मार्गदर्शक मंडल को ‘मूकदर्शक मंडल’ बना रखा है मोदी-शाह की जोड़ी ने !

89 बसंत देख चुके आडवानी जी के साथ एकबार फिर मजाक करने की चेष्टा तो नहीं हो रही? वर्षों मीडिया उन्हें ‘पीएम इन वेटिंग’ कहके नवाजता रहा। क्या ‘प्रेसिडेंट इन वेटिंग' कहके उनका मखौल बनाने की चेष्टा हो रही...

पुष्परंजन

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भारतीय जनता पार्टी का पोर्टल खोलने पर दो बातें ध्यान से देखने लायक है। पूरे पोर्टल पर प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अलग-अलग मुद्राओं में विभिन्न घोषणाओं के साथ प्रस्तुत किये गये हैं। दाहिनी ओर डेढ़ गुणा दो इंच का एक कोना ‘आवर गाइडिंग लाइट्स’ को समर्पित है। छोटी सी डाक टिकटनुमा तस्वीरों में जो चार ‘गाइडिंग लाइट्स’ हैं, उनमें स्वर्गीय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्रद्धेय पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी को आप देख सकते हैं।

इस पोर्टल के ‘कॉन्सेप्ट’ और प्रधानमंत्री मोदी व अमित शाह की दिव्य तस्वीरों को देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि यह अखिल भारतीय पार्टी सिर्फ दो व्यक्तियों की वजह से है।

भाजपा के पोर्टल में आर्गेनाइजेशन वाले हिस्से पर क्लिक करें, तो सबसे पहले मार्गदर्शक मंडल दिखाई देता है। इसमें पता और फोन नंबर के साथ जिन महानुभावों की तस्वीर लगी है, उनमें सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी, दूसरे नंबर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तीसरे पर लालकृष्ण आडवानी, चौथे पर डॉ. मुरली मनोहर जोशी, और पांचवे नंबर पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह हैं।

मार्गदर्शक मंडल पर मूक है भाजपा का संविधान

Constitution of the BJP is silent on the Margdarshak Mandal

जैसे हर राजनीतिक दल का संविधान होता है, भारतीय जनता पार्टी ने भी 45 पन्नों का संविधान बनाया है, और उसे अपने पोर्टल पर डाला है।

इस संविधान में राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय समितियों तक का जिक्र है। उनके अधिकार, पार्टी की सदस्यता, अनुशासनात्मक कार्रवाई, चुनाव में विभिन्न इकाइयों के सदस्यों की क्या भूमिका होगी, इत्यादि की विस्तार से चर्चा है, मगर कहीं एक शब्द भी ‘मार्गदर्शक मंडल’ के बारे में नहीं लिखा गया है।

अगस्त 2014 में मार्गदर्शक मंडल का गठन किया गया था। तब से इसकी कितनी बैठकें हुईं, पार्टी को किस तरह का मार्गदर्शन मिला, कहीं इसका ब्योरा नहीं है। न ही यह हुआ कि पार्टी संविधान में फेरबदल कर इस पद की गरिमामयपूर्ण मान्यता दिला दी जाए।

भाजपा की अंदरूनी साजिशें

BJP's internal conspiracies

जब भारतीय जनता पार्टी के संविधान तक में मार्गदर्शक मंडल की चर्चा नहीं है, तो इसका क्या मतलब निकालें? मतलब तो यही निकलता है मार्गदर्शक मंडल एक ऐसी इकाई है, जो ‘असंवैधानिक’ है। इसके सबसे वरिष्ठतम सदस्य अटल जी स्वास्थ्य और उम्र की ऐसी दहलीज पर हैं, जिनसे कुछ भी संकेत प्राप्त करने की आशा नहीं की जा सकती। तो क्या उनके साथ यह भद्दा मजाक जैसा नहीं है?

मार्गदर्शक मंडल के जो नेता चल-फिर, हिल-डुल और बोल सकते थे, उन्हें 2014 के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकों में कितनी बार मार्गदर्शन प्रदान करने का अवसर दिया गया? इस प्रश्न के आलोक में पड़ताल की जाए तो पार्टी की अंदरूनी साजिशें सामने आ जाएंगी।

बंगलुरू, गोवा, और दिल्ली तीनों राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठकों की तस्वीर लगभग एक जैसी है, जहां न तो लालकृष्ण आडवानी का नाम लेने वाला कोई था, न मुरली मनोहर जोशी का। छद्म नाम देने, और पार्टी के कार्यकर्ताओं को भ्रम में रखे रहने से अच्छा है, मार्गदर्शक मंडल को भंग कर दें। दरअसल, मोदी-शाह की जोड़ी ने इसे मार्गदर्शक नहीं, ‘मूकदर्शक मंडल’ बना रखा है!

कांग्रेस ने उन दिनों तंज़ कसा था कि ‘मार्गदर्शक मंडल, बीजेपी का वृद्धाश्रम है।’ कांग्रेस द्वारा तंजतारी के पौने तीन साल हो चुके। भाजपा आलाकमान चाहता तो दिखा सकता था कि मार्गदर्शक मंडल, बीजेपी का वृद्धाश्रम नहीं, बल्कि समय-समय पर हमारी पार्टी ने बुजुर्ग नेताओं से सलाह प्राप्त की है। 2014 से लेकर अब तक दस नये चेहरे भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्री के तौर पर लाये गये, तब क्या उनके चयन में मार्गदर्शक मंडल की कोई भूमिका रही है? या जिन राज्यों में चुनाव हुए, उनमें से किसी एक में भी डॉ. मुरली मनोहर जोशी, या लालकृष्ण आडवानी को स्टार प्रचारक बनाया गया था? फिर काहे का मार्गदर्शक?

निःसंदेह पार्टी विद ए डिफरेंस

Undoubtedly the party with a difference...

भाजपा के पोर्टल पर ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ का जो स्लोगन चस्पां किया गया है, क्या मार्गदर्शक मंडल को उसका मॉडल मान लें? क्योंकि इस तरह का मार्गदर्शक मंडल देश क्या, दुनिया की किसी पार्टी में देखने को नहीं मिलता।

घोटालों पर  मार्गदर्शक मंडल मौन ही रहा

Margdarshak Mandal remained silent on scams

चीन में 1966 से 1976 तक सांस्कृतिक क्रांति के दौरान ‘गैंग ऑफ फोर’ बना था, जिसे चेयरमैन माओ की चौथी पत्नी चियांग छिंग लीड कर रही थीं। इस ताकतवर गैंग का काम चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कामों में दखल देना, और उन्हें दिशानिर्देश देना था। बल्कि एक दशक तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को ‘गैंग ऑफ फोर’ ने पूर्ण रूप से नियंत्रित कर रखा था।

9 सितंबर 1976 को चेयरमैन माओ की मृत्यु के बाद इस गैंग की बड़ी दुर्गति हुई। कोर्ट में बाकायदा उनका ट्रायल हुआ। यों, ताकतवर व तानाशाह तरीके अपनाने वाले चीनी चौगुटे की तुलना कहीं से भी मार्गदर्शक मंडल के तीन मानद सदस्यों अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, और डॉ. मुरली मनोहर जोशी से नहीं की जा सकती।

इन नेताओं को निष्प्रभावी एक साजिश के तहत किया गया है।

भाजपा के बहुत सारे नेता इसे महसूस करते हैं, पर बोलने की हिम्मत किसी में नहीं है। दिसंबर 2015 में भाजपा सांसद कीर्ति आज़ाद का निलंबन जिन्हें याद है, उन्हें एक बार फिर कीर्ति आज़ाद के शब्दों का स्मरण करना होगा जब पूर्व क्रिकेटर ने कहा था कि निलंबन वाले मामले को मार्गदर्शक मंडल के समक्ष रखूंगा, और पूछूंगा कि भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाना क्या गुनाह है। अंतत: इस पूरे मामले पर मिट्टी डाल दी गई। ‘डीडीसीए स्कैम’ अब किसी को याद भी नहीं है। मार्गदर्शक मंडल मौन ही रहा।

कभी-कभी लगता है कि ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ का स्लोगन भाजपा आलाकमान ने बहुत सोच-समझ कर दिया है। इससे किसी को असहमत होना नहीं चाहिए। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह जिस तरह हर समय चुनाव के मोड में रहते हैं, उसे देखकर शुंग साम्राज्य की स्थापना करने वाले सेना प्रमुख पुष्यमित्र शुंग की याद आती है, जिसने ईसा पूर्व 185वीं सदी में अंतिम मौर्य शासक बृहदरथ मौर्य का वध किया था। पुष्यमित्र ने कभी म्यान में तलवार रखा ही नहीं। अमित शाह ने यूपी चुनाव के समय एक पत्रकार को कहा भी था कि 2017 की बात मत कीजिए, मेरे लिए तो हर समय चुनाव है।

योगी की ताजपोशी कई सवालों को जन्म दे चुकी है

इस समय पूरे देश का ध्यान यूपी में योगी सरकार क्या कर रही है, उसमें अटका हुआ है, दूसरी ओर अमित शाह ने गुजरात में केंद्रित होकर अपना काम आरंभ कर दिया है। यह अटल जी के जमाने का जनसंघ, और 36 साल पहले की भारतीय जनता पार्टी नहीं है, जब मूल्यों की बात होती थी। आखिरी वक्त तक लगा था कि लखनऊ में भाजपा के विधायक अपने में से किसी को नेता चुनेंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। योगी की ताजपोशी कई सवालों को जन्म दे चुकी है कि क्या पार्टी के भीतर लोकतंत्र नाम की कोई चीज बची भी है, या नहीं? अमित शाह गोवा, मणिपुर में पराजय के बाद भी अपनी सरकार बनवा गये, यही तो है ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’!

सवाल यह है कि मार्गदर्शक मंडल के मानद सदस्यों का होगा क्या? उन्हें क्या ‘राजनीति के डीप फ्रीज़र’ से बाहर निकालने की चेष्टा होगी, या फिर वे स्वत: इस अति सम्मानित पद को प्रणाम कर लेंगे? दो हफ्ते पहले, 8 मार्च को सोमनाथ से एक खबर चली कि प्रधानमंत्री मोदी इस बार आडवानी जी को ‘गुरुदक्षिणा’ देने के मूड में हैं।

खबरों की मानें तो सोमनाथ में ऐसी बातचीत के साक्षी स्वयं लालकृष्ण आडवानी, अमित शाह और गुजरात इकाई के कुछ वरिष्ठ नेता थे। ‘गुरु दक्षिणा’ का यह महान अवसर जुलाई में प्राप्त होना है, जब उस माह की 25 तारीख को राष्ट्रपति चुनाव है। यों, देश के अगले राष्ट्रपति के लिए डॉ. मुरली मनोहर जोशी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जैसे नाम भी हवा में हैं। मगर, संघ इसके लिए किसके नाम पर मुहर लगाता है, यह सबसे बड़ा सवाल है।

8 नवंबर 2017 को आडवानी जी नब्बे साल के हो जाएंगे। यदि वे राष्ट्रपति चुने गये तो उम्र के लिहाज से इतिहास रच जाएंगे। इस देश में सबसे कम उम्र के राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी रहे हैं, जिन्होंने 64 साल की उम्र में यह जिम्मेदारी संभाली थी। राष्ट्रपति पद संभालने वाले अब तक सबसे उम्रदराज शख्सियत में केआर नारायणन का नाम आता है, जिनकी आयु शपथ लेते समय 76 साल की थी। जब यह मार्गदर्शक मंडल का सृजन हुआ तब यह कहा गया कि 75 पार के नेता उसमें रखे जा रहे हैं, क्योंकि राजनीति में अत्यधिक गतिशील रहने की उनकी उम्र नहीं रह गई है।

आडवानी जी के साथ एक बार फिर मजाक करने की चेष्टा तो नहीं

सवाल यह है कि 89 बसंत देख चुके आडवानी जी के साथ एक बार फिर मजाक करने की चेष्टा तो नहीं हो रही है? वर्षों मीडिया उन्हें ‘पीएम इन वेटिंग’ कहके नवाजता रहा, उनके विरोधी कटाक्ष भी करते रहे। अब क्या ‘प्रेसिडेंट इन वेटिंग’ कहके उनका मखौल बनाने की चेष्टा हो रही है?

 सोमनाथ वाली खबर पर आडवानी जी चुप हैं। कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। चुप, इंसान दो सूरत में होता है। या तो इस तरह की खबर से मन में लड्डू फूट रहे होते हैं, या फिर किसी साजिश की बू आने पर समझदार इंसान मौन मुद्रा धारण कर लेता है।

आडवानी जी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी भली-भांति जानते हैं कि मार्गदर्शक मंडल के नाम पर जो खेल हुआ, उसमें संघ की सहमति थी। आडवानी जी भाजपा संसदीय बोर्ड से हटाये गये, उसके लिए भी संघ के नेताओं ने हामी भर दी थी। इसलिए यह मानकर चलना चाहिए कि बिना नागपुर के संकेत मिले राष्ट्रपति प्रत्याशी के बारे में भाजपा आलाकमान हरी झंडी देने से रहा!

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