जेएनयू को बंद करने के रास्ते पर अघोषित तौर पर कदम बढ़ा दिया मोदी सरकार ने

मोदी सरकार यदि अपने मकसद में कामयाब हो गई तो जो छात्र -छात्रायें जेएनयू में प्रवेश लेकर पीएचडी /शोध/एमफिल करने के सपने देखते हैं, उनके सपने कभी पूरे नहीं होंगे।...

अतिथि लेखक

अजीत सिंह यादव

मोदी सरकार ने जेएनयू को बंद करने के रास्ते पर अघोषित तौर पर कदम बढ़ा दिया है।

मोदी सरकार यदि अपने मकसद में कामयाब हो गई तो जो छात्र -छात्रायें जेएनयू में प्रवेश लेकर पीएचडी /शोध/एमफिल करने के सपने देखते हैं, उनके सपने कभी पूरे नहीं होंगे।

मोदी सरकार ने छात्रों के लिए जेएनयू के रास्ते बंद करने के लिए भारी सीट कटौती की है। 1000 सीटों से अधिक पर पीएचडी व एमफिल में प्रवेश की जगह इस साल केवल 194 सीटों पर प्रवेश लिया जाएगा।

यह कोई सामान्य सीट कटौती नहीं कही जा सकती। सरकार इसके लिए छात्र -शिक्षक अनुपात के नियम का हवाला दे रही है। यदि इसे पूरे देश के हर विश्वविद्यालय पर लागू कर दिया जाये तो सभी विश्वविद्यालयों को बंद कर देना पड़ेगा।

कहीं भी छात्र -शिक्षक अनुपात नियमानुसार नहीं है। हर विश्वविद्यालय में शिक्षकों के पद वर्षों से खाली पड़े हैं, लेकिन उनपर भर्ती नहीं की गई हैं।

सवाल उठता है कि यह शिक्षकों की यह भर्तियां किसे करनी थीं या करनी हैं ? जाहिर है केन्द्र व प्रदेश सरकारों को बड़े पैमाने पर रिक्त शिक्षकों के इन पदों पर भर्तियां करनी थीं लेकिन नहीं की गईं।

मोदी सरकार को भी बने तीन साल हो गये इन तीन सालों में जेएनयू समेत अन्य विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को क्यों नहीं भरा गया, मोदी सरकार इसका जबाब देने से बच नहीं सकती।

उत्तर प्रदेश में भी पिछले दस वर्षों से विश्वविद्यालयों व डिग्री कालेजों में एक भी शिक्षक नियुक्त नहीं हुआ है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षकों की तत्काल भर्ती करने का आदेश देते हुए कहा था कि इन शिक्षण संस्थाओं में केवल प्रवेश लिए जाते हैं और परीक्षायें ली जाती हैं कुछ नहीं होता तो वह है पढ़ाई। जोकि बिना शिक्षकों के सम्भव नहीं है।

देखा जाये तो जेएनयू में देश के अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में छात्र -शिक्षक अनुपात के अनुसार कहीं अधिक शिक्षक हैं, फिर भी जेएनयू में इस तर्क को देकर जिस बडे पैमाने पर सीट कटौती की गई है, उससे मोदी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होना लाजिमी है।

यदि सरकार की नीयत सही है तो उसे सीट कटौती की जगह एकेडमिक सत्र शुरू होने से पहले ही शिक्षकों के रिक्त पदों को भरकर छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की कमी दूर कर देनी चाहिये थी। लेकिन शिक्षकों की कमी दूर करने की जगह भारी पैमाने पर सीटें घटाकर छात्रों को ही कम करने के जिस रास्ते पर सरकार बढ चली है यह गलत दिशा है।

मामला केवल जेएनयू का नहीं है। दरअसल मोदी सरकार की असली मंशा सरकारी विश्वविद्यालयों में सीटों की कटौती कर उन्हें बंद कर निजी विश्वविद्यालयों के लिए रास्ता साफ करने की है। यह उच्च शिक्षा को पूरी तरह निजी हाथों /कारपोरेट घरानों /शिक्षा माफियाओं के हाथों में देने की साजिश है.

जिस तरह प्रइमरी शिक्षा पूरी तरह निजी पब्लिक स्कूलों के जरिये शिक्षा माफियाओं के हवाले कर दी गई अब उच्च शिक्षा में भी वही प्रयोग दोहराया जा रहा है। यह पूरी तरह देश के हितों के खिलाफ है। सरकार इसमें सफल हो गई तो गरीबों -किसानों की बात तो छोड़िये मध्य वर्ग के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा के रास्ते बंद हो जायेंगे। इसलिए हर भारतीय का फर्ज बनता है कि वह सरकार के कदम का विरोध करे और सरकार को अपने मकसद में कामयाब न होने दे।

अजीत सिंह यादव, लेखक जय किसान आन्दाेलन (स्वराज अभियान ) के राष्ट्रीय सहसंयाेजक हैं

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