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पँखुड़ी पाठक ने छोड़ा सपा का साथ, लगाए गंभीर आरोप – सपा में महिलाओं के साथ अभद्रता करना आम, यही नयी सपा का चरित्र है

पँखुड़ी पाठक ने छोड़ा सपा का साथ, लगाए गंभीर आरोप- सपा में महिलाओं के साथ अभद्रता करना आम, यही नयी सपा का चरित्र है

नई दिल्ली, 28 अगस्त। समाजवादी पार्टी को एक बड़ा झटका लगा है। पार्टी  का टीवी पर चेहरा रहीं पँखुड़ी पाठक ने न लिर्फ पार्टी को अलविदा कहा है बल्कि अखिलेश यादव के नेतृत्व और पार्टी में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

पँखुड़ी ने कल शाम ट्विटर पर एक पोस्ट लिखकर यह सूचना सार्वजनिक की।

“भारी मन से सभी साथियों को सूचित करना चाहती हूँ कि @samajwadiparty के साथ अपना सफ़र मैं अंत कर रही हूँ।8 साल पहले विचारधारा व युवा नेतृत्व से प्रभावित हो कर मैं इस पार्टी से जुड़ी थी लेकिन आज ना वह विचारधारा दिखती है ना वह नेतृत्व। जिस तरह की राजनीति चल रही है उसमें अब दम घुटता है”

दरअसल पँखुड़ी पाठक पिछले लंबे समय से अखिलेश यादव की गुंडावाहिनी के निशाने पर थीं। महिला और ब्राह्मण होने के नाते सपाई ट्रोल उन्हें लगातार सोशल मीडिया पर ट्रोल कर रहे थे और अपशब्द कह रहे थे। पार्टी की अन्दरूनी राजनीति से जुड़े एक पत्रकार ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा कि दरअसल इस गुंडावाहिनी को अखिलेश यादव ही संरक्षण प्रदान कर रहे थे क्योंकि पँखुड़ी पाठक को पार्टी में प्रवेश सांसद धर्मेन्द्र यादव ने कराया था और अखिलेश को लगने लगा था कि वे मुलायम सिंह के खेमे में चली जाएंगी।

उक्त पत्रकार का कहना है कि अखिलेश यादव इन दिनों अपने परिवार के टूटने की आशंका से भयभीत हैं और उन्हें लगता है कि सैफई परिवार का कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति भाजपा में चला गया और कांग्रेस व बसपा ने समझौते में सपा को स्थान न दिया तो 2019 में पार्टी अपनी वर्तमान सीटें भी बचाने की स्थिति में नहीं रहेगी। इसलिए अपने यादव मतदाता को बांधे रखने के लिए वह अपनी पार्टी के गैर यादव खासकर ब्राह्मण नेताओं पर अपने ट्रोल्स से हमले करा रहे हैं। पिछले देनों सपा के तीन ब्राह्मण नेताओं अभिषेक मिश्रा, दीपक मिश्रा और मणेन्द्र मिश्रा को भी अखिलेश की ट्रोल्स ने निशाना बनाया था।

पँखुड़ी पाठक ने पार्टी पर गंभीर आरोप लगाते हुए फेसबुक पर लिखा,

“हर संगठन / हर दल का एक चरित्र होता है। कई बार नेतृत्व बदलने से चरित्र भी बदल जाता है। नेतृत्व दल के भीतर अराजक तत्वों पर क्या रवैया रखता है इससे बहुत फ़र्क़ पड़ता है। सपा का भी चरित्र बदल गया है।

मुझे पता था जिस भी दिन मैं पार्टी छोड़ूँगी उस दिन सपा के लोग अभद्रता की हर सीमा पार कर देंगे। और यही हुआ – यही नयी सपा का चरित्र है।

अभी कुछ ही साल पहले तक ऐसा नहीं था। लोग सोचते थे अखिलेश यादव के नेतृत्व में बेहतर लोग जुड़ेंगे और सपा में और ज़्यादा सुधार होगा। लेकिन जो हुआ इसका विपरीत था। आज सपा का चरित्र नकारात्मक है। महिलाओं के साथ अभद्रता करना आम है।

जहाँ एक तरफ शुरू में अखिलेश यादव जी से पढ़े लिखे युवा जुड़े थे वहीं अब बस अराजक और कम पढ़े लिखे अराजक लोगों की फ़ौज है जो गाली गलोच के सिवा कोई बात नहीं कर सकती।

यही लोग सपा का चरित्र परिभाषित कर रहे हैं। आज मेरे साथ अभद्रता कर यह लोग अपना और अपने नेता का चरित्र उजागर कर रहे हैं और मेरी बात पर मुहर लगा रहे हैं।

मुझे ख़ुशी है ऐसे माहौल से मैं समय पर अलग हो गयी। ऐसी महिला विरोधी और कुंठित सोच व तत्वों को समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा।“

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा

“नेता जी ने कहा मेरा कोई सम्मान नहीं करता .. अब कुछ फ़र्ज़ी समाजवादी उनको भी अवसरवादी बात देंगे।

क्या फ़र्क़ रह गया आप में और भक्तों में ?”

ट्विटर पर उन्होंने अपने समर्थकों को विश्वास दिलाया,

“निराश ना हों.. अभी मुक़ाम और भी हैं।

युवाओं का शोषण करने वाले दलों की राजनीति ज़्यादा समय नहीं चलेगी। युवा अब जागरूक हो चुके हैं। सिर्फ़ झंडा उठाए ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद नहीं करेंगे। जो दल उन्हें सम्मान देगा वहीं रहेंगे।”

उन्होंने लिखा

“अगर मैं अपने सिद्धांतों और स्वाभिमान की लड़ाई नहीं लड़ सकी तो समाज के ज़रूरतमन्दों की लड़ाई कैसे लड़ूँगी ?

यह मतभेद वैचारिक है, व्यक्तिगत नहीं।

किसी व्यक्ति या दल से विश्वास उठ जाए तो परे हो जाना ही बेहतर है।

राजनीति ही तो सब कुछ नहीं.. और भी तरीक़े हैं समाज सेवा करने के।“

संभावना है पँखुड़ी पाठक का नया ठिकाना कांग्रेस होगी। पिछली 25 अगस्त को उनकी फेसबुक इसकी चुगली करती है।

“मुझे राजनैतिक भाषण सुनने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है लेकिन इंटर्व्यू के माध्यम से हुई चर्चा सुन लेती हूँ। अब हमारे प्रधानमंत्री जी तो unscripted इंटर्व्यू करते नहीं तो कल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जी का London School Of Economics में दिया इंटर्व्यू सुन लिया। वह एक ऐसा इंटर्व्यू है जिसका हिंदी संवाद होना चाहिए ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे समझ सकें।

राहुल जी ने अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के बारे में कुछ ज़रूरी बातें करी व अपना नज़रिया समझाया लेकिन मुझे जो बात सबसे अहम लगी वह थी अपनी पार्टी और संगठन को लेकर उनका दृष्टिकोण।

उन्होंने कांग्रेस को एक पार्टी नहीं बल्कि एक विचार बताया। एक ऐसा विचार जिससे हर भारतीय जुड़ सकता है। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि लम्बे समय सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस के दरवाज़े एक आम व्यक्ति के लिए बंद होने लगे थे। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश है कि यह दरवाज़े खोल कर लोगों को जोड़ा जाए। अपनी कमी को स्वीकार कर उसमें सुधार करना बहुत बड़ी क्षमता है। इसके लिए सरलता व दूरदृष्टि होना ज़रूरी है।

एक आम कार्यकर्ता या व्यक्ति के सम्मान और उसको बराबरी देने की बात जो राहुल जी ने कही उसने मुझे बहुत प्रभावित किया। राजनीति में कई साल देने के बाद यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे में मैं काफ़ी सोचती हूँ। राजनैतिक कार्यकर्ताओं को सम्मान व संगठन में भागीदारी मिलनी चाहिए। उनकी बातों को सुना जाना चाहिए। उनके सुझावों को अहमियत देनी चाहिए। लेकिन कई राजनैतिक दल ऐसा नहीं करते और इसके चलते ही वह लगातार कमज़ोर होते जा रहे हैं।

सभी दलों के लिए ज़रूरी है की वह नियंत्रण का विकेन्द्रीकरण (decentralisation) करें व आम कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान की रक्षा करें। साथ ही नये लोगों के लिए रास्ते खोलना भी आवश्यक है। इस संदर्भ में राहुल जी का कहना कि हमें लोगों को याद दिलाना है कि कांग्रेस आपकी पार्टी है एक उम्मीद जगाता है। इस सोच के लिए कांग्रेस अध्यक्ष को शुभकामनाएँ।“

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