जी हाँ, चुनाव आयोग जानता है ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है !

पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद से ईवीएम वोटिंग पद्धति की विश्वसनीयता पर कई राजनैतिक दलों ने सवाल उठाए है। आयोग चाहे जो दावा करे ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है; ...

अतिथि लेखक
जी हाँ, चुनाव आयोग जानता है ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है !
हाइलाइट्स

ईवीएम बनाम अधिकारी

अनुराग मोदी

हाल ही में पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद से ईवीएम वोटिंग पद्धति की विश्वसनीयता पर कई राजनैतिक दलों ने सवाल उठाए है। उनका कहना है इसमें गड़बड़ी करना संभव है।

इन आरोपों को आयोग एक-तरफा नकारता आया है।

आयोग का दावा है: एक, ईवीएम में एक बार उपयोग की जा सकने वाली चिप है; इसे निर्माण के दौरान ही ‘बर्न’ प्रक्रिया के व्दारा बधिया कर दिया जाता है, इसलिए इसमें कुछ भी गड़बड़ी किया जा सकना संभव नहीं है। और, ईवीएम की रैंडम चेकिंग की जाती है, अगर कुछ गड़बड़ी हुई भी तो उसका पता उसमें चल जाता है।

इसका मतलब आयोग चाहे जो दावा करे ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है; यह वो जानता है, इसलिए ईवीएम की रैंडम चेकिंग के जाती है

अनुराग मोदी ... लेकिन, म. प्र. के भिंड जिले की घटना ने यह साबित कर दिया है कि आयोग के आँख और कान प्रदेश में पदस्थ राज्य सरकार के अधिकारी ही होते हैं। अगर वो निष्पक्ष हैं और आयोग को सूचना देंगे तो आयोग को सूचना होगी वर्ना ईवीएम की गड़बड़ी की सूचना के लिए उसे मीडिया का मोहताज़ होना होगा।

बर्न प्रक्रिया के जरिए आयोग ने ईवीएम चिप में तो ऐसी व्यवस्था करवा लेता है कि उसमें बिगाड़ नहीं की जा सके, लेकिन चुनाव प्रक्रिया में लगे आधिकारी के मामले में वो इस तरह की व्यवस्था का दावा कैसे कर सकता है?

सत्ताधारी पार्टी के हितों के प्रति अधिकारीयों का समर्पण चुनाव के दौरान भी कम नहीं होता है। इस बात को म. प्र. के भिंड जिले में ईवीएम मशीन के डेमो के दौरान पार्टी विशेष के लिए वोट अंकित करने की घटना के दौरान मौजूद म. प्र. के राज्य निर्वाचन पदाधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी के व्यवहार से समझा जा सकता है।

वहां मौजूद अधिकारीयों ने घटना की गंभीरता को समझते हुए उस गड़बड़ी को आयोग के संज्ञान में लाकर दूर करने के गंभीर प्रयास करने की बजाए, उल्टा मामले को छुपाने के लिए पत्रकारों को धमकी दी।

अब अगर पत्रकार डर जाते, तो उक्त मामला आयोग के सामने ही नहीं आता

उपरोक्त घटना से यह तो साफ़ हो गया है कि जिला निर्वाचन अधिकारी से लेकर राज्य का मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी किस तरह से राजनैतिक दबाव में काम करते हैं; और वो चुनावी गड़बड़ी को छुपाने के लिए किसी भी हद-तक जा सकते हैं। क्योंकि अधिकारी यह जानता है कि आयोग उसके खिलाफ कोई कार्यवाही करता भी है तो भी वो तात्कालिक भर होगी, एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के पौने पांच साल तो उसे सत्ताधारी पार्टी के मातहत ही काम करना है। उसके प्रमोशन से लेकर मलाईदर पोस्टिंग सब उनकी दया पर निर्भर है।       

म. प्र. में अनेक चुनावों में हिस्सा लेने के बाद अपने अनुभव के आधार पर हम समाजवादी जन परिषद की ओर से इस मामले को लम्बे समय से उठाते आए हैं कि अधिकारी और स्थापित पार्टियों के नेता चुनाव आयोग के आदशों से इसलिए नहीं डरते हैं क्योंकि चुनाव के बाद आयोग उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अगर चुनाव के दौरान, आयोग तबादला करवा भी देता है, तो चुनाव के बाद सरकार आने पर उल्टा उस अधिकारी को ईनाम ही मिलना है। क्योंकि, चुनाव के बाद आयोग का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो जाता है।

मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव और मेरे पास मौजूद दस्तावेजों से में इस बात के दो ठोस उदाहरण पेश करता हूँ।

पहला: तात्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के ऊपर म. प्र. के बैतूल जिले में चुनाव के दौरान लगे मामले को रफा-दफा  करने का है।

2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान 16 अप्रेल को उनके ऊपर आईपीसी की धारा 188/171 के तहत बैतूल, कोतवाली थाने में अपराध क्रमांक 702/09 दर्ज किया गया। इस मामले में  बैतूल के कोतवाली थाने के स्टेशन हाउस रजिस्टर में क्रमांक 255 में 27/06/09 की एंट्री है; जो बताती है: “तलाश आरोपी केन्द्रीय मंत्री एवं अन्य 50-60 नहीं मिल रहे हैं। इसलिए वरिष्ठ अधिकारीयों से निर्देश मांगे जाए।”

इसके बाद, 22/07/09 को वरिष्ठ अधिकारीयों के निर्देश पर इस मामले में खात्मा क्रमांक 50/09 जारी किया गया।

यानी मामले को बिना किसी कानूनी राय या आयोग की राय के राज्य की भाजपा और केंद्र की कांग्रेस सरकार की मिलीभगत से तीन माह में रफ़ा दफ़ा कर दिया। जबकि इस मामले में 6 मई 2009 का आयोग ऑफिस मेमोरेंडम है, जिसमें आयोग ने चुनाव के दौरान दर्ज आपराधिक प्रकरणों में उसकी अनुमति के बिना खात्मा ना करने की ताकीद दी है।

अब हम दूसरा मामला देंखे, जिसे चुनाव आयोग के आदेश के बावजूद चार साल तक सरकार ने मामले में तब-तक खात्मा नहीं किया, जब तक उपचुनाव के कारण प्रशासनिक ताकत वापस आयोग के पास नहीं आई।

हमारी पार्टी, समाजवादी जन परिषद की 2004 में बैतूल-हरदा संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार शमीम मोदी को चुनाव की पूर्व रात, 9 मई, को हरदा पुलिस ने छीपाबड़ थाने में हिरासत में ले लिया था।

आयोग ने अपनी जांच में पाया कि शमीम मोदी को ग़ैरकानूनी तरीके से हिरासत में रोका गया था। आयोग ने 23 सितम्बर 2004 को D.O. No. 464/MP/LA/2003 के जरिए म. प्र. के तात्कालीन मुख्य सचिव को अपनी रिपोर्ट का हवाला देते हुए शमीम मोदी पर झूठा मुकदमा बनाने वाले दोषी अधिकारियों तीन माह के अन्दर कार्यवाही कर आयोग को सूचित करने के लिए ताकीद भी किया।

जब चार साल तक कोई कार्यवाही नहीं हुई, तो हमारी शिकायत पर आयोग ने 8 फरवरी 2008 को दूसरा कड़ा पत्र लिखा; और, अप्रैल में बैतूल में लोकसभा उपचुनाव चुनाव की तारीखें आ जाने के कारण प्रशासन कमान वापस आयोग के पास आई तब जाकर इस मामले में कार्यवाही हुई।

म. प्र. शासन के विधि-विभाग ने 04/03/2008 को हरदा कलेक्टर को शमीम मोदी पर दर्ज झूठा मामला वापस लेने के लिए निर्देश दिया। इसके बाद दोषी पुलिस अधिकारियों का एक वेतन वृद्धि भी रोकी गई।

जिस तरह से महालेखा-परीक्षक, सी ए जी, के पास सरकार के वित्तीय ऑडिट करने के लिए अपना खुद का अपना अधिकारी वर्ग होता है, इसलिए, यह जरूरी है कि चुनाव आयोग के मातहत भी अधिकारियों का अपना समूह हो, जिसे आयोग निष्पक्ष चुनाव निगरानी हेतु पदस्थ कर सके। क्योंकि, केंद्रीय पूल से या अन्य राज्यों से आए आब्जर्वर भी होते तो किसी ना किसी सत्ताधारी दल की सरकार के मातहत काम करने वाले अधिकारी होते हैं।

आयोग के अपने अधिकारी पूरे समय उसके मातहत होंगे और वो अपनी पदोन्नति से लेकर गोपनीय रिपोर्ट तक के लिए आयोग पर निर्भर होंगे।

इसके अलावा यह भी जरुरी है कि राज्य और उसके अधिकारी चुनाव के दौरान हुई अधिकारिक कार्यवाही और राजनैतिक दलों के नेताओं पर दर्ज हुई एफ़आईआर से लेकर अन्य निर्णयों के लिए चुनाव के बाद भी आयोग के प्रति जवाबदार हों। इसके हेतु आयोग को विशेष शक्तियां देने के लिए संसद को जनप्रतिनिधित्व कानून और चुनाव संचालन नियम में आवश्यक बदलाव लाना चाहिए।

अगर देश की संसद इस जवाबदारी से पीछे हटती है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट को आगे आना चाहिए।

आयोग के निष्पक्ष चुनाव के आयोग के संवैधानिक अधिकार को जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर परिभाषित कर विस्तारित किया है, उसी तरह उसे इस शक्ति का भी विस्तार करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह ईवीएम बनाम अधिकारी वाली स्थिति पैदा हो जाएगी, जहाँ ईवीएम की निष्पक्षता चुनाव अधिकारी की पक्षधरता की भेट चढ़ जाएगी। 

(अनुराग मोदी, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, समाजवादी जन परिषद)  

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