विशेष आदिम जनजाति पुलिस पलटन : झारखंड का सलवा जुड़ूम तो नहीं बनेगा !!!

झारखंड में ‘विशेष आदिम आदिवासी पुलिस पलटन’ का गठन -आदिवासी समुदाय को बॉंटने की दिशा में एक कुटिल कदम है तथा उन्हें एक-दूसरे के विरूद्ध लड़ा देने की सबसे बड़ी चाल  ...

स्टैन स्वामी

आदिवासियों को एक-दूसरे से बाँटने तथा उनके बीच आपसी खाईं पैदा करने के लिए एक नया ‘चोर दरवाजा’ खोला गया है।

भारत के प्रधानमंत्री ने 6 मार्च, 2017 को झारखंड के संथाल परगना का सरकारी दौरा किया तथा गंगा नदी पर एक पुल का शिलान्यास किया जो झारखंड और बिहार को जोड़ेगा।

उसी समय उन्होंने ‘झारखंड में विशेष आदिम जनजाति पुलिस पलटन’ का भी उद्घाटन किया जिसका गठन केवल आदिम जनजातियों के सदस्यों के द्वारा ही होगा।

इस बात का भी पता चला कि इस तरह के पलटन का गठन पहले ही किया जा चुका है और यह पहले से ही कार्य कर रहा है, लेकिन पुनः प्रधानमंत्री के समक्ष इस पलटन को कतारबद्ध करके स्वयं उनके द्वारा इसके उद्घाटन की औपचारिकता का प्रदर्शन किया गया।

विभिन्न आदिवासी समुदाय के कुल 956 सदस्यों में से 252 महिलाओं को भी इसमें चुना गया। महिलाएं कांस्टेबल के रूप में काम करेगीं। पुरूष विशेष आदिम जनजाति पुलिस पलटन का गठन करेंगे, जो अर्धसैनिक बल के ढर्रे पर काम करेगी।

वस्तुतः इस पलटन के काम की प्रकृति क्या होगी, इसका खुलासा अभी नहीं किया गया है। महत्वपूर्ण चीज यह है कि ये सरकार के नौकर होंगे और इनकी स्थिर और नियमित आय होगी जबकि दूसरे आदिवासी समुदाय के सदस्य अभी भी काम के खोज में मारे-मारे फिर रहे होंगे।

आदिवासी समुदाय की एकता को तोड़ना इसकी रणनीति है

स्टैन स्वामीझारखंड मे कुल 32 आदिवासी या जनजातीय समुदाय हैं जिनमें से 9 को कमजोर आदिम जनजातियों के रूप में चिन्हित किया गया है। इन आदिम जनजातियों में असुर, बिहोर, हिल खडि़या, बिरजिया, कोरवा, पहडि़या (बैगा), सबर, माल पहडि़या और सुरिया पहडि़या जिनकी कुल संख्या झारखंड में आदिवासियों के कुल आबादी 70.71 लाख में से केवल 2.23 लाख है। इस तरह से इनके बीच जो अलगाव का बीज बोया जा रहा है वह खास तौर पर चिंता का विषय है जहॉं तक कि आदिवासी समुदाय के बीच यह दूरी और विभेद का कारण बनेगा और इस प्रकार उनका अपने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए मिलजुलकर संघर्ष करना मुश्किल मंे पड़ जाएगा और वस्तुतः यही शासक वर्ग की फिलहाल मंशा है कि कैसे उनकी एकता को तोड़ा जाए। इसका सबसे मौजूँ उदाहरण यह है कि कैसे दो पहडि़या जनजाति के सदस्य जो राज्य में रिक्त हुए विधान सभा के सीट के लिए उपचुनाव में दो स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में पंजीकृत थे, दोनों ने राज्य में शासन करने वाले दल के पक्ष में औपचारिक तौर पर अपने समर्थन की घोषणा कर दी है। यह घोषणा प्रधानमंत्री के विशेष आदिम जनजाति पुलिस पलटन बनाने की घोषणा के ठीक अगले ही दिन की गई है। तो इस प्रकार सरकार मुफ्तखोरी के टुकड़े फेंकना जारी रखेगी और वे इस पर गिरना जारी रखेंगे।

आदिम आदिवासी (जनजातियां) कौन हैं ?

सबसे पहले तो झारखंड में आदिवासियों को सामान्य आदिवासी और विशेष आदिम आदिवासी समुदाय का चिप्पी लगाकर उन्हें आपस में बाँटना निहायत गलत है। वस्तुतः वे सभी आदिवासी हैं। इस प्रकार वे सब एक जन हैं। आदिम आदिवासी पूरे आदिवासी आबादी का सबसे अधिक उपेक्षित समूह है। मुख्य रूप से भूमिहीन होने के कारण आजीविका के लिए वे पूरी तरह से जंगल पर निर्भर होते हैं तथा उनके शिक्षा का स्तर बहुत नीचे है और स्थानिक बीमारियों से भी ग्रस्त हैं।

आदिवासियों को न केवल आपस में विभाजित करना बल्कि उन्हें एक-दूसरे के विरूद्ध लड़ा देना एक क्रूर अन्याय है। शासक वर्ग अपने राजनीतिक हथकंडे के तहत लिए इस प्रकार के क्रूरतापूर्ण नीति को लागू कर रहा है।

आदिम जनजाति के लोगों के वर्तमान दुःखों को देखते हुए सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सार्थक और प्रभावी तरीके अपनाते हुए उन्हें उनके अतिशय आर्थिक विपन्नता और सामाजिक पिछड़ेपन से ऊबारे। बनाधिकार अधिनियम, 2006 का तेजी से क्रियान्वयन, जिसके द्वारा प्रत्येक परिवार को कम से कम दो हेक्टअर (5 एकड़) भूमि का पट्टा मिलेगा, वह उनके आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। पूरे समुदाय में से केवल कुछ सदस्यों को पुलिस में भर्ती करने से पूरे समुदाय का विकास कभी नहीं हो सकता। उल्टे, यह उनके बीच केवल असमानता को ही पैदा करेगा।

दूसरे शब्दों में आदिम जनजातियों के पूरे समुदाय का विकास केवल कृषि के विकास से ही हो सकता है। और इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार के पास सिचाई की सुविधा से युक्त पर्याप्त कृषि योग्य भूमि हो। उनके बच्चों की शिक्षा उनकी मातृ भाषा में दिया जाना चाहिए। नौजवान महिलाओं को बुनियादी स्वास्थ्य के प्रति प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिसमें बनस्पतियों और जड़ों के प्रयोग द्वारा बीमारियों के इलाज के उनके परम्परागत ज्ञान का प्रयोग किया जाता हो।

आदिवासी समुदाय की परम्परागत समानता का विलोप हो रहा है। परम्परागत आदिवासी समुदाय की विशेषता होती थी- उनके बीच समानता, सहयोग, सामुदायिक भावना तथा किसी भी निर्णय में सबकी सहमति। अब इसे तोड़ा जा रहा है और पॅूंजीवादी समाज के ढर्रे पर, जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना की प्रबलता होती है, के ढॉंचे के तहत उन्हें ढाला जा रहा है। परम्परागत आदिवासी मूल्य समुदाय को सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है। इसके बाद ही परिवार और अंत में व्यक्ति का स्थान होता है।

इसका मतलब है कि किसी आदिवासी की पहचान उसके समुदाय के एक सदस्य के रूप में होती है। और आदिवासी समुदाय मुख्य रूप से एक कृषक समुदाय है तथा जल, जंगल और जमीन उनके जीवन का स्रोत है। परन्तु सरकार जो कर रही है वह उनको इस जीवन स्रोत से ही वंचित कर रही है। उनके बीच में से केवल कुछ लोगों को ही और वह भी उन्हें गॉंव से दूर कर और खेती की व्यवस्था से बाहर कर रोजगार दे रही है।

इस प्रकार उनके समुदाय के कुछ लोगों का शहरीकरण कर उन्हें उनके समुदाय से अलग-थलग कर दिया जा रहा है, और ऐसे अपने जड़ों से कटे लोग, शायद ही कभी विस्थापन और भूमि से अलगाव के विरूद्ध आम आदिवासियों के साथ संघर्ष में उनके साथ खड़े होते है। अब स्थिति यहॉं तक पहॅंुच गई है कि तथाकथित विकास से प्रभावित होकर विस्थापन और अपनी जमीनों से बेदखल ग्रामीण आदिवासियों को इस संघर्ष को अपने बूते पर ही चलाना पड़ रहा है और उनके अपने ही समुदाय के लोग जो इस पॅंूजीवादी व्यवस्था के औजार बन गए हैं उनके संघर्ष में खड़े नहीं होते हैं।  

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ग्रामीण क्षेत्रों के आदिवासी जो पूँजीवादी वर्ग के दमन, शोषण और अत्याचार को सहने के लिए तैयार नहीं है, वह सरकार पूँजीपतियों के षडयंत्र को समझ चुकी है। वे यह भलीभॉंति समझ चुके हैं कि पूँजीपति सरकार का उपयोग उनके खनिज संपदा से भरपूर जंगल और जमीनों को हड़पने के लिए तथा बेइंतहा लाभ के लिए एक प्रभावी औजार के रूप में कर रही है। निगम, व्यापारी वर्ग, शहरी मध्यम वर्ग, ऊपर से लेकर नीचे तक के सरकारी नौकरशाह, पुलिस और अर्धसैनिक बल, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का ज्यादातर भाग तथा राजनीतिक दल सभी आदिवासियों के दुश्मन बन गए हैं।

नए चुने गए इन विशेष आदिम आदिवासी पुलिस पलटन को क्या काम सौंपा जाएगा यह एक दूसरा चिंता का विषय है।

उम्मीद के खिलाफ यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इनका उपयोग माओवाद के विरूद्ध किसी कार्यवाही में नहीं किया जाएगा। और यदि ऐसा किया जाता है तो इसका साफ-साफ मतलब यही होगा कि वे अपने ही आदिवासी और मूलवासी साथियों से लड़ेंगे। यह आदिवासियों एवं मूलवासियों के सामुदायिक जीवन, उनके एकता और उनके संस्कृति पर सबसे बड़ा और सबसे कठोर हमला होगा।

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