पुलिस के जवानों का ’दर्द’ भी समझिए

काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है। आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है? ...

अतिथि लेखक
पुलिस के जवानों का ’दर्द’ भी समझिए
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हरे राम मिश्रा

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब मेरा अपने ही स्थानीय पुलिस स्टेशन (थाना) पर एक काम के सिलसिले में जाना हुआ। भरी दोपहरी में जब मैं पुलिस स्टेशन पहुंचा तो वहां पर मुझे केवल तीन व्यक्ति मौजूद मिले। पहिला एक होमगार्ड का जवान, जो कि वहां पर संतरी ड्यूटी कर रहा था। दूसरा एक मुंशी (पुलिस स्टेशन का लिपिक), जो कि थाने में बैठा कुछ लिखा पढ़ी में व्यस्त था। उसकी मेज पर फाइलों का ढेर लगा हुआ था। इन सबसे इतर तीसरे व्यक्ति थाना प्रभारी थे। वे अपने विश्राम कक्ष में सो रहे थे।

जब मैंने मुंशी से पूछा कि थाना प्रभारी कहां हैं? मुझे उनसे मुलाकात करनी है? इस पर मुंशी ने मुझसे जो कुछ कहा वह अपने आप में चौंकाने वाला था।

उसने बताया कि पिछले तीन दिन से एक जरूरी काम के कारण साहब बहुत व्यस्त थे। वे अभी सो रहे हैं और मैं उनको ’डिस्टर्ब’ नहीं कर सकता। आपको अगर उनसे मिलना है तो फिर कल सुबह आइए या फिर एक चिट्ठी में लिख दीजिए। उनके जगने पर दे दूंगा।

हलांकि, बाद में आस पास की चाय की दुकानों पर चर्चा में मुझे यह पता चला कि हाई प्रोफाइल हत्या के एक मामले में स्थानीय पुलिस पर अभियुक्तों को पकड़ने का काफी दबाव था। इसी वजह से रात-रात भर छापेमारी करने के कारण दो रात थाना प्रभारी सो नहीं पाए थे। अब जबकि अभियुक्त पकड़ लिया गया था- वो आराम कर रहे थे।

हरे राम मिश्रागौरतलब है कि ऐसी दबाव भरी दिनचर्या एक दिन का मामला नहीं है। पुलिस वालों का जीवन तकरीबन ऐसे ही हर दिन चलता है। एक बार सुबह नहाने के बाद शरीर पर टंगी वर्दी रात के दो बजे के बाद ही बदन से उतर पाती है। यही नहीं, अगले दिन दस बजे उन्हें कार्यालय में समय से उपस्थित होना होता है। सप्ताह में चौबीस घंटे का सामान्य ’रूटीन’ यही होता है।

अब जबकि पुलिस के कार्यक्षेत्र लगातार व्यापक होते जा रहे हैं, उनके ऊपर काम का बोझ भी लगातार बढ़ा है। इस काम के बोझ के दौरान उनके दुख दर्द से किसी को कोई मतलब नहीं होता। काम के दबाव में भले ही पुलिस वाले मानसिक स्तर पर टूट जाएं, लेकिन पुलिस विभाग को उनसे कोई हमदर्दी नहीं होती है।

पुलिस अधिकारियों के स्तर पर एक सामान्य समझ विकसित कर ली गयी है कि विभाग में सब कुछ ’ठीक’ है और उसे किसी तरह के सुधार की जरूरत नहीं है। पुलिस के अफसर जवानों की बेहतरी पर बात करना अपनी ’तौहीन’ समझते हैं। उनका वर्ग चरित्र शासक वर्ग का होता है जो जवानों को महज एक ’गुलाम’ भर समझता है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव में राजनैतिक बहस का मुद्दा बनता रहा है। लेकिन, इस बात पर राजनीति में कभी कोई बहस नहीं होती कि आखिर कानून का शासन स्थापित करने में लगे लोगों- खासकर ’पुलिस’ के सिपाहियों-दारोगाओं की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कैसे रखा जाए? कानून व्यवस्था के खात्मे का रोना सभी दल भले ही रोते हों, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस के इन सबसे निचले स्तर के जवानों के दुख दर्द उनकी बहस का हिस्सा नहीं होते हैं। पुलिस के कर्मचारी चाहे जितने जोखिम और तनाव में काम करें लेकिन उन्हें इंसान समझने और उसकी इंसानी गरिमा सुनिश्चित करने की ’भूल’ कोई भी राजनैतिक दल नहीं करना चाहता है।

गौरतलब है कि अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में प्रति पुलिस कर्मी सबसे ज्यादा आबादी रहती है। जहां तक इसके संख्या बल का सवाल है- यह रिक्तियों की भीषण कमी से साल दर साल लगातार जूझ रही है। पुलिस थानों का हाल यह है कि कई थाने अपनी कुल स्वीकृत पुलिस बल के आधे से भी कम संख्या पर किसी तरह से अपना काम चला रहे हैं। पुलिस के पास आने वाली शिकायतों की जांच के लिए दारोगा की जगह सिपाही भेजकर काम चलाया जा रहा है। यह सब पुलिस के प्रोफेशनलिज्म़ का न केवल मजाक है बल्कि कानून सम्मत भी नहीं हैं। जाहिर है इससे पीड़ित के लिए इंसाफ पाने की प्रक्रिया भी गंभीर तौर पर बाधित होती है।

यही नहीं, साल दर साल जिस तरह से पुलिस की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र बढ़ रहा हैं, ठीक उसी अनुपात में उसका संख्या बल लगातार घटता जा रहा है। कार्य बल में लगातार हो रही कमी पुलिस की कार्यक्षमता पर बहुत ही नकारात्मक असर डाल रही है। इससे एक तरफ  अपराध नियंत्रण में मुश्किल तो होती ही है, पुलिस के कर्मचारियों पर काम का दबाव भी काफी बढ़ जाता है।

काम के इसी दबाव के कारण पुलिस वाले आज अपनी मानवीय गरिमा को ’भूल’ चुके हैं और शारीरिक तथा दिमागी रूप से बीमार होते हुए लगातार ’हिंसक’ हो रहे हैं। बिना अवकाश के लगातार ’ड्यूटी’ करने वाले पुलिस वालों को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। वे सब गंभीर रूप से ’अवसाद’ का शिकार हो रहे हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।

पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर का पद बहुत ही जिम्मेदारी भरा होता है। इस समय जो हालात हैं उसमें एक सब इंस्पेक्टर के पास औसत दस से ग्यारह मुकदमों की विवेचना लंबित है। यह सब पुलिस वालों में अपने कर्तव्य पालन को लेकर एक गंभीर ’तनाव’ पैदा करता है।

जाहिर है काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है। हर वर्ष लगभग चार प्रतिशत कार्यबल पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त और बर्खास्तगी इत्यादि कारणों से स्टाफ से हट जाता है। लेकिन इसकी भरपायी के बतौर नयी भर्तियां नहीं की जाती हैं। इससे मौजूदा स्टाॅफ पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाता है जो कि ’तनाव’ पैदा करता है। इस तनाव का असर जवानों की जीवनशैली में भी साफ देखा जाता है। डिप्रेशन और अथाह काम के इस बोझ ने पुलिसकर्मियों को ’बीमार’ बना दिया है। बस वे बोझ ढोने वाले ’गधों’ में तब्दील हो गए हैं।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है?

जिम्मेदार इस समस्या पर बात क्यों नहीं करना चाहते? आखिर पुलिस वालों में इंसान होने के स्वाभाविक गुणों के विकास की जगह उनका खात्मा करने में तंत्र इतना ’तत्पर’ क्यों है?

आखिर पुलिस के जवानों के सामाजिक और मानवीय ’गुण’ को प्रायोजित तरीके से सत्ता खत्म करने पर क्यों जुटी है? आखिर उसे क्यों केवल एक डंडाधारी आज्ञापालक जवान ही चाहिए- बिल्कुल मशीन की तरह से कमांड लेने वाला?

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से हिंसकजानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है?

दरअसल किसी समाज में हो रहे अपराध के कारणों में एक बड़ा हिस्सा तंत्र की संरचना, समाज और  तत्कालीन आर्थिक परिवेश होता है। कोई व्यक्ति पैदायशी अपराधी नहीं होता। चूंकि मौजूदा तंत्र में व्यक्ति अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है और जीवन जीना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए अपराधों में बढ़ोत्तरी भी लगातार हो रही है। अब चूंकि राजनैतिक तंत्र अपराधों के मूल कारणों पर बहस से डरता है इसलिए वह इसे डंडे और बंदूक के बल पर खत्म करने की वर्ग सापेक्ष और ’सतही’ व्याख्या करने की चालाकी करता है। वह इसी चालाकी के मूल में पुलिस के जवानों को ’आज्ञापालक’ मशीन में बदल देता है। इसीलिए जब जवान अपने मानव होने के अधिकारों की मांग करते हैं तब तंत्र डर जाता है। चंूकि यह व्यवस्था हिंसा के बल पर खड़ी है और अगर पुलिस के जवान में मानवोचित गुण आ जाएंगे तो वे अपने अधिकार और हक की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर लाठी और गोली कभी नहीं बरसाएंगे। इसके पीछे का मनोविज्ञान यही है। इसीलिए पुलिस के जवानों को हिंसक और बर्बर बनाए रखने का एक मैराथन लगातार चल रहा है।

पुलिस के जवानों की अमानवीय कार्य परिस्थितियां उनके मानवीय गर्व के खात्मे का एक कुचक्र हैं जिसके अपने वर्ग चरित्र हैं। हिंसक और बर्बर व्यवस्था को हिंसक सिपहसलार ही चाहिए।

बहरहाल, भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में पुलिस बल की संख्या बढ़ाते हुए पुलिस में रिक्तियों को भरने का वादा भले ही किया हो लेकिन इससे पुलिस के जवानों को कुछ खास राहत नहीं मिलेगी। वर्तमान समय में कार्यस्थल पर जिस यंत्रणापूर्ण हालात से पुलिस कर्मियों का सामना हो रहा है, उससे तत्काल निपटने की कोई ठोस रणनीति योगी सरकार के पास नहीं है।

थकी हारी बीमार पुलिस एक स्वच्छ और न्यायपूर्ण प्रशासन नहीं दे सकती। इसके लिए योगी सरकार को चाहिए कि वह पुलिस वालों की इंसानी गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करे। इसके लिए सबसे पहले सप्ताह में एक दिन आवश्यक रूप से अवकाश देने की व्यवस्था को तत्काल लागू किया जाए। यह अवकाश सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनिवार्य हो और इसे वे अपने परिवार और बच्चों के साथ अवश्य बिताएं। इससे इतर, उनके लिए काम के घंटे फिक्स किए जांए ताकि उनका व्यक्तिगत जीनव भी पटरी पर लौटे। यह सब पुलिस कर्मियों में काम के बोझ को हल्का करेगा और उनके काम को आनन्ददायक बनाएगा।

सबसे बड़ी बात यह है कि योगी सरकार द्वारा कानून का राज स्थापित करने की बात के वाबजूद पुलिस वालों को संवेदना युक्त बनाने का कोई विचार नहीं दिख रहा है- जबकि जिम्मेदारी और जवाबदेही के लिए यह बहुत जरूरी है। वक्त की मांग है कि अब इस पर तत्काल विचार किया जाए।

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