क्या मीडिया तीन तलाक के मामले को आवश्यकता से अधिक महत्व दे रहा है?

क्या देश में इससे और अधिक गम्भीर समस्याएँ नहीं हैं, जिन पर वाद-विवाद हो सकता है? या फिर यह एक सोचा समझा राजनीति प्रायोजित षड्यंत्र है?...

क्या मीडिया तीन तलाक के मामले को आवश्यकता से अधिक महत्व दे रहा है?

स्थिति तो कुछ और ही है।

तल्हा मन्नान ख़ान

शाम में फुरसत के वक्त आप टीवी चालू करके बैठ जाइए, बहुत मुमकिन है आपको किसी न किसी मीडिया चैनल पर ट्रिपल तलाक के मामले पर गर्मा-गर्म बहस चलती हुई मिल जाए। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया कि क्या समस्या वाकई इतनी बड़ी है कि उस पर घंटों बहस की जाए? प्राइम टाइम्स चलाए जाएँ? क्या देश में इससे और अधिक गम्भीर समस्याएँ नहीं हैं, जिन पर वाद-विवाद हो सकता है? या फिर यह एक सोचा समझा राजनीति प्रायोजित षड्यंत्र है?

प्रश्न कई हैं लेकिन अगर कोई सामान्य व्यक्ति भी स्वयं अपनी बुद्धि का प्रयोग करके सोचे तो समझते देर नहीं लगेगी कि इस मामले को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व और समय दिया जा रहा है जबकि समस्या इतनी बड़ी नहीं है।

बीते दिनों ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की विमेन विंग ने अपने सर्वेक्षणों पर आधारित एक रिपोर्ट मीडिया के सामने रखी है जिसमें यह सामने आया है कि मुस्लिम समुदाय में अन्य समुदायों के मुक़ाबले तलाक का प्रतिशत अत्यंत कम है और तीन तलाक का मुद्दा गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।

पूरे देश के कुछ मुस्लिम केंद्रित जिलों में फैमिली कोर्ट में इकट्ठा किए गए आँकड़ों को साझा करते हुए, विंग की मुख्य संयोजक अस्मा ज़ोहरा ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं को अच्छी सुरक्षा प्रदान की जाती है, जो तलाक के मामलों में मुस्लिम महिलाओं के कम प्रतिशत से परिलक्षित होता है। कुछ लोग एक ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय में तलाक का अत्यंत उच्च दर है। यह मुस्लिम समुदाय को, दुर्व्यवहार करने और महिलाओं के अधिकार के नाम पर तोड़ने का प्रयास है।

अस्मा कहती हैं कि फैमिली कोर्ट से डेटा एकत्र करने का काम पिछले साल मई में शुरू हुआ था जिसके तहत 2011 से 2015 के पांच साल तक मुस्लिम केंद्रित जिलों में पारिवारिक अदालतों से आरटीआई के ज़रिये आँकड़ों की मांग की गई थी जिसमें सोलह परिवार अदालतों ने विस्तृत समेकित रिपोर्ट पेश की। हमने इस रिपोर्ट को संकलित किया है जिसमें पता चलता है कि तलाक की दर मुस्लिम समुदाय में कम है। इसी तरह, हमने विभिन्न दारूल कज़ा से भी ब्योरा एकत्र किया है, जो यह संकेत देते हैं कि केवल दो से तीन प्रतिशत मामले ही तलाक से संबंधित हैं जिनमें से ज़्यादातर महिलाओं द्वारा ही शुरू किए गए थे। विदित हो कि दारुल क़ज़ा एक इस्लामी शरीयत अदालत है।

मुसलमानों के लिए शरीयत समिति के समन्वय में मुस्लिम महिला अनुसंधान केंद्र द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय में तलाक के मामलों की संख्या 1,307 तथा हिंदू समुदाय में 16,505 थी। इन जिलों में ईसाई समुदाय में तलाक के 4,827 मामले तथा सिख समुदाय में मात्र 8 मामले सामने आए। ये आंकड़े कन्नूर (केरल), नासिक (महाराष्ट्र), करीमनगर (तेलंगाना), गुंटूर (आंध्र प्रदेश), सिकंदराबाद (हैदराबाद), मलप्पुरम (केरल), एरनाकुलम (केरल) और पलक्कड़ (केरल) के आठ जिलों में से हैं।

अस्मा ने कहा कि आंकड़ों के संकलन पर अभी भी काम चल रहा है। गत वर्षों में ट्रिपल तलाक का मुद्दा ज़ोरों से उठाया गया और इसका राजनीतिकरण किया गया। इस मुद्दे को सही तरीके से और सही परिपेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। इस्लाम ने महिलाओं को स्वतंत्रता दी है और वे समुदाय में अच्छी तरह से सुरक्षित हैं।

उन्होंने कहा कि अन्य समुदायों में भी दहेज, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, स्त्री भेदभाव जैसे महिलाओं को प्रभावित करने वाले अन्य जलते मुद्दे हैं। सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय को केंद्र बनाने की बजाये इन मुद्दों को भी विशेष रूप से संबोधित किया जाना चाहिए। यह समय है जब मुस्लिम महिलाओं को शरीयत एवं इस्लाम द्वारा उन्हें दिए गए अधिकारों के बारे में जानना चाहिए। काम करने वाली मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे पर, उन्होंने कहा कि उनकी सुरक्षा को सबसे महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

मीडिया घरानों को सोचना होगा कि क्या वे भी राजनीति से प्रेरित होकर खबर चलाएँगे या फिर मीडिया को राजनीति से अलग रखकर एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में कार्य करेंगे। यदि वे सिर्फ़ अपनी टीआरपी की होड़ में नहीं शामिल होते तो मीडिया चैनलों को ऐसी बहसों से बचना होगा जो समाज तोड़ने का कार्य करती हैं।

स्रोत -

http://indianexpress.com/article/india/divorce-rate-among-muslims-low-compared-to-other-communities-report-4605196/

http://www.thehindu.com/news/national/muslim-community-has-a-low-rate-of-divorce/article17901208.ece

 

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