क्या उमा भारती बनने से बच सकेंगे योगी ?

वीरेन्द्र जैन

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 जब भाजपा ने बिना मुख्यमंत्री का चेहरा आगे किये लड़ा तो स्वाभाविक ही था कि जीत के बाद चुनाव अभियान के मुख्य प्रचारक प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को यह अधिकार प्राप्त हो कि वे जिसे भी चाहें मुख्य मंत्री घोषित कर दें व जीत के लिए उपकृत विधायक उनके हर प्रस्ताव पर समर्थन की मुहर लगा दें।

उल्लेखनीय है कि 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उमा भारती को मुख्यमंत्री पद की दावेदार बनाकर 398 सीटों से प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से कुल 47 जीत सके थे व 229 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। उन्हें कुल 15% वोट प्राप्त हुये थे। इसके विपरीत 2017 के आम चुनाव में उनके 312 उम्मीदवार जीते और उन्हें 39% से अधिक मत मिले।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविधतापूर्ण राज्य में भाजपा काँग्रेस जैसी पार्टियों द्वारा मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव लड़ने के अपने खतरे होते हैं। भाजपा ने सावधानी बरती जिसका उसे यह लाभ हुआ कि चुनाव के पहले ही टकराव शुरू नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री नियुक्त करने का विशेषाधिकार होते हुए भी मोदी-शाह ने जरूरत से अधिक समय लिया किंतु मंत्रिमण्डल की घोषणा के बाद लगा कि इस कठिन पहेली को सुलझाने में इतना समय लगना स्वाभाविक था।

स्वयं चुनाव में न उतर कर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपना दखल बनाये रखने के लिए ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जनसंघ का गठन किया था, जिसको 1977 में जनता पार्टी में झूठमूठ का विलय दिखाया गया था। पर जब उसमें उन्हें अलग से पहचान लिया गया जो देश की पहली गैर काँग्रेस सरकार के टूटने का कारण बना, तब उन्होंने जैसे के तैसे बाहर निकलना ही उचित समझा। वे जनता पार्टी को मिले व्यापक जन समर्थन का लाभ लेना चाह्ते थे इसलिए उन्होंने जनसंघ का नाम भारतीय जनता पार्टी रख लिया। संघ ने इस राजनीतिक शाखा को संघ की घोषित नैतिकता से मुक्त रखा व सरकार बनाने के लिए किसी भी दल से गठबन्धन करना, दलबदल के सहारे सरकारें बनवाना, बिगाड़ना, और काँग्रेस शासन पद्धति में आयी समस्त कमजोरियों को अपनाने से कभी नहीं रोका।

उनकी समझ रही कि सरकार में रहने से सरकार की सुरक्षा एजेंसियां उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करतीं अपितु बहुत हद तक मदद भी करती हैं। चुनाव के लिए धन एकत्रित करने में उन्होंने किसी नैतिक सीमा को नहीं माना और न ही संघ ने उन्हें वर्जित किया। चुनावों में शराब और पैसा बांटने में वे अपने जैसे किसी भी दूसरे दल से अलग नहीं रहे।

इन चुनावों में भाजपा गठबन्धन के विधायकों की संख्या लगभग 80% है और वे विभिन्न क्षेत्रों, जातियों, का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उल्लेखनीय है कि मण्डल कमीशन लागू करने के खिलाफ उठे आन्दोलन के कारण सत्ताच्युत होने वाले वी पी सिंह ने हावर्ड यूनीवर्सिटी में भाषण देते हुए कहा था कि भले ही मैंने अपनी टांग तुड़वा ली हो, किंतु गोल तो मैंने कर दिया है।

इसका सन्दर्भ लेते हुए सुप्रसिद्ध लेखक सम्पादक राजेन्द्र यादव ने लिखा था कि अब उत्तर प्रदेश में कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। यह बात सच भी थी क्योंकि भाजपा को भी कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, आदि के होते हुए भी अपने दूसरे क्रम के नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था।

सन्दर्भित चुनावों में भी ठाकुर योगी को मुख्यमंत्री बनाने का वादा निभाने में यही बाधा रही होगी।

स्मरणीय है कि चुनावों में जातिवादी समीकरण बैठाने में बहुत मेहनत की गई। प्रदेश में बड़ी संख्या में ब्राम्हण वोटर हैं जिन्हें साधने के लिए ही काँग्रेस ने प्रशांत किशोर की सलाह पर श्रीमती शीला दीक्षित को उनके अनचाहे आगे किया था। यही कारण रहा कि एक ओर तो ब्राम्हण अपना प्रतिनिधित्व चाहते थे तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य को पिछड़े अपना मुख्यमंत्री देखना चाहते थे।

योगी का अपने क्षेत्र में 141 में से 131 सीटें जितवाने का दावा था। उनका अपना साम्राज्य है जो भाजपा संगठनों के समानांतर है और अपने जनसंगठनों को उन्होंने भाजपा के जनसंगठनों में मिलाने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने अपने कुछ समर्थकों को भी समानांतर रूप से चुनाव में उतार दिया था व कहा जाता है कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा नहीं किया गया होता तो वहाँ से वे भाजपा उम्मीदवारों को हरवा सकते थे।

इन परिस्तिथियों में मुख्यमंत्री ही नहीं पूरे मंत्रिमंडल का गठन ही मोदी-शाह ने किया और योगी को केवल प्रतीकात्मक रूप में उसी तरह मुख्यमंत्री बना दिया गया है, जिस तरह उमा भारती को अनचाहे मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के चुनावी कौशल के समक्ष भाजपा अपने किसी भी विधायक को उतारने का मन नहीं बना पा रही थी, इसलिए उसने साध्वी वेषभूषा में रहने वाली राजनेता उमा भारती को आगे रख कर दांव लगाया, जो परिस्तिथिवश सफल रहा। भाजपा ने उन्हें प्रतीकात्मक मुख्यमंत्री बने रहने और परदे के पीछे से शासन चलाने की नीति बनायी जो बहुत दिन नहीं चली। यही कारण रहा कि पहला मौका लगते ही उन्होंने दूध में पड़ी मक्खी की तरह उन्हें निकाल कर फेंक दिया।

बाद का इतिहास यही बताता है कि उन्होंने नाराज होकर अलग पार्टी बनायी, चुनाव लड़ा व भाजपा को बड़ा नुकसान पहुँचाया।

योगी के साथ भी लगभग ऐसी ही स्थितियां हैं। यदि उनका भी स्वाभिमान जाग गया तो वैसा ही संकट फिर पैदा होगा।

देखना होगा कि योगी की नमनीयता कितनी है व मोदी-शाह उन्हें पद देने के बाद कितने अधिकार देते हैं।

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