संघ परिवार के लिए रामजन्मभूमि मंदिर न तो आस्था का प्रश्न कभी था और न होगा

संघ परिवार ने शंकराचार्य की भी न मानी थी। रामजन्मभूमि के मंहत लालदास ने भी विहिप-भाजपा के रामजन्मभूमि आंदोलन का विरोध किया था। उनकी हत्या कर दी गई और उनके हत्यारों का आज तक कोई पता नहीं चल सका है।...

Irfan Engineer

अयोध्या विवाद : इतिहास और प्रकृति

-इरफान इंजीनियर

उच्चतम न्यायालय ने 21 मार्च, 2017 को रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण के दोनों पक्षों को आपसी बातचीत के जरिए मिल-बैठकर विवाद को सुलझाने का सुझाव दिया। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अगर दोनों पक्ष राजी हों तो वे बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका अदा करने के लिए तैयार हैं।

उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी सुब्रमण्यम स्वामी के एक आवेदन पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें उन्होंने यह अनुरोध किया था कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दिनांक 30 सितंबर, 2010 के निर्णय के विरूद्ध दायर अपील की जल्द सुनवाई की जाए। सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा सांसद हैं और वे इस प्रकरण में पक्षकार नहीं हैं। इसके बाद भी उच्चतम न्यायालय ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए न केवल उपरोक्त टिप्पणी की वरन् सुब्रमण्यम स्वामी से यह भी कहा कि वे दोनों पक्षों से बातचीत कर उनके बीच चर्चा का मार्ग प्रशस्त करें।

क्या सुब्रमण्यम स्वामी ने आवेदन प्रधानमंत्री के कहने पर प्रस्तुत किया था ?

यह कहना मुश्किल है कि क्या सुब्रमण्यम स्वामी ने यह आवेदन प्रधानमंत्री के कहने पर प्रस्तुत किया था, परंतु यह अवश्य है कि इस आवेदन का कुछ न कुछ संबंध उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत से है। यद्यपि इस चुनाव में भाजपा ने ‘सबका साथ, सबका विकास‘ के नारे के साथ विकास के मुद्दे पर लोगों से मत मांगे थे परंतु भाजपा को शायद यह लग रहा है कि उस स्थल पर राममंदिर का निर्माण करने का यह सबसे अच्छा मौका है, जहां बाबरी मस्जिद उसके गैर-कानूनी ढंग से ध्वस्त कर दिए जाने के पूर्व, कम से कम 464 वर्षों से खड़ी थी। अपील के पक्षकारों ने मामले की जल्द सुनवाई के लिए अदालत से अनुरोध करना उचित नहीं समझा।

उच्चतम न्यायालय में लाखों प्रकरण लंबित हैं जिनमें से कई बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसके बाद भी अदालत ने अपना कीमती समय इस विवाद के संबंध में एक ऐसे व्यक्ति के आवेदन को सुनने में बर्बाद किया जिसे इस मामले में सुने जाने का अधिकार ही नहीं है।

क्या अदालत को इस प्रश्न पर विचार नहीं करना था कि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में इस प्रकरण का एक पक्षकार बहुत मजबूत स्थिति में है जबकि दूसरा पक्षकार बचाव की मुद्रा में और कमजोर है। एक पक्षकार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार पहले से ही विवादित भूमि के दो-तिहाई हिस्से पर हक दिया गया है और अब वह पूरी जमीन पर कब्जा जमाना चाहता है। ऐसे में, अगर दूसरा पक्षकार उसका विरोध करता है तो उसके समुदाय की सुरक्षा के खतरे में पड़ने के साथ-साथ, उस पर दुराग्रही होने का आरोप भी लगाया जा सकता है। इस विवाद का बातचीत से हल निकालने के प्रयास पहले भी हुए हैं और ये सभी प्रयास असफल साबित हुए।

संघ परिवार ने शंकराचार्य की भी न मानी

एक प्रयास शंकराचार्य और कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओ द्वारा किया गया था। इस पहल का मुस्लिम नेताओं ने स्वागत किया था। उन्हें यह आशा थी कि इससे समस्या का सौहार्दपूर्ण ढंग से हल निकाला जा सकेगा। परंतु संघ परिवार इसके खिलाफ था क्योंकि वह नहीं चाहता  था कि उसके बगैर कोई समझौता हो।

मीडिया में इस आशय की खबरें छपवाईं गईं कि शंकराचार्य, राम के नहीं वरन शिव के भक्त हैं। इसके बाद शंकराचार्य ने अपने पांव पीछे खींच लिए।

अगर अयोध्या के रहवासियों पर इस विवाद का हल छोड़ दिया जाता तो वे बहुत पहले इसे सुलझा चुके होते। अयोध्या के सबसे बड़े मंदिर हनुमानगढी के मुख्य पुजारी महंत ज्ञानदास ने मंदिर प्रांगण में मुसलमानों के लिए रोजा अफ्तार का आयोजन किया था और मंदिर के स्वामित्व की भूमि पर बनी मस्जिद की मरम्मत करवाई थी। मुसलमानों ने अनेक बार महंत ज्ञानदास को विभिन्न मस्जिदों में आने का निमंत्रण दिया और वे वहां गए भी। जिस समय रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था उस समय भी अयोध्या में हिन्दुओं और मुसलमानों के रिश्ते सौहार्दपूर्ण थे। आंदोलनकारी तो बाहरी व्यक्ति थे।

मंहत लालदास ने विहिप-भाजपा के रामजन्मभूमि आंदोलन का विरोध किया था, उनकी हत्या कर दी गई...

रामजन्मभूमि के मंहत लालदास ने भी विहिप-भाजपा के नेतृत्व में चलाए जा रहे रामजन्मभूमि आंदोलन का विरोध किया था। उनकी हत्या कर दी गई और उनके हत्यारों का आज तक कोई पता नहीं चल सका है।

इस मुद्दे को सुलझाने का आखिरी प्रयास हाशिम अंसारी द्वारा किया गया था जो इस मामले में सबसे पुराने पक्षकार थे। वे एक बहुत सरल और सीधे-सच्चे व्यक्ति थे और एक छोटे से झोपड़े में रहते थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के कुछ महीनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस निर्णय से उनका न्यायपालिका से मोहभंग हो गया था और वे इस मसले को अदालत से बाहर सुलझाना चाहते थे।

हाशिम अंसारी और प्रकरण में उनके प्रतिद्वंद्वी, रामजन्मभूमि न्यास के महंत रामचन्द्र परमहंस के बीच गहरी मित्रता थी। वे दोनों न केवल एक थाली में खाना खाते थे वरन् एक साथ सुनवाई के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में जाते भी थे। अगर अयोध्या के लोगों को इस प्रकरण का हल निकालने का मौका दिया जाता तो वे इसे सौहार्दपूर्ण ढंग से हल कर लेते।

अयोध्या के मुसलमान और हिन्दू रहवासियों के बीच कभी कोई बैरभाव नहीं रहा। वे रामजन्मभूमि आंदोलन से परेशान थे क्योंकि इससे उनके शहर में हमेशा तनाव बना रहता था और कई दिनों तक लगातार कर्फ्यू लगा रहने से उनका रोजगार प्रभावित होता था।

अगर इस विवाद का हल बातचीत से नहीं निकल सका तो इसका कारण संघ परिवार का हठीला रूख था। संघ परिवार नहीं चाहता था कि इस विवाद का कोई हल निकले क्योंकि यह विवाद उसके लिए एक ऐसा राजनीतिक हथियार था, जिसका इस्तेमाल वह हर चुनाव में वोट कबाड़ने के लिए करता था। संघ परिवार के लिए रामजन्मभूमि मंदिर न तो आस्था का प्रश्न कभी था और न होगा।

अगर आज इस प्रकरण को सुलझाने के लिए बातचीत की जाती है तो मामले का एक पक्षकार, सुन्नी वक्फ बोर्ड, जबरदस्त राजनीतिक और सामाजिक दबाव में रहेगा। उस पर यह दबाव होगा कि वह भूमि का जो भी छोटा-सा हिस्सा उसे मिला है, उस पर भी अपना दावा छोड़ दे। इसके मुकाबले, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान, जिन्हें दो-तिहाई भूमि दी गई है, बची हुई एक-तिहाई भूमि को प्राप्त करने के लिए वार्ता करेंगे और राज्य व केन्द्र सरकार की सत्ता की ताकत उनके पीछे होगी। क्या उच्चतम न्यायालय यह सोचता है कि दो गैर-बराबर पक्षों के बीच बातचीत से किसी भी मसले का न्यायपूर्ण हल निकाला जा सकता है? लोग न्यायालय न्याय पाने के लिए जाते हैं। अगर उन्हें बातचीत से ही किसी मुद्दे का हल निकालना हो तो उन्हें न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता ही क्या है? कानून का एक जाना-माना सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को स्वच्छ हाथों से न्यायालय के समक्ष जाना चाहिए। क्या उन लोगों के हाथ स्वच्छ थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ढहाया था?

सन् 1885 में मस्जिद के बाहर बने चबूतरे पर छत बनाने की इजाजत मांगने से शुरू हुआ विवाद आज पूरी जमीन पर कब्जा करने का प्रयास बन गया है। और वह भी किसी कानून के रास्ते नहीं बल्कि आस्था के आधार पर। औपनिवेशिक सरकार ने इन दावों को मान्यता नहीं दी परंतु स्वतंत्र भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार, धीरे-धीरे उस राजनीतिक और सामाजिक श्रेष्ठि वर्ग के आगे झुकती गई, जो स्वयं को पूरे हिन्दू समाज का प्रतिनिधि बताता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने निर्णय का आधार ‘आस्था‘ को बनाया, ना कि कानून को। और इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि हिन्दुओं की ऐसी आस्था है कि जिस स्थान पर बाबरी मस्जिद थी, वहां ही भगवान राम का जन्म हुआ था।

 

राम चबूतरे से बाबरी मस्जिदः न्यायतंत्र की असफलता    

आईए, हम इस विवाद के इतिहास पर एक नजर डालें।

इस बारे में कोई दो मत नहीं हैं कि मुगल बादशाह बाबर के एक गवर्नर मीर बकी ने सन् 1528 में विवादित स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया था। संघ परिवार का दावा था कि मस्जिद बनाने के लिए वहां स्थित रामजन्मभूमि मंदिर को ढहाया गया था। मुस्लिम राजनीतिक नेताओं व जानेमाने इतिहासविदों का यह कहना है कि इस बात का कोई विश्वसनीय सुबूत नहीं है कि बाबरी मस्जिद की नींव, रामजन्मभूमि मंदिर के मलबे पर रखी गई थी।

सन् 1905 का फैजाबाद डिस्ट्रिक्ट गजेटियर कहता है कि सन् 1855 तक, हिन्दू और मुसलमान, दोनों उस परिसर में, जिसे अब रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर कहा जाता है, एकसाथ प्रार्थना करते थे। सन् 1857 की क्रांति के बाद, मस्जिद के चारों ओर एक चहारदीवारी बना दी गई और हिन्दुओं का अंदर के अहाते में प्रवेश वर्जित कर दिया गया। इसके पश्चात, हिन्दुओं ने चहारदीवारी के बाहर एक चबूतरा बना लिया।

इस विवाद की शुरूआत सन् 1861 में हुई। एक ब्रिटिश अधिकारी, जो फैजाबाद का कार्यवाहक आयुक्त और बंदोबस्त अधिकारी था, ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ‘‘ए हिस्टोरिकल स्केच ऑफ फैजाबाद तहसील इन्क्लूडिंग द फार्मर केपिटल अयोध्या एण्ड फैजाबाद‘‘। पुस्तक ‘स्थानीय स्त्रोतों द्वारा पुष्टि‘ और लेखक के स्वयं के अनुमानों के आधार पर कहती है कि अयोध्या में रामजन्म स्थान पर एक शानदार मंदिर रहा होगा। लेखक कहता है,  ‘ऐसा लगता है कि सन् 1528 में बाबर अयोध्या आया और उसके आदेश पर मंदिर को ढहा दिया गया।‘‘ इस बात का कोई सबूत नहीं है कि बाबर कभी अयोध्या आया था या वह अयोध्या के आसपास से गुजरा भी था।

हिंदू पंडित यह चाहते थे कि उन्हें चबूतरे पर छत बनाने की इजाजत दी जाए ताकि वे सभी मौसमों में वहां पूजा-अर्चना कर सकें।

सन् 1885 में एक व्यक्ति महंत रघुवरदास, जिनका यह दावा था कि वे जन्मस्थान के महंत हैं, ने फैजाबाद के उप-न्यायाधीश पंडित हरिकिशन की अदालत में एक प्रकरण दाखिल किया। सन् 1885 की 19 जनवरी को दाखिल इस प्रकरण का क्रमांक था 61/280। महंत रघुवरदास ने अदालत में प्रस्तुत अपने आवेदन में कहा कि मस्जिद के बाहर बना चबूतरा पूर्व से पश्चिम की ओर 21 फीट और उत्तर से दक्षिण की ओर 17 फीट लंबा है। उन्होंने कहा कि चूंकि इस चबूतरे पर छत नहीं है इसलिए महंत और उनके साथियों को विपरीत मौसम में वहां आराधाना करने में काफी परेशानी होती है। महंत ने चबूतरे प 21 फीट गुणित 17 फीट की छत बनाने की इजाजत फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर से मांगी थी, जो उन्हें नहीं दी गई। उन्होंने डिप्टी कमिश्नर के इस निर्णय के खिलाफ अदालत में प्रकरण दायर किया था।

इस प्रकरण को 24 दिसंबर, 1885 को उप-न्यायाधीश पंडित हरिकिशन ने खारिज कर दिया। विद्वान न्यायाधीश ने गोपाल सहाय द्वारा तैयार किए गए स्थल के नक्षे के आधार पर लिखाः

‘‘अहाते के प्रवेशद्वार के ऊपर अल्लाह लिखा हुआ है। इसके बाईं ओर एक पक्का चबूतरा है, जिस पर हिन्दुओं का कब्जा है। इस चबूतरे के ऊपर लकड़ी की छोटी सी टेंटनुमा छत है। इस चबूतरे को रामचन्द्र का जन्मस्थान बताया जाता है...।

‘‘...मस्जिद और चबूतरे के बीच एक दीवार है...यह स्पष्ट है कि मस्जिद और चबूतरे की अलग-अलग सीमाएं हैं और यह इस तथ्य से भी जाहिर है कि विवाद के पहले सरकार ने दोनों के बीच एक सीमारेखा खींची थी।‘‘

उप-न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अगर चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाजत दी जाएगी तो वहां शंख और घंटियों का शोर होगा। अगर हिन्दुओं को वहां मंदिर बनाने दिया जाएगा तो एक न एक दिन दंगे होंगे जिनमें हजारों लोग मारे जाएंगे।

विद्वान उप-न्यायाधीश ने अपने निर्णय में कहा कि मंदिर के निर्माण की अनुज्ञा देना दंगों और हत्याओं की नींव रखना होगा और इसलिए सरकार की नीति के तहत और न्याय की अपेक्षानुसार, अनुज्ञा देना संभव नहीं है।

उप-न्यायाधीश ने ‘प्रतिकूल कब्जे‘  के आधार पर भी मंदिर बनाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। अपने निर्णय में उन्होंने लिखाः

‘‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उस भूमि पर मस्जिद बनाई गई जिसे हिन्दू अत्यंत पवित्र मानते हैं। परंतु चूंकि यह 356 साल पहले हुआ था, अतः अब इस शिकायत का निवारण करने के लिए बहुत देरी हो चुकी है। अब जो किया जा सकता है वह यह है कि यथास्थिति बनाई रखी जाए।‘‘

 उप-न्यायाधीश के इस निर्णय के खिलाफ महंत रघुवरदास की फैजाबाद के जिला जज और इसके पश्चात ज्यूडिशियल कमिश्नर डब्लू. यंग (सिविल अपील क्रमांक 27/1886) के न्यायालयों में दाखिल अपीलें भी खारिज कर दी गईं।  यंग ने अपने दिनांक 1 नवंबर, 1886 के निर्णय में लिखाः

‘‘यह स्थान उस मस्जिद के अहाते में स्थित है, जिसे कोई 350 साल पहले एक धर्मांध और निरंकुश बादशाह ने बनवाया था। उसने शायद जानबूझकर वह स्थान चुना जो हिंदुओं के लिए बहुत पवित्र था। हिन्दुओं को मस्जिद के अहाते में स्थित कुछ स्थानों तक बहुत सीमित पहुंच है और वे कई सालों से लगातार अपने अधिकारों को बढाने और परिसर में स्थित दो स्थानों पर भवन का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं। ये स्थान हैं- 1) सीता की रसोई व 2) रामचन्द्र की जन्मभूमि। मेरी यह राय है कि अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा वादी के दावे को खारिज किया जाना उचित है।‘‘

यहां दो चीजें महत्वपूर्ण हैं। पहली यह कि प्रकरण व अपीलों दोनों को ‘प्रतिकूल कब्जे‘ के आधार पर खारिज किया गया। दूसरी यह कि विवाद केवल मस्जिद के अहाते में स्थित चबूतरे को लेकर था, मस्जिद को लेकर नहीं। जैसा कि निर्णय में कहा गया, हिन्दू समुदाय के कुछ सदस्य लगातार उस अहाते में अपने कब्जे का क्षेत्र बढाने का प्रयास कर रहे थे और अंततः उन्होंने पूरी मस्जिद पर कब्जा करने को अपना लक्ष्य बना लिया। यद्यपि हिन्दुओं के आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया तथापि निर्णय में हिन्दू समुदाय को नाराज न करने के लिए ‘निरंकुश और धर्मांध‘ बादशाहों (जिनके शासन से हमारे औपनिवेशिक शासकों के अनुसार उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप को ‘मुक्त‘ किया था) के अत्याचारों की चर्चा की गई। यह साफ नहीं है कि न्यायाधीश ने किस आधार पर कहा कि निरंकुश और धर्मांध मुगल बादशाह ने 350 साल पहले वहां स्थित मंदिर को तोड़कर अपने नाम पर मस्जिद बनवाई थी। इस तरह, इन निर्णयों के बाद भी रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद बना रहा। (अगले अंक में जारी)

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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