियर जाते थे और अब दुनियाभर में आईटी सेक्टर से भारतीय मूल के लोग खा कमा रहे हैं। इसीलिए सत्ता वर्ग के निशाने पर हैं तमाम विश्वविद्यालय और उनके छात्र और शिक्षक। असहिष्णुता का यह रसायन है। जो मनुस्मृति का डीएनए भी है और संक्रामक महामारी भी है।

मशीन और कंप्यूटर ने विकसित दुनिया के लिए भारत की श्रम मंडी से औपनिवेशिक भारत के कच्चा माल की तरह सस्ता दक्ष श्रमिकों का निर्यात उसीतरह शुरु किया जिस तरह उन्नीसवीं दी तक एशिया और अप्रीका से गुलामों का निर्यात होता था। फर्क यह है कि गुलामों के कोई हक हकूक नहीं थे और अब दुनियाभर में हमारे दक्ष श्रमिक बेहद सस्ते मूल्य पर श्रम के बदले यूरोप अमेरिका और आस्ट्रेलिया से लेकर लातिन अमेरिका और अफ्रीका में भी भारत की तुलना में बेहतर जीवनशैली में जीते हैं।

हमारे यहां हुआ हो या न हुआ हो, उन बेहतर विकसित देशों में तेज एकाधिकारवादी पूंजी के विकास में आम जनता के लिए रोजगार के मौके खत्म हो गये। मसलन इंग्लैंड में जीवन के किसी भी क्षेत्र में सौ साल पहले भी पूरी दुनिया पर राज कर रहे अंग्रेजों का वर्चस्व नहीं है।

इसी तरह अमेरिका में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी है क्योंकि एशियाई लोगों को नौकरी देकर कंपनियां इतना ज्यादा मुनाफा दुनियाभर में कमाने लगी हैं कि उन्हें अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देना घाटे का सौदा है।

इसी का नतीजा धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नस्ली डान डोनाल्ड ट्रंप की ताजपोशी है और अश्वेतों के खिलाफ श्वेत जनता की घृणा है।

अब फ्रांस में भी वही होने जा रहा है तो ब्रेकसिट से बाहर आने के लिए ब्रिटिश जनादेश का मतलब भी गैर अंग्रेज नस्लों के ब्रिटेन से सफाये का कार्यक्रम है।

स्थानीय रोजगार अब दुनियाभर में कहीं नहीं है, मशीनीकरण के बाद कंप्यूटर और कंप्यूटर के बाद रोबोट आधारित मुक्तबाजार के अर्थव्यवस्था में। इसलिए भूमिपुत्रों के हकहकूक की मांगों, उनकी गरीबी और बेरोजगारी के बढ़ते संकट की वजह से देश के बाहर किसी भी देश में नौकरी और आजीविका के लिए गये भारतीय मूल के लोगों के लिए यह भयानक दुस्समय है।

स्थानीय रोजगार के अलावा इस समस्या का समाधान नहीं है लेकिन भारत में सरकारे रोजगार सृजन के बदले रोजगार और आजीविका कारपोरेट एकाधिकार हित में अपनी जेबें गरम करने के लिए खत्म करने पर आमादा है।  

अमेरिकी ही नहीं, बाकी दुनिया में भी ये हमले बढ़ते जायेंगे क्योंकि उत्पादन संबंधों के अत्यंत शत्रुतापूर्ण हो जाने से दुनियाभर में अंध राष्ट्रवाद का तूफां चल रहा है जो हमारी अपनी केसरिया सुनामी से भी ज्यादा प्रलयंकर है। यह संकट गहराते जाना है। रोजगार सृजन के नये विकल्पों पर तेजी से काम करने के अलावा और कृषि संकट को सुलझाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है, सरकारे ऐसा चाहती नहीं हैं।

इस विचित्र संकट का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि शिक्षा के बाजारीकरण हो जाने से स्नातक स्नातकोत्तर की पढ़ाई की जगह तकनीकी पढ़ाई सर्वोच्च प्राथमिकता हो गयी है क्योंकि उत्पादन के बजाय आईटी आधार निराधार सेवाओं में ही रोजगार और आजीविका हैं।

अब इसमें सत्यानाश यह है कि यह सारी सेवा तकनीक आधारित रोजगार आउटसोर्सिंग पर निर्भर है। जो अमेरिका के नाभिनाल से जुड़ा है।

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