पहलू खान के गाँव से 450 से अधिक लोग आजादी आंदोलन में शहीद हुए !

मेवात की जनता ने सामंतो को छोड़ देशभक्तों के साथ आज़ादी की लड़ाई लड़ी, दुर्भाग्यवश जो अंग्रेजों की जी हज़ूरी कर रहे थे वे अब भारतीय राष्ट्रवाद के ठेकेदार बन दूसरों से देशभक्ति का सर्टीफिकेट मांग रहे हैं...

Vidya Bhushan Rawat
पहलू खान के गाँव से 450 से अधिक लोग आजादी आंदोलन में शहीद हुए !

विद्या भूषण रावत

देशभक्ति और देशद्रोह के बीच झूलती बहस में मेवात का जिक्र करना अत्यंत आवश्यक है कि आखिर मेवात की स्वाधीनता आंदोलन में क्या भूमिका है।

ऐसा बताया जाता है कि गौआतंकियों के हाथों मारे गए पहलू खान के गाँव से 450 से अधिक लोग आजादी आंदोलन में शहीद हुए।

ऐतिहासिक तथ्य सामने आ रहे हैं कि मेवों के प्रमुख हसन खान मेवाती ने मुग़ल शासकों से मुकाबला करने के लिए राणा सांगा के साथ हाथ मिलाकर अपनी धरती की सुरक्षा की। 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में मेवात के मेवों मुसलमान देश के दूसरे साथियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे थे।

सुन्नी मुसलमानों का मेवात सूफी संतों से लेकर मुहर्रम तक मनाता है। संत चरण दास यहाँ के प्रमुख सूफी संतो में रहे हैं, जिनका हिन्दू मुसलमान दोनों में बहुत असर रहा है। कई अन्य सूफी संत जैसे लाल दास, अल्लाह बख्श इत्यादि भी यहाँ प्रसिद्ध रहे हैं।

मेवात की जनता ने अपने सामंती नवावों को छोड़ देशभक्तों के साथ आज़ादी की लड़ाई को लड़ा था, इसलिए उन्हें देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वालों को अपना इतिहास देखना होगा कि स्वाधीनता आंदोलन में वे और उनके पुरखे क्या कर रहे थे ? दुर्भाग्यवश जो अंग्रेजों की जी हज़ूरी कर रहे थे वे अब भारतीय राष्ट्रवाद के ठेकेदार बन दूसरों से देशभक्ति का सर्टीफिकेट मांग रहे हैं।

पहलू खान की अस्सी वर्षीय माँ अंगूरी बेगम आज इन्साफ मांग रही है। पहलू उनका एकमात्र बेटा था और उनके आठ नाती पोते पोतियों के साथ वो आज दिल्ली में थी। सुखद ये था कि देश भर के किसानों ने पहलू की हत्या को खेती किसानी पर हमला बताया। भारतीय किसान महासभा, भूमि अधिकार आंदोलन और अन्य कई स्वयंसेवी संगठनों और आंदोलनों के सदस्य दिल्ली में मिले और उन्होंने इस प्रकार के बहशीपन के विरुद्ध आंदोलन करने का ऐलान किया।

 

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