लाखों करोड़ों रूपया कारपोरेट को सब्सिडी देने वाली केन्द्र सरकार किसानों की कर्ज माफी पर ईमानदार नहीं

जनता को धीरज के साथ भाजपा की कुटिल चाल को समझना होगा और लोकतांत्रिक आंदोलन को जमीनी स्तर से खड़ा करना होगा...

अतिथि लेखक

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

    भाजपा सरकार की नीतियों के मूल चरित्र को जनता के बीच में रखने और उसके कुप्रभाव के विरूद्ध जनता को राजनीतिक रूप से आंदोलन में गोलबंद करने का दायित्व लोकतांत्रिक शक्तियों का है। यह चुनौती विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी हमें लेनी पड़ेगी।

    दरअसल मोदी सरकार कारपोरेट के पक्ष में काम कर रही है और कारपोरेट पूंजी को मजबूत करने में लगी हुई है, जबकि वह गरीब गुरबों के लिए काम करने वाली सरकार के रूप में जनता के सामने अपने को पेश कर रही है।

मोदी सरकार के दौर में किसानों की आत्महत्या की रफ्तार बढ़ी है लेकिन सरकार के पास आत्महत्या से निपटने की कोई कृषि नीति नहीं है।

सभी लोग जानते हैं कि डब्लूटीओ के नियमों से बंधे होने के कारण विदेशी उपज हमारे बाजार में भरा पड़ा है। किसानों को बाजार की मार झेलनी पड़ रही है।

डब्लूटीओ से बाहर आने का साहस भी मोदी सरकार नहीं दिखा सकी। जब तक किसानों के लिए कृषि के लागत मूल्य को नहीं घटाया जाता, उन्हें फसल रखने और विपणन की आधारभूत सुविधाएं नहीं दी जाती, उन्हें ब्याज मुक्त ऋण नहीं दिया जाता, लागत का डेढ़ गुना मूल्य उनकी उपज का नहीं दिया जाता तब तक किसानों को ऋण और आत्महत्या के दुष्चक्र से बचाना बेहद मुश्किल होगा।

लाखों करोड़ों रूपया कारपोरेट को सब्सिडी देने वाली केन्द्र सरकार किसानों की कर्ज माफी पर ईमानदार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी उ0 प्र0 के गरीब और सीमांत किसानों को पूरा कर्ज माफ करने के अपने वायदें से मुकर गए जबकि मार्च 2017 तक कर्ज माफ करना गरीब किसानों के लिए बेहद जरूरी था और केन्द्र सरकार के बजट पर इसका अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ता।

      कारपोरेट को फायदा पहुंचाने की नीतियों की वजह से बेइंतहा बेरोजगारी और महंगाई बढ़ रही है। जनता के न्याय प्राप्त करने और बेहतर प्रशासन प्राप्त करने की सहज भावनाओं का भाजपा दुरूपयोग कर रही है। उ0 प्र0 में अवैध बूचड़खाने बंद करने की उसकी नीति जनता के प्रति किसी सहज प्रेम का भाव नहीं है बल्कि मांस उद्योग को बड़े पूंजी घरानों के हवाले करने की नियत से किया गया है। जो लोग छोटेस्तर के व्यवसाय के बतौर इसमें लगे हुए थे उन्हें बूचड़खानों से ही मछली और चिकन तक खरीद कर उसे बाजार में बेचना पड़ेगा। मांस उद्योग को बंद करने की मंशा मोदी सरकार की कतई नहीं है। वह इस व्यवसाय को बड़ी पूंजी के हवाले करना चाहती है। दरअसल पूंजी का केन्द्रीकरण और विस्तार कारपोरेट घरानों के फायदे के लिए मोदी सरकार कर रही है। इससे खेती किसानी, छोटे मझोले व्यवसाय और उद्योग चौपट हो रहे है।

शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक कल्याण के मदों में मोदी सरकार बराबर कटौती कर रही है और देश में कारपोरेट तानाशाही को कायम करने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का वैचारिक राजनीतिक आधार भाजपा तैयार कर रही है जो हमारे राष्ट्रीय आजादी के आंदोलन और आधुनिक लोकतांत्रिक विवधतापूर्ण समावेशी सांस्कृतिक मूल्यों के विपरीत है। जनता को धीरज के साथ भाजपा की कुटिल चाल को समझना होगा और लोकतांत्रिक आंदोलन को जमीनी स्तर से खड़ा करना होगा।  

(मुगलसराय में अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, सदस्य, राष्ट्रीय कार्य समिति, स्वराज अभियान का सम्बोधन)

 

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