मोदी का नया भारत : कितना नया, कितना पुराना और कितना जुमला

मोदी जी के बाकी सपनों की तरह, ऐसा नया भारत भी नया तो नाम को ही होगा। हां! पुराने भारत से ज्यादा सांप्रदायिक, कम लोकतांत्रिक और ज्यादा ‘मसीहा पूजक’ जरूर हो सकता है.. हमें इस नए भारत से डरना चाहिए...

मोदी का नया भारत : कितना नया, कितना पुराना और कितना जुमला

राजेंद्र शर्मा

पांच राज्यों के विधानसभाई चुनाव के बाद और खासतौर पर उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की झाड़ूमार कामयाबी के फौरन बाद, सपनों के कामयाब सौदागर नरेंद्र मोदी ने देश और जनता के सामने एक और सपना पेश कर दिया। नये भारत का सपना।

जीत के मौके पर अपने अभिनंदन के प्रत्युत्तर में अपनी पार्टी के उत्साहित कार्यकर्ताओं से नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह इन चुनाव नतीजों में नये भारत की नींव पड़ती देख रहे हैं। इस नये भारत की सूरत-शक्ल तो उन्होंने नहीं बताई पर अपने संबोधन में और अपने ब्लाग के जरिए और आगे चलकर अपनी ‘मन की बात’ के जरिए, उन्होंने 2022 तक कायम होने वाले नये भारत की तीन विशेषताओं की ओर इशारा जरूर किया।

नया भारत, 65 फीसद युवा आबादी तथा ज्यादा से ज्यादा अधिकारसंपन्न होती महिलाओं की, विकास की आकांक्षा से संचालित भारत होगा। इस भारत में गरीब राहतों तथा रियायतों या कृपा के बजाय, विकास के अवसर मांग रहे तथा पा रहे होंगे।

इस भारत में सरकार चुनी तो बहुमत से जाएगी, पर सर्वमत से चलेगी। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के संदर्भ में नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी की सरकार उनकी भी होगी, जिन्होंने वोट दिया और उनकी भी होगी जिन्होंने वोट नहीं दिया। उनकी भी होगी जो साथ चले और उनकी भी होगी जो सामने रहे। किसी के साथ भेदभाव, भाजपा की नीति नहीं है।

अचरज नहीं कि उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड में भाजपा की उसकी अपनी उम्मीदों से बड़ी जीत को, 2019 के आम चुनाव के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इस संदर्भ में अनेक टिप्पणीकारों ने स्वाभाविक रूप से ‘नये भारत’ के नरेंद्र मोदी के ‘लक्ष्य’ को, एक नये सपने के तौर पर लिया है, जो 2019 के आम चुनाव के लिए पेश किया जा रहा है।

2014 का आम चुनाव नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिनके सपने के सहारे लड़ा था।

खासतौर पर रोजगार के पहलू से अच्छे दिन आने के चूंकि कहीं-कोई आसार नहीं हैं, अगले चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी को एक और बड़े सपने की जरूरत होगी, जो पहले वाले सपने की विफलता को भी ढांप सके। ‘नये भारत’ का सपना बखूबी इस काम को अंजाम दे सकता है।

यहां आकर नया भारतभी वास्तव में एक जुमला ही नजर आने लगता है।

बहरहाल, यह सिर्फ एक चुनावी नारा है या इसमें कोई वास्तविक सार भी है, यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा, जब ‘नये भारत’ के खाके में कोई रंग भरे जाएंगे या नहीं भरे जाएंगे। फिर भी नरेंद्र मोदी ने इस संबंध में अब तक जो कहा है और ‘नये भारत’ की ओर बढ़ते हुए वास्तव में जो कुछ हो रहा है, उन दोनों को जोडक़र कुछ इशारे जरूर पढ़े जा सकते हैं। दुर्भाग्य से ये इशारे शुभ नहीं हैं—अशनि संकेत हैं।

‘बहुमत से चुनी गई किंतु सबकी सरकार’ और किसी के साथ भेदभाव नहीं किए जाने के प्रधानमंत्री के आश्वासन को स्वाभाविक रूप से सबसे बढक़र उत्तर प्रदेश के ही संदर्भ में देखा गया है।

मुख्यमंत्री का पद संभालते ही योगी आदित्यनाथ ने भी ‘सबके साथ बराबर का बर्ताव, पर तुष्टिïकरण किसी का भी नहीं’ की अपनी घोषणा के जरिए यह स्पष्ट कर दिया है कि वास्तव में इस आश्वासन का संदर्भ, अल्पसंख्यकों के साथ बर्ताव का है।

बहरहाल, प्रधानमंत्री के सब की सरकार देने के आश्वासन को इस संदर्भ से जोडक़र देखा जाना जरूरी है कि यह ऐसी सरकार है, जो अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व से वंचित रखने की नीति के आधार पर चुनकर सत्ता में आई है।

यह कोई संयोग ही नहीं है कि उत्तर प्रदेश की नई विधानसभा में, जहां से मोदी नये भारत की नींव पड़ती देख रहे हैं, मुस्लिम अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व पिछले अनेक दशकों के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, फिर आबादी अनुपात के आस-पास भी होने का तो सवाल ही कहां उठता है।

यह भी कोई संयोग नहीं है कि योगी की सरकार में नाम के वास्ते एक मुस्लिम मंत्री रखा गया है और उसके सिर पर भी किसी सदन के लिए चुने जाने की तलवार लटक रही है।

इसका सीधा संबंध इससे है कि इस चुनाव में शानदार कामयाबी पाने वाली भाजपा ने, एक भी मुसलमान को अपनी पार्टी का उम्मीदवार ही नहीं बनाया था। बेशक, इसके बावजूद विधानसभा में कुछ मुसलमान चुनकर पहुंच गए हैं, फिर भी मौजूदा शासन में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्वहीन ही रहना स्वत: स्पष्ट है।

इन हालात में शासन क्या सचमुच भेदभाव नहींकरने की नीति पर अमल कर सकता है, इसमें संदेह की पूरी-पूरी गुंजाइश है।

वास्तव में योगी सरकार ने आते ही जिस तरह से कथित अवैध बूचडख़ानों के खिलाफ और ‘रोमियो’ के खिलाफ मुहिम छेड़ी है, उसकी सांप्रदायिक ध्वनियां किसी से छुपी नहीं रह सकती हैं।

रोमियोविरोधी मुहिम में तो फिर भी ‘नैतिक दरोगागीरी’ थोपे जाने का ही खतरा ज्यादा है, हालांकि इसे भी कथित ‘लव जेहाद’ से लड़ाई के रास्ते से, सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है, बूचड़खानों के खिलाफ मुहिम की मार मुख्यत: अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय पर पडऩे में तो किसी संदेह की गुंजाइश ही नहीं है। ऐसी मुहिम को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली सरकार से ‘भेदभाव नहीं’ की नीति पर चलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? उल्टे मेरठ नगर निगम के मेयर का ‘वंदे मातरम’ गाने से इंकार करने वाले मुस्लिम पार्षदों को नगर निगम की कार्रवाई में ही हिस्सा न लेने देने का ऐलान, इसी की ओर इशारा करता है कि योगी राज में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व के मौकों से और ज्यादा वंचित किया जा रहा होगा।

याद रहे कि नगर निगम की बैठकों में वंदे मातरम का विवाद नया नहीं है, नया है। मेयर का इस नारे को नगर निगम की परिषद में लागू कर देना कि, ‘भारत में अगर रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा।’ खुद भाजपाई मेयर के अनुसार, इसकी शिकायत उसने लखनऊ की पिछली सरकार के समय में भी की थी, पर किसी ने उनकी नहीं सुनी। पर वह अब इसे नहीं चलने देगा! 

नगर परिषद में प्रतिनिधित्व के लिए वंदे मातरम गाने की शर्तयह भेदभाव नहीं करने का रास्ता तो हर्गिज नहीं है!

फिर भी अगर बहस के लिए हम यह भी मान लें कि भाजपा की सरकार भेदभाव नहीं करेगी, तब भी यह प्रतिनिधित्व से वंचित रखते हुए, अन्याय न करने का ही मामला होगा। यह वास्तव में अल्पसंख्यकों के, बहुसंख्यकों की सरकार के रहमोकरम पर निर्भर रहने का ही मामला होगा। वास्तव में यही हिंदू राष्ट्र की आरएसएस की कल्पना भी है—मुसलमानों को हिंदुओं की कृपा पर रहना चाहिए।

प्रधानमंत्री का दावा तो ऐसा भारत बनाने का है, जहां गरीब ‘कृपा’ के बजाय, ‘मौका’ मांगेगा और पाएगा। लेकिन, वह ऐसा राज चला रहे हैं जहां कम से कम अल्पसंख्यकों से तो मौके छीन कर, उन्हें ज्यादा से ज्यादा ‘कृपा’ के आसरे रहने की ओर धकेला जा रहा है। वास्तव में यही सच्चाई बाकी तमाम गरीबों तथा वंचितों की भी है।

कृपा पर निर्भरता से मुक्त करना तो दूर, खेतिहर आबादी और आम तौर पर लघु उत्पादन की अभूतपूर्व तबाही के जरिए, लघु उत्पादकों की लगातार बढ़ती संख्या को घर-गांव से उजाडक़र, कृपा निर्भर ही तो किया जा रहा है, जबकि उनके लिए वैकल्पिक रोजगार पैदा करने में यह सरकार पूरी तरह से विफल ही रही है।

खतरा यह है कि मोदी की कल्पना के नये भारत में गरीबों को कृपा पर निर्भरता से मुक्त कराने के बजाय, कहीं शासन से हासिल होने वाली थोड़ी-बहुत ‘कृपा’ से भी वंचित ही नहीं कर दिया जाए।

मोदी जी के बाकी सपनों की तरह, ऐसा नया भारत भी नया तो नाम को ही होगा। हां! पुराने भारत से ज्यादा सांप्रदायिक, कम लोकतांत्रिक और ज्यादा मसीहा पूजकजरूर हो सकता है। पर हमें ऐसे भारत की उत्सुकता से प्रतीक्षा करनी चाहिए या उसकी आशंका से डरना चाहिए।

 

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