सुनीता चाहती है - तुम बोलो गुरमेहर

तुम्हें बलात्कार और हमले की धमकी भी मिली है! कमाल यह है; तुम्हारे दिमाग में भरे इस ज़हर का पता उन्हें तब चला, जब तुमने सत्ता की एजेंट संस्थाओं के गुंडों की हिंसा पर सवाल उठाया!...

सुनीता चाहती है - तुम बोलो गुरमेहर

प्रिय गुरमेहर,

जब से तुम्हारा मामला सुना है, तब से मेरे विचारों में सुनीता आदिवासी का चेहरा घूम रहा है। और तब से यह पत्र लिखने का सोच रहा था, मगर सही शब्द नहीं मिल रहे थे।

मुझे, तुम्हारे और सुनीता के बीच एक अजीब सा रिश्ता सा महसूस हुआ; लगा तुम दोनों का कोई नाता है। तुम दोनों ने अपने पिता को खोया है - इसलिए तुम्हारा विडियो देखने के बाद मुझे तुम्हारे प्रति एक संवेदना का एह्सास हुआ। तुम दोनों ने कम उम्र में सत्ता की सोच से टक्कर ली; दोनों के पिताओं ने अपने-अपने तरह से शहादत दी। लेकिन सुनीता जैसी हजारों आदिवासियों लड़कियों की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है, क्योंकि उनके पिता ‘सरकारी शहीद’ नहीं है। तुम्हें सरकार, मीडिया और लोग सुन रहे हैं – इसलिए तुम बोलो! अपने लिए नहीं, तो सुनीता जैसी लड़कियों के लिए बोलो!  

हम आगे बढ़े, उसके पहले मैं सुनीता से तुम्हारा परिचय करवा दूं: इतिहास में गोंडवाना और अंग्रेजों के समय ‘मध्य भारत’, वर्तमान में म. प्र. राज्य में पड़ने वाले दूरस्थ, दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसे वनग्राम ढेगा में रहने वाली अल्हड़, चंचल, बेबाक और निडर साधारण आदिवासी लडकी। जो वर्ष 2007 में, अपनी चचेरी बहन के साथ अपने ईलाके के स्कूल में आठवीं में 61% से उतीर्ण होने वाली उस इलाके की पहली लडकी बनी। तुम जिस लेडी श्रीराम कॉलेज में पड़ती है, वहां दाखिले के लिए तो 95% अंक भी कम है। सुनीता बड़े ही उत्साह से आगे की पढाई के लिए जिला मुख्यालय हरदा गई, मगर गाँव में हुए सत्ता के इस दमन ने सुनीता को आगे पढने के लायक ही नहीं छोड़ा।  

सत्ता के दमन ने उसे मानसिक रूप से बीमार कर दिया: वो आज भी मानिसक बीमारी के लिए दवाईयां लेती है।

Anurag Modiमैं सुनीता को जानता हूँ: वो लिख सकती तो क्या लिखती, इसलिए, मैं सुनीता जैसी आदिवासी लड़कियों की बात तुम तक पहुँचाने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ।     

प्रिय गुरमेहर,

तुम्हारे पिता को सरकार अपना शहीद मानती है, और तुम कहती हो: तुम्हारे पिता को पाकिस्तान ने नहीं; युद्ध ने मारा है! उनकी मौत पर सरकार का हक़ है; वो तय करेगी, वो युद्ध में मरे या उन्हें पाकिस्तान ने मारा, उसके तुम नहीं!

अगर तुम ऐसा कहोगी, तो उनकी मौत सरकार के किस काम की? इसलिए वो कह रहें है: 20 साल की छोटी सी उम्र में, तुम्हारे दिमाग में कोई ज़हर भर रहा है; तुम युद्ध पर सवाल उठा अपने शहीद पिता की आत्मा को दुःख पहुँचा रही हो! सरकार और कुछ क्रिकेटर, हीरो, कुश्तीबाज़ सब इस बात से बैचेन है।

तुम्हें बलात्कार और हमले की धमकी भी मिली है!

कमाल यह है; तुम्हारे दिमाग में भरे इस ज़हर का पता उन्हें तब चला, जब तुमने सत्ता की एजेंट संस्थाओं के गुंडों की हिंसा पर सवाल उठाया!

वहीं मेरे पिता की मौत मेरी अपनी है। मेरे पिता भी एक शहीद हैं, हालाँकि उनकी शहादत को सरकारी सील अभी तक नहीं मिली है और न ही कभी मिलेगी। वो हम ‘आदिवासियों के लिए ‘शहीद’ है। इसलिए, उनकी मौत पर मैं कुछ भी बोलूँ, सरकार और उसके एजेंटों को इस बात से कई बेचैनी होने वाली नहीं। अपनी मौत मरने का यह फायदा है।

तुम्हारे पिता आज़ाद देश के लिए लड़े। लेकिन यहाँ तो हम आदिवासियों के लिए आजादी की लड़ाई अभी भी जारी है। क्योंकि, हमारे गाँव में जमीन, पानी और जंगल सबको अंग्रेजों ने छीन लिया था; वो सब सरकारी संपत्ति कहलाए।

हमें आज भी अंग्रेजों के बनाए कानूनों और तरीकों से हांका जाता है; हमारे साथ गुलामों जैसा व्यव्हार होता है। इसलिए आज़ादी क्या होती है ये हमने कभी महसूस ही नहीं किया।

यहाँ तुम लड़ाई का मतलब बन्दूक वाली लड़ाई से मत निकालना। हम तो गांधी के तरीकों से लड़ने वाले लोग है। मेरे पिता आदिवासियों के हक़ को लेकर चल रहे आन्दोलन के नेता थे। कई सालों से सत्ता के कहर को सहन कर रहे थे; सरकारी दमन और दर्जनों झूठे मामलों से जो तनाव हुआ उससे उन्हें कैंसर हो गया।

तुम जानती ही होगी- कैंसर का प्रमुख कारण मानसिक तनाव भी है। कैंसर से लड़ते लड़ते एक दिन वो हार गए और हमें छोड़ कर चले गए।

इस लड़ाई में मेरी माँ और पिता पर लगभग एक दर्जन अपराधिक मामले लग गए थे। उन दोनों पर सरकारी कर्मचारियों के आपहरण और डैकेती तक का आरोप था; जबकि उलटे वो उनके हमले में वो घायल हो गए थे। आजतक सरकार एक भी मामले को साबित नहीं कर पायी है लेकिन हम अदालत और कचहरी के चक्कर में फिर भी पिस रहे हैं.

तुम्हें जानना हो गुलामी क्या है, मैं किस गुलामी की बात कर रही हूँ, मैं इसे गुलामी का नाम क्यों दे रही हूँ, तो तुम्हे यहाँ आना होगा, मेरे गाँव

तुम पर अपने शहर में कहीं घूमने-जाने पर अपराध नहीं बनता है; हमारे यहाँ हमारे घर के चारों तरफ सरकार का जंगल है, उसमें घुसने भर में केस दर्ज हो जाता है।

हालांकि, सरकारी अफसर, नेता और दलाल लोग कहते हैं : पहले सब ठीक था; जब से संगठन वालें आए हैं, उन्होंने आदिवासियों को बरगला दिया है। 15 साल पहले; संगठन आने के पहले, हमारे गाँव में वन विभाग का बीट गार्ड (वन विभाग का सबसे छोटा अफसर) ‘महराज’ कहलाता था – वो हमारा माई-बाप और सरकार भी था; दूसरा, पुलिस का हवालदार और तीसरा, राजस्व का पटवारी। यह हमारे ब्रह्मा, विष्णु और महेश थे। इनकी कृपा के बिना हमारे घर में चूल्हा भी नहीं जल सकता था। संगठन वालों ने समझाया: आज़ाद देश में, यह गुलामों जैसा क्यों जग रहे हो? तुम आदिवासी हो; याने, आदि काल से निवास करने वाले। जंगल तुम्हारा है। ऐसा कानून भी कहता है।

वन विभाग तो अंग्रेजों ने बनाया। उन्होंने हमारे मन का डर निकाला! बोला- एकता बनाओ और गुलामी बंद करो। तो, मेरा माय-बाप और बाकी गाँव वाले वनविभाग को ‘बोल्या’ : हम आज से बेगारी और गुलामी नहीं करेगा’। आस-पास के गाँव वाले भी ऐसा ही ‘बोलन लग्या’। हमारी बात सही थी, इसलिए सरकार को डर लगने लगा। ‘उन सोच्या’ : ‘अगर इन आदिवासी होन को चुप नहीं करया’ और जंगल पर इनका हक़ मान गया, तो कल और लोग ‘उठेगा’।  

सुना है: तुम्हारे यहाँ सारा विरोध और धमकियां आभासी दुनिया यानि ट्विटर और और फेसबुक पर ही दी जाती है। हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता है। यहाँ विरोध और प्रतिक्रिया; हमला और प्रतिरोध सब मैदान में सीधा सीधा आमने-सामने असल में होता है। हमें धमकी नहीं मिलती है, सीधे कार्यवाही होती है। मैं खुद भी इसका शिकार हूँ।

जब मैं हरदा में स्कूल से छुट्टियों में अपने गाँव आई थी और अपनी माँ के साथ अपने खेत में काम कर रही थी, तब वन विभाग और पुलिस के 100 लोगों के दल ने हमें घेर लिया; बोला: तुम सरकारी जमीन पर खेती कर रहे हो। और, उल्टा 17 की उम्र में वनकर्मियों के दल के आपहरण का मामला दर्ज मुझ पर और मेरे माँ पिता पर और अन्य गाँव वालों पर दर्ज कर दिया; इसकी सुनवाई आज भी अदालत में ज़ारी है।

थक गए हैं हम लोग ये साबित करते हुए कि जिस ज़मीन पर हम खेती कर रहे थे वो हमारी ही है और न ही हमने किसीका कभी अपहरण किया है।

यह सारे मामले हमें परेशान करने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से रोकने के लिए लगाए जाते है। एक पेशी पर सुनवाई के लिए हरदा आना ही हमारे लिए किसी सजा से कम नहीं है; एक दिन की मजूरी तो जाती ही जाती है, ऊपर से वकील और आने-जाने का मिलाकर 200 रु. की चपत लग जाती है।

इतने मामले हैं, महीने में कई बार तीन पेशी होती है। हम जितना अपने खाने पर खर्च नहीं करते है, उससे ज्यादा तो पेशियों में आने-जाने में खर्च हो जाता है। वहां न वकील हमारी भाषा समझता है और ना जज।

तुम कहोगी इस सबको को लेकर कोर्ट क्यों नहीं गए?

हमें कोर्ट तभी पता चलता है, जब पुलिस बांधकर ले जाती है; बाकी ये कोर्ट हमारे किसी काम का नहीं है। वैसे भी सुना है: कोर्ट न्याय नहीं; कानून के अनुसार फैसला सुनाए है, और कानून तो आज भी अंग्रेज का चले है! तो फिर कोर्ट में न्याय कैसे मिलेगा? और कोर्ट ना हमारी भाषा समझे ना मुद्दा, ना हमारी सोच ही समझे: हमें जंगल और अपने गाँव की जमीन पर अधिकार और पट्टा नहीं चाहिए; बल्कि, उस पर जीने और उसे जीने देने की बात तय करने का हक़ और आजादी चाहिए।

फिर भी, संगठन के कार्यकर्त्ता पिछले 13 साल से जबलपुर कोर्ट [म. प्र. हाई कोर्ट] और दिल्ली के कोर्ट [सुप्रीम कोर्ट] तक चक्कर लगाया रिया है।

दिल्ली के कोर्ट ने यह माना: सरकारी अफसर हमें झूठे केस में फंसाते है; और हमारी रिपोर्ट भी नहीं लिखते। हमारे मामले में जाँच के लिए एक कमेटी भी बनाई है; मगर, सरकार उसे भी काम नहीं करने देती।     

   सत्ता और उसके एजेंट तुम्हे और हमें इसलिए चुप कराना चाहती है, क्योंकि उन्हें डर है। अगर आज एक को चुप नहीं किया, तो कल दस खड़े होंगे

सरकार उसकी सोच पर सवाल उठाने वालों से डरती है। फिर वो चाहे दिल्ली की गुरमेहर का सवाल हो या आदिवासी गाँव ढेगा की सुनीता का।

प्रिय गुरमेहर, सत्ता के इस दमन ने मुझे चुप सा कर दिया है; मैं अपनी बात अब उस तरह से नहीं रख पाती हूँ। लेकिन मेरा गुस्सा अब भी मेरी माँ की आवाज़ में झलकता है; हमारी लड़ाई आज भी जारी है। लड़ाई से हटने का विकल्प हम नहीं चुन सकते। क्योंकि, चुप रहेंगे तो भी मार दिए जाएंगे। बेहतर है: बोलकर मरना! इसलिए तुम बोलो!

तुम बोलो, क्योंकि तुम्हारे पिता सरकारी शहीद है। तुम बोलो, क्योंकि तुम दिल्ली के ख़ास कॉलेज में पड़ती हो। तुम बोलो, क्योंकि तुम्हारे पास अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के नए साधन है। तुम बोलो- क्योंकि सरकार तुम्हें सुन रही है। सरकार हमको नहीं सुनती- फिर भी हम बोलतें है। तुम अपने लिए ना सही, हमारे लिए बोलो।

सुनीता की ओर से

अनुराग मोदी  

(लेखक, समाजवादी जन परिषद् की राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य हैं)

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