शंकर गुहा नियोगी : नई आर्थिक नीति के पहले शहीद

हमें यह सवाल उठाना होगा कि सही आवास,  स्कूल,  चिकित्सा,  सफाई,  जल,  इत्यादि स्वस्थ जीवन के लिए जरुरी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी मालिकान लें। ...

शंकर गुहा नियोगी : नई आर्थिक नीति के पहले शहीद
Shankar Guha Niyogi-Nai AArthik neeti ke pahle shaheed
हाइलाइट्स
  • शंकर गुहा नियोगी के साथ बिताये कुछ साल
  • एक सहयोद्धा की रपट

 

पुण्यव्रत गुण

अनुवाद: पलाश विश्वास

दल्ली राजहरा जनस्वास्थ्य आंदोलन और शहीद अस्पताल

अपने परिवार में कई पीढ़ियों के छह छह कमाऊ डॉक्टरों को देखकर डॉक्टर बनने का ख्वाब देखना शुरू किया था...। मेडिकल कालेज में दाखिले के बाद मेडिकलकालेज स्टुडेंट्स एसोसिएशन ने नये सिरे से सपना देखना सिखाने लगा -- डॉ. नर्मन बेथून,  डॉ. द्वारका नाथ कोटनीस जैसे डॉक्टर बनने का सपना--। किंतु कहां जाऊं? कहां है स्पानी आम जनता का फ्रांको विरोधी आंदोलन, कहां है चीन का मुक्तियुद्ध?

निकारागुआ में काम करने की ख्वाहिश जताते हुए निकारागुआ की सांदिनिस्ता सरकार के एक नुमाइंदे को खत लिख मारा था, जवाब कोई लेकिन मिला नहीं। आखिरकार डॉक्टरी की परीक्षा पास करने के तीन साल बाद शहीद अस्पताल में काम के मकसद से जाना हो गया।

छात्र जीवन से दल्ली राजहरा में मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन के बारे में कहानियां सुन रखी थीं।

शहीद अस्पताल की स्थापना से पहले 1981 में मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन में शरीक होने के लिए जो तीन डॉक्टर गये थे, उनमें से डॉ. पवित्र गुह हमारे छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में एक थे। (बाकी दो डॉक्टर थे डॉ.  विनायक सेन और डॉ. सुशील कुंडु। )शहीद अस्पताल की प्रेरणा से जब बेलुड़ में इंडो जापान स्टील के श्रमिकों ने 1983 में श्रमजीवी स्वास्थ्य परियोजना का काम शुरू किया, तब उनके साथ हमारा समाजसेवी संगठन पीपुल्स हेल्थ सर्विस एसोसिएशन का सहयोग भी था। हाल में डॉक्टर बना मैं भी उस स्वास्थ्य परियोजना के चिकित्सकों में था।

मैं शहीद अस्पताल में 1986 से लेकर 1994 तक कुल आठ साल रहा हूँ। 1995 में पश्चिम बंगाल लौटकर भिलाई श्रमिक आंदोलन की प्रेरणा से कनोड़िया जूटमिल के श्रमिक आंदोलन के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल हो गया। चेंगाइल में श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र,  1999 में श्रमजीवी स्वास्त्य उपक्रम का गठन, 1999 में बेलियातोड़ में मदन मुखर्जी जन स्वास्थ्य केंद्र, 2000 में बाउड़िया श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र,  2007 में बाइनान शर्मिक कृषक मैत्री स्वास्थ्य, 2006-7 में सिंगुर नंदीग्राम आंदोलन का साथ, 2009 में सुंदरवन की जेसमपुर स्वास्थ्य सेवा, 2014 में मेरा सुंदरवन श्रमजीवी अस्पताले के साथ जुड़ना, श्रमजीवी स्वास्थ्य उपक्रम का प्रशिक्षण कार्यक्रम, 2000 में फाउंडेशन फॉर हेल्थ एक्शन के साथ असुक विसुख पत्रिका का प्रकाशन, 2011 में स्व्स्थ्येर वृत्ते का प्रकाशन --यह सबकुछ असल में उसी रास्ते पर चलने का सिलसिला है, जिस रास्ते पर चलना मैंने 1986 में शुरू किया और दल्ली राजहरा के शमिकों ने 1979 में।

शुरू की शुरूआत

एक लाख बीस की आबादी दल्ली राजहरा में कोई अस्पताल नहीं था, ऐसा नहीं है। भिलाई इस्पात कारखाना का अस्पताल, सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, मिशनरी अस्पताल, प्राइवेट प्रैक्टिसनर, झोला छाप डॉक्टर -मसलन की इलाज के तमाम बंदोबस्त पहले से थे। सिर्फ गरीबों का ऐसे इंतजामात में सही इलाज नहीं हो पाता था।

खदान के ठेका मजदूरों और उनके परिजनों को भी ठेकेदार के सिफारिशी खत के बाबत बीएसपी अस्पताल में मुफ्त इलाज का वायदा था। लेकिन वहां वे दूसरे दर्जे  के नागरिक थे। डॉक्टरों और नर्सों को उनकी लालमिट्टी से सराबोर देह को छूने में घिन हो जाती थी।

इसी वजह से दिसंबर, 1979 में छत्तीसगढ़ माइंस एसोसिएशन की उपाध्यक्ष कुसुम बाई का प्रसव के दौरान इलाज में लापरवाही से मौत हो गयी। उस दिन बीएसपी अस्पताल के सामने चिकित्सा अव्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में दस हजार मजदूर जमा हो गये थे। ना ही, उन्होंने अस्पताल में किसी तरह की कोई तोड़ फोड़ की और न ही किसी डॉक्टर नर्स से कोई बदसलूकी उन्होंने की। बल्कि उन लोगों ने शपथ ली एक प्रसुति सदन के निर्माण के लिए ताकि किसी और मां बहन की जान कुसुम बाई की तरह बेमौत इस तरह चली न जाये।

8 सितंबर, 1980 को शहीद प्रसुति सदन का शिलान्यास हो गया।

स्वतःस्फूर्तता से चेतना की विकास यात्रा

1979 में छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के जो सत्रह विभाग शुरू किये गये, उनमें स्वास्थ्य विभाग भी शामिल हो गया।

`स्वास्थ्य और ट्रेड यूनियन’ शीर्षक निबंध में कामरेड शंकर गुहा नियोगी ने कहा है- `संभवतः भारत में ट्रेड यूनियनों ने मजदूरों की सेहत के सवाल को अपने समूचे कार्यक्रम के तहत स्वतंत्र मुद्दा बतौर पर कभी शामिल नहीं किया है। यदि कभी स्वास्थ्य के प्रश्न को शामिल भी किया है तो उसे पूंजीवादी विचारधारा के ढांचे के अंतर्गत ही रखा गया है। इस तरह ट्रेड यूनियनों ने चिकित्सा की पर्याप्त व्यवस्था,  कार्यस्थल पर चोट या जख्म की वजह से विकलांगता के लिए मुआवजा और कमा करते हुए विकलांग हो जाने पर श्रमिकों को मानवता की खातिर वैकल्पिक रोजगार देने के मुद्दों तक ही खुद को सीमित रखा है।

  • हमें यह सवाल उठाना होगा कि सही आवास,  स्कूल,  चिकित्सा,  सफाई,  जल,  इत्यादि स्वस्थ जीवन के लिए जरुरी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी मालिकान लें। -- मजदूर वर्ग सामाजिक बदलाव का हीरावल दस्ता है, तो यह उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह अधिक प्रगतिशील वैकल्पिक सामाजिक प्रणालियों की खोज और उन्हें आजमाने के लिए विचार विमर्श करें और परीक्षण प्रयोग भी। इसके अंतर्गत वैकल्पिक स्वास्थ्य प्रणाली भी शामिल है। इसके साथ साथ यह भी जरूरी है कि श्रमिक वर्ग आज के उपलब्ध उपकरण और शक्ति पर निर्भर विकल्प नमूना भी स्थापित करने की कोशिश जरूर करें। ’

इस निबंध में नियोगी की जिस अवधारणा का परिचय मिला, बाद में वही `संघर्ष और निर्माण की विचारधारा’ में तब्दील हो गयी।  

संघर्ष और निर्माण राजनीति का सबसे सुंदर प्रयोग हुआ शहीद अस्पताल के निर्माण में। (हम उसी अवधारणा का प्रयोग हमारे चिकित्सा प्रतिष्ठानों में अब कर रहे हैं। )

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।