मोदी मैजिक या मीडिया मैडनैस ?

कांग्रेस ने जो भी गलतियां कीं, उसकी सजा उसने देर-अबेर भुगती है। सवाल तो उससे पूछे जाएंगे जो सरकार चला रहा है। क्या अपने पागलपन में मीडिया इस बुनियादी सत्य को भी भूल गया है?...

ललित सुरजन

ललित सुरजन

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। उन्होंने तीन-चौथाई से अधिक सीटों पर विजय दर्ज की। भाजपा ने यही प्रदर्शन समीपवर्ती राज्य उत्तराखंड में दोहराया।

पंजाब में कांग्रेस ने दो-तिहाई से अधिक सीटें जीतीं। वहां उसे भी प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ।  गोवा एवं मणिपुर में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने में थोड़ी कसर रह गई किंतु उसे दोनों प्रांतों में सबसे बड़ा दल होने का श्रेय मिला।

गोवा और उत्तराखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री चुनाव हार गए।

मणिपुर में मुख्यमंत्री इबोबी सिंह व पंजाब में प्रकाश सिंह बादल जीते जबकि उ.प्र. में अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ा ही नहीं।

आम आदमी पार्टी जो पंजाब तथा गोवा में सरकार बनाने का सपना देख रही थी, वह चूर-चूर हो गया। गोवा में उसे एक भी सीट नहीं मिली और उसके मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा।

आप को इस तथ्य से संतोष मिल सकता है कि पंजाब में वह प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरा है। यहां अकाली-भाजपा गठबंधन तीसरे नंबर पर खिसक गया व भाजपा को मात्र तीन सीटें ही मिल पाईं।

इन विधानसभा परिणामों के साथ-साथ पंजाब की अमृतसर लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा को लगभग दो लाख वोटों के भारी अंतर से पराजित किया।

ये कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पाठकों के ध्यान में होंगे।

उत्तरप्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला प्रदेश है। यहां लोकसभा व विधानसभा की भी सर्वाधिक सीटें हैं। अभी जिन राज्यों में चुनाव हुए उनमें पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड इन चारों को मिलाकर तीन सौ से कम सीटें होती हैं, जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं। यही नहीं, वर्तमान में देश का प्रधानमंत्री भी लोकसभा में उ.प्र. वाराणसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।

यह भी कहा जाता है कि उ.प्र. देश की राजनीति की दिशा निर्धारित करता है। इन वजहों से उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम अपना अलग महत्व रखते हैं। इसीलिए मीडिया का ध्यान भी अभी-अभी संपन्न चुनावों में उ.प्र. पर ही केंद्रित रहा आया। भूले-भटके पंजाब की चर्चा भी हुई, लेकिन मणिपुर का कवरेज करने में मीडिया ने अंत-अंत तक भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

जिस इरोम शर्मिला का अनशन बरसों तक बार-बार सुर्खियों में आता रहा, जिस पर सैकड़ों लेख व संपादकीय लिखे गए, उसके चुनाव क्षेत्र तक भी शायद ही कोई पत्रकार गया हो।

बहरहाल, उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत से पार्टी जितनी गदगद है, हमारा तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया उससे कम गदगद नहीं है। 

टी.वी. पर ऐसे दृश्य भी दिखाए गए जिसमें चैनलों के स्वनामधन्य पत्रकार अपने स्टूडियो में भाजपा नेताओं के हाथ से लड्डू खा रहे हैं।

उ.प्र. में भाजपा की जीत को ‘मोदी मैजिक’ की संज्ञा दी गई। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। जिस प्रदेश में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का कोई घोषित उम्मीदवार न हो और स्वयं प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार में एक माह से अधिक समय तक अनथक परिश्रम कर रहे हों तो इसे उनकी जादूगरी ही मानना चाहिए।

ऐसी ऐतिहासिक विजय प्राप्त होने के पीछे क्या कारण थे, इसे लेकर विश्लेषण प्रारंभ हो गया है और आगे भी चलता रहेगा, लेकिन अगर एक शब्द में बात समेटना है तो कहना होगा कि भाजपा का चुनाव प्रबंध सबसे तगड़ा था।

इस बड़ी विजय के बाद नरेंद्र मोदी व भाजपा दोनों को आल्हादित होने के साथ-साथ संतुष्ट भी होना चाहिए था।

स्वयं श्री मोदी ने कहा कि चुनाव बहुमत से जीते, लेकिन शासन सर्वमत से चलेगा। कहने की बात अलग। करने की बात अलग। गोवा व मणिपुर में भाजपा ने जो खेल खेला, उसने उ.प्र. की बड़ी जीत की गरिमा और चमक को धूमिल कर दिया है।

हम नहीं समझ पा रहे हैं कि इन दो छोटे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को अपनी सरकार बनाने की हड़बड़ी क्यों थी और उसके लिए तोड़-फोड़ का सहारा उसने क्यों लिया? यह एक नैतिक प्रश्न है, जिसका उत्तर भाजपा से अपेक्षित है।

यह स्थापित परंपरा है कि स्पष्ट बहुमत न मिलने की दशा में सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है और उसे बहुमत सिद्ध करने के लिए उचित समय दिया जाता है। 

गोवा व मणिपुर दोनों में कांग्रेस सबसे बड़ा दल है। यही नहीं, गोवा में जहां मुख्यमंत्री और अन्य छह मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा है, वहीं मणिपुर में निवर्तमान मुख्यमंत्री को सर्वाधिक मतों से विजय प्राप्त हुई है। दोनों प्रदेशों में जनादेश इस तरह कांग्रेस के साथ गया है। इस वास्तविकता की भाजपा तो अनदेखी कर ही रही है, मीडिया भी भांति-भांति के तर्क भाजपा के समर्थन में दे रहा है।

कारपोरेट मीडिया के स्वामियों का सत्तारूढ़ दल के साथ प्रेम होना सहज है, लेकिन पत्रकारिता की भी कुछ मर्यादाएं हैं, जिन्हें इस वक्त भुला दिया गया है। मीडिया खोज-खोज कर बता रहा है कि कांग्रेस राज में क्या-क्या होता था। अरे भाई, कांग्रेस ने जो भी गलतियां कीं, उसकी सजा उसने देर-अबेर भुगती है। आज भी कांग्रेस सत्ता से बाहर है। सवाल तो उससे पूछे जाएंगे जो सरकार चला रहा है। सुशासन देने का प्रथम और अंतिम दायित्व तो उसी पर है। क्या अपने पागलपन में मीडिया इस बुनियादी सत्य को भी भूल गया है?

यहां सवाल दो छोटे राज्यों में जोड़-तोड़ कर सत्ता प्राप्त करने तक सीमित नहीं, बल्कि उससे बहुत बड़ा है।

भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा राजनैतिक लाभ के लिए एक लुभावना और चुटीला कटाक्ष हो सकता है, लेकिन ठोस वैचारिक धरातल पर यह तो सोचना होगा कि क्या विपक्ष के बिना जनतंत्र चल सकता है।

राहुल गांधी ने उ.प्र. विजय पर नरेंद्र मोदी को बधाई संदेश दिया था। इसका उत्तर प्रधानमंत्री ने जनतंत्र की जीत हो जैसी विवेकपूर्ण टिप्पणी से दिया था। प्रधानमंत्री का यह उत्तर पत्रकारों और राजनैतिक टीकाकारों ने पढ़ा होगा। फिर क्या उन्हें प्रश्न नहीं उठाना चाहिए कि गोवा व मणिपुर में संसदीय परिपाटी का उल्लंघन करने में जनतंत्र की जीत है या हार?

यह ध्यान देने योग्य है कि हिंदी-भाषी प्रदेशों को छोड़कर अधिकतर अन्य प्रांतों में गैर-भाजपाई सरकारें हैं। अहिंदी भाषी गुजरात में भाजपा है तो हिंदी-भाषी बिहार में गैर-भाजपाई गठबंधन की सरकार है। असम में अवश्य भाजपा है। इस परिदृश्य में यदि भाजपा की कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा येन-केन-प्रकारेण सफल भी हो जाए तो जो क्षेत्रीय दल विभिन्न राज्यों में सत्तासीन हैं, उनका भविष्य क्या होगा? क्या भाजपा उन्हें भी निशाने पर लेगी? तब क्या भारत चीन की तरह एक पार्टी शासन वाला देश बन जाएगा?

1967 में भारतीय जनता पार्टी ने अपने पूर्ववर्ती अवतार जनसंघ के रूप में पहली बार सत्ता का स्वाद चखा था। डॉ. लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद के नारे के फलस्वरूप सारे विपक्षी दल एकजुट हुए थे और अनेक प्रांतों में संविद याने संयुक्त विधायक दल की सरकारें बन गई थीं। तब जनसंघ, समाजवादी और कम्युनिस्ट सब एक साथ थे। कालांतर में जनसंघ (फिर भाजपा) ने एक-एक कर सबको ग्रस लिया। अन्य दलों के पराभव की नींव पर भाजपा ने अपने सपनों का महल बनाया।

अभी कुछ प्रेक्षकों ने गठबंधन सरकारों का दौर समाप्त हो जाने का ऐलान किया है। वस्तुस्थिति इसके परे है। जम्मू-कश्मीर से लेकर आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र तक भाजपा की गठबंधन सरकारें चल रही हैं। पंजाब में भी गठबंधन है और उत्तर प्रदेश में भी। गोवा, मणिपुर, नगालैंड में भी यही स्थिति है। कांग्रेस का भी बिहार में गठबंधन है तथा उत्तरप्रदेश में भी।

पिछला अनुभव बताता है कि भाजपा अपने गठबंधन सहयोगियों को कभी भी छोड़ या तोड़ सकती है। इस परिस्थिति में गैर-भाजपाई दलों खासकर कांग्रेस, समाजवादी, साम्यवादी, रूठे कांग्रेसी- सबके सामने अच्छा मौका है कि वे एक मजबूत गठबंधन बना सकें। इसमें पहल राहुल गांधी को करना होगी। लालू प्रसाद उनकी मदद कर सकते हैं।

हमें लगता है कि उ.प्र. के परिणाम आने के बाद राहुल-अखिलेश को लखनऊ में संयुक्त प्रेस वार्ता लेकर घोषणा करना चाहिए थी कि उनका गठबंधन जारी रहेगा। अगर राहुल गांधी वक्त की नज़ाकत समझते हुए उचित निर्णय लेने में असफल हुए तो उनकी जगह कोई न कोई तो आगे आएगा ही। यदि अखिलेश, कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल आदि मिलकर कोई संयुक्त मोर्चा बना लें तो एक नई संभावना के द्वार खुलते हैं।

अंत में इरोम शर्मिला की बात।

उन्होंने मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ा और मात्र नब्बे मत पाए। इस पर सोशल मीडिया में बहुत बातें हो रही हैं। शर्मिला के त्याग, बलिदान, संघर्ष को याद किया जा रहा है। काश कि जो लोग इतनी सहानुभूति प्रदर्शित कर रहे हैं, वे मणिपुर उनके चुनाव प्रचार के लिए चले जाते। जनता को पता चलता कि देशवासी इरोम शर्मिला चानू को कितना प्यार करते हैं, कितना आदर देते हैं।

मेरी राय इस बारे में भिन्न है।

शर्मिला को चुनाव लड़ना ही क्यों था? यही गलती मेधा पाटकर ने की थी। महात्मा गांधी कभी चुनाव नहीं लड़े।

आप तय कीजिए कि आपको सत्ता की राजनीति करना है या विचारों की। सत्ता में आना है तो उसके लिए तंत्र को समझकर पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरना चाहिए। भावनाओं से बात नहीं बनती।

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