पीडीपी-भाजपा 7 प्रतिशत के अपने इस परीक्षाफल से कुछ भी नहीं सीखेंगे?

मोदी सरकार और पीडीपी-भाजपा की सरकारों के तीन और दो साल के शासन कुल हासिल ये 7 प्रतिशत है... श्रीनगर उप-चुनाव में 7 प्रतिशत मतदान का अर्थ ...

हाइलाइट्स
  • मोदी सरकार और पीडीपी-भाजपा की सरकारों के तीन और दो साल के शासन कुल हासिल ये 7 प्रतिशत है
  • श्रीनगर उप-चुनाव में 7 प्रतिशत मतदान का अर्थ

राजेंद्र शर्मा

चुनाव आयोग ने आखिरकार जम्मू-कश्मीर की अनंतनाग लोकसभा सीट का 12 अप्रैल के लिए प्रस्तावित उप-चुनाव मई के आखिर तक के लिए टाल दिया है।

जाहिर है कि उपचुनावों की इसी शृंखला की कड़ी के तौर पर, 9 अप्रैल को हुए श्रीनगर लोकसभाई क्षेत्र के उप-चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा तथा उसमें 8 लोगों की मौत और उससे भी बढक़र, इस चुनाव में कुल 7.14 फीसद वोट पडऩे की पृष्ठïभूमि में ही, चुनाव आयोग का यह फैसला आया है। यह दूसरी बात है कि चुनाव आयोग ने श्रीनगर लोकसभाई क्षेत्र में 32 मतदान केंद्रों पर दोबारा वोट डलवाने के अपने फैसले के साथ बिना कहे ही श्रीनगर सीट पर हुए चुनाव को ही निरस्त करने की कई हलकों से आ रही मांगों को भी ठुकरा दिया है।

    जाहिर है कि पिछले करीब दो दशकों से विभिन्न चुनावों में जम्मू-कश्मीर में 45 फीसद के करीब या उससे भी ज्यादा वोट पडऩे को, राज्य की जनता के ‘आजादी’ के नारे को ज्यादा महत्व न देने के सबूत के रूप में सारी दुनिया के सामने पेश करती आयी भारत सरकार का, श्रीनगर में मतदान के इस अब तक के सबसे निचले आंकड़े पर बौखलाना, आसानी से समझा जा सकता है। इसका नतीजा, इस समय पर कश्मीर में उप-चुनाव कराने की चुनाव आयोग की समझदारी पर ही, खुद देश के गृहमंत्रालय द्वारा खुलेआम सवाल उठाए जाने के रूप में सामने आया है।

गृहमंत्रालय ने लगभग प्रत्यक्ष रूप से देश को यह बताना जरूरी समझा है कि चुनाव आयोग ने न सिर्फ उससे मशविरा किए बिना उप-चुनाव की तारीखें तय कर दी थीं बल्कि उसके तारीखों का एलान करने के फौरन बाद, मार्च के मध्य में गृहमंत्रालय द्वारा एक पत्र के जरिए यह समय चुनाव के लिए उपयुक्त न होने के संबंध में आगाह किए जाने के बावजूद, चुनाव आयोग अपने फैसले पर अड़ा रहा था। गृहमंत्रालय ने अगले एक-दो महीने में होने जा रहे पंचायत चुनाव के बाद ही, ये उप-चुनाव कराए जाने की सलाह दी थी।

उधर चुनाव आयोग का अपने बचाव में कहना है कि अगर इस समय पर जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव हो सकते थे, तो लोकसभाई उप-चुनाव क्यों नहीं हो सकते थे, जबकि संवैधानिक तकाजों के चलते श्रीनगर उप-चुनाव को और टाला नहीं जा सकता था।

    बहरहाल, चुनाव आयोग और केंद्रीय गृहमंत्रालय की इस खींचतान के ध्यान बंटाने के बावजूद, श्रीनगर उप-चुनाव का असली संदेश किसी से भी छुपा नहीं रह गया है।

वास्तव में चुनाव आयोग और गृहमंत्रालय की आपसी खींचतान भी जम्मू-कश्मीर के हालात को लेकर केंद्र सरकार के रुख की एक गहरी विडंबना को ही दिखाती है। एक ओर तो केंद्र सरकार, पिछले साल के उत्तराद्र्घ में बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद भडक़े लगातार विरोध प्रदर्शनों के महीनों लंबे सिलसिले में, कड़ाके की सर्दियों में आयी कमी के बाद, राज्य में सब कुछ सामान्य होने का अपना दिखावा बनाए रखना चाहती थी। केंद्र सरकार की नीति को ‘‘सख्ती’’ की नीति को सही साबित करने के अलावा राज्य में कायम पीडीपी-भाजपा गठजोड़ की सरकार को वैधता देने के लिए भी, यह दिखावा जरूरी था। और दूसरी ओर, उसी सरकार के गृहमंत्रालय को बखूबी पता था कि हालात सामान्य से ठीक उल्टे हैं। वह तो चाहता था कि चुनाव आयोग भी इस सचाई को ध्यान में रखकर चले, जबकि चुनाव आयोग सब सामान्य होने की उसी सरकार की औपचारिक मुद्रा को ही सचाई मानकर चल रहा था। अंतत: दिखावे और सचाई की टक्कर में, सचाई खुलकर सामने आ ही गयी।

    यह सचाई है कश्मीर की जनता के अलगाव के पहलू से हालात के पूरे तीन दशक पीछे धकेल दिए जाने की।

याद रहे कि इससे पहले 1989 के ही संसदीय चुनाव में कश्मीर में इस तरह का मत फीसद देखने को मिला था। उस चुनाव में बारामूला तथा अनंतनाग लोकसभाई सीटों पर तो वास्तव में श्रीनगर के ताजातरीन उप-चुनाव से भी कम, करीब 5.7 फीसद वोट ही पड़ा था। यही वह दौर है जब कश्मीर की समस्या ने वाकई विकराल रूप लेना शुरू किया था। बेशक, ताजा श्रीनगर उपचुनाव में 7 फीसद मतदान का आंकड़ा, अलगाववादियों के चुनाव के बहिष्कार के आह्वान, बड़े पैमाने पर मतदान केंद्रों पर हमलों व चुनाव रोकने की कोशिशों और हिंसा की पृष्ठïभूमि में आया है। लेकिन, सभी जानते हैं कि अलगाववादी करीब तीन दशक से हरेक चुनाव के ही बहिष्कार का आह्वान करते आए हैं।

वास्तव में अगर इस चुनाव में अलगावादियों का यह आह्वान इतना असरदार साबित हुआ है और बड़ी संख्या पर मतदान केंद्रों पर मतदान रुकवाने के लिए भारी भीड़ें पहुंची हैं तथा मतदान केंद्रों में हमले आदि हुए हैं, तो यह सब भी शासन और चुनावी प्रक्रिया से कश्मीरी जनता के गहरे और बहुत बढ़ गए अलगाव को ही दिखाता है।

केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाले एनडीए और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठजोड़ की सरकारों के क्रमश: तीन साल और दो साल से ज्यादा के शासन का, कुल यही हासिल है।

    2014 के अंत में हुए जम्मू-कश्मीर के चुनाव के बाद, जब ‘‘उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों’’ को जोड़ते हुए, पीडीपी-भाजपा की सरकार बनी थी, तभी अनेक टिप्पणीकारों ने आशंका जतायी थी कि यह अवसरवादी गठजोड़, न तो केंद्र से इस राज्य के लिए ‘बेहतर डील’ हासिल कर सकता है और न ही हिंदू जम्मू और मुस्लिम कश्मीर के बीच बढ़ती खाई को पाटने में कोई मदद कर सकता है। उल्टे, सांप्रदायिकताओं का यह मिलन, राज्य की जनता के बीच बढ़ती खाई को और पुख्ता करने का ही काम करेगा। ठीक यही हुआ है। पीडीपी सरकार की राज्य में सभी हितधारकों को समेटते हुए एक सार्थक राजनीतिक संवाद शुरू कराने की जो मूल प्रतिज्ञा थी, नरेंद्र मोदी की सरकार अपने ही विचारधारात्मक आग्रहों के चलते, उसमें रत्तीभर मददगार नहीं हुई है। यहां तक कि पिछले साल के आखिर में, मुसलसल जन-विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठïभूमि में, राज्य का दौरा करने वाली सर्वदलीय संसदीय टीम की सिफारिशों के बाद, खुद गृहमंत्री के संसद के मंच पर सभी हितधारकों से व्यापक राजनीतिक संवाद शुरू किए जाने का दो-टूक वादा करने के बावजूद, मोदी सरकार को इस दिशा में एक छोटा सा कदम उठाना भी मंजूर नहीं हुआ है।

    इतना ही नहीं, जम्मू में अपनी पार्टी तथा संघ परिवार के आधार को मजबूत करने की कोशिश में, केंद्र सरकार ने कश्मीर घाटी में जन-विरोध की अभिव्यक्तियों से सिर्फ ‘‘सख्ती’’ से निपटने का स्पष्ट संदेश देना भी जरूरी समझा है। इसका ताजा सबूत पैलेट गनों के विकल्प आजमाने के अपने वादों से पलटते हुए मोदी सरकार का, सुप्रीम कोर्ट के सामने पैलेट गनों के उपयोग की अनिवार्यता की वकालत करना है। और ‘‘सख्ती’’ का इससे भी कड़ा संदेश, पाकिस्तान के साथ बातचीत तथा संबंधों के मामले में दिया जा रहा है। दुर्भाग्य से ये संदेश कश्मीरी जनता के अलगाव को कम करने के बजाए बढ़ाने का ही काम कर रहे हैं। और राज्य में पीडीपी के साथ सरकार में शामिल होने के बावजूद, भाजपा और संघ परिवार द्वारा कभी गोमांस के नाम पर, तो कभी शरणार्थियों के नाम पर और कभी राष्ट्रध्वज तो कभी राष्ट्रगान के नाम पर राष्ट्रवाद के इम्तहानों के नाम पर, जम्मू में तथा राज्य में अन्यत्र तथा देश भर में दूसरी जगहों पर भी की जा रही सांप्रदायिक उछल-कूद ने, हिंदू जम्मू और मुस्लिम कश्मीर की दूरी को और बढ़ाने का ही काम किया है। इसी सब ने कश्मीर में हालात को तीन दशक पीछे पहुंचा दिया लगता है।

    जाहिर है कि यह सब अचानक ही नहीं हो गया है। वास्तव में पिछले साल के उत्तराद्र्घ के जनविरोध प्रदर्शनों में ही ऐसे हालात के संकेत छुपे हुए थे। जैसाकि अनेक जानकार प्रेक्षकों ने तभी दर्ज किया था, यह जनविरोध दुहरे अर्थों में स्वत:स्फूर्त था। एक तो साधारण कश्मीरी इन्हें जन-कार्रवाइयों का रूप देते हुए, कमोबेश बिना किसी तैयारी के इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो रहे थे। दूसरे, इनके नेतृत्व न तो अलगाववादियों के हाथों में था और न आतंकवादियों का प्रत्यक्ष रूप से इन कार्रवाइयों से कोई संबंध था।

यह कश्मीरी असंतोष के एक तरह से असंगठित जनविरोध का रूप लेने का ही मुकाम था, जहां से आगे यह जन-राजनीतिक विरोध की जनतांत्रिक राह पर भी बढ़ सकता था, जो शासन का सिरदर्द बनने के बावजूद दीर्घावधि में जनतंत्र को ही मजबूत करता। या फिर यह अलगाववादियों को और अंतत: अतिवादियों को भी, जन-समर्थन व आधार मुहैया कराने का काम कर सकता था, जिसके परिणाम बहुत खतरनाक ही हो सकते थे।

केंद्र और राज्य की भाजपा नियंत्रित सरकारों ने इस जनविरोध का बाद वाले विनाशकारी रास्ते पर जाना ही सुनिश्चित किया है। श्रीनगर का 7'  का ताजा आंकड़ा इसी का सबूत है।

                अंत में एक सवाल--क्या केंद्र और जम्मू-कश्मीर की सरकारें 7 प्रतिशत  के अपने इस परीक्षाफल से कुछ भी नहीं सीखेंगी? कम से कम अब तक के आसार तो ऐसे ही हैं। 

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