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नदियों की सफाई और स्वच्छता को गांधी और लोहिया के चितंन से जोड़ें

Socialist thinker Dr. Prem Singh is the National President of the Socialist Party. He is an associate professor at Delhi University समाजवादी चिंतक डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं

डॉ. प्रेम सिंह (DR. Prem singh) ने यह लेख ‘युवा संवाद’ (Yuva Samvad) में अक्तूबर 2009 में लिखा था। मोदी (Narendra Modi) ने ‘गंगा के बुलावे’ पर बनारस (Varanasi) से चुनाव लड़ा। नई सरकार बनने के बाद से गंगा की सफाई (cleaning of Ganga,) की चर्चा जोरों पर है। उस चर्चा में 5 साल पहले लिखा गया यह लेख प्रासंगिक है। हम इसे पाठकों के लिए फिर से ज्यों का त्यों तीन किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। यह दूसरी किस्त है। – संपादक

गंगा की सफाई (#Ganga) के नए अभियान पर हमारा अलग सवाल है। लेकिन पहले एक परिघटना की और ध्यान दिलाना चाहते हैं जो नवउदारवादी (Neoliberal) दौर में उत्तरोत्तर प्रबल होती जा रही है।

पहले की सभी संस्थाओं और नीतियों को निकम्मा और भ्रष्ट बताया जा रहा है और नई संस्थाएं और नीतियां, जाहिर है नवउदारवादी अजेंडे के मुताबिक, बनाने की घोषणाएं की जा रही हैं। इसके लिए हर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम हो रहा है। ज्यादातर वही लोग यह काम कर रहे हैं जो पहले चली आ रही संस्थाओं के भी कर्ता-धर्ता रहे हैं।

नौकरशाही तो वही रहती ही है, बुद्धिजीवी भी वही हैं, नेता तो हैं ही। कोई ठहर कर यह नहीं पूछता या विचार करता कि उन संस्थाओं और नीतियों के निकम्मा और भ्रष्ट होने के लिए जो जिम्मेदार हैं, उन्हें पहले कटघरे में लाया जाए, ताकि संस्थाएं आगे निकम्मेपन और भ्रष्टाचार का शिकार न बनें, इसके लिए कुछ सबक हासिल हो सकें। लेकिन नहीं।

विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन के आदेश पर नित नई संस्थाओं, नीतियों, परियोजनाओं और कार्यव्रफमों की घोषणा हो रही है। कल तक ‘निकम्मी और भ्रष्ट’ संस्थाओं को चलाने वाले बुद्धिजीवी नई रपटें लेकर मंत्रियों और सचिवों के दरबार में हाजिर हो रहे हैं। नए कार्यभार सम्हाल रहे हैं। बल्कि वैसा करने के लिए हमेशा की तरह तरह-तरह के जोड़-तोड़ कर रहे हैं।

दरअसल, भारत में नवउदारवाद की सांस इसी पर टिकी है कि कुछ नया होते दिखना चाहिए। इससे गरीबी और जहालत के नर्क में रहने वाली विशाल आबादी में यह भ्रम बना रहता है कि उनके लिए कुछ हो रहा है। और नवउदारवाद के फायदेमंद चांदी काटने में लगे रहते हैं।

हमने यहां यह चर्चा इसलिए चलाई है कि यह जो गंगा साफ करने का अचानक नया ज्वार पैदा हुआ है और उन्हीं में हुआ है जो पिछले 20-25 सालों से ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’, केंद्रीय जल आयोग, राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण (1995) और ‘गंगा एक्शन प्लान’ (1985) जैसी परियोजनाएं और संस्थाएं और पर्यावरण मंत्रालय चलाते रहे हैं, उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि पहले जो काम संपन्न नहीं हुआ, बल्कि बिगड़ा, उसके लिए कौन जिम्मेदार हैं?

रुड़की आईआईटी के उन इंजीनियरों से भी जवाब तलब होना चाहिए जिन्होंने कहा – गंगा और अन्य नदियों में पानी का बहाव बरकरार रहने की कोई जरूरत नहीं है, सारा पानी सिंचाई और पेयजल योजनाओं के लिए निकाल लेना चाहिए, समुद्र में एक बूंद पानी नहीं जाना चाहिए। नदियों में पानी बहते रहना चाहिए, इसके लिए 90 के दशक में सुप्रीम कोर्ट को आदेश जारी करना पड़ा। जनता की गाढ़ी कमाई का धन खाने और बरबाद करने की अगर उन्हें सजा नहीं दी जाती है तो कम से कम नए काम की जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। बुद्धिजीवियों को जनता के साथ किए जाने वाले छल पर मजबूती से सवाल उठाने चाहिए। नए भारत के निर्माण के लिए यह भी एक जरूरी कर्तव्य है।

जनांदोलनकारियों को तो ऐसी समितियों से सोची-समझी दूरी बना कर रखनी ही चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। तभी नवउदारवादी अजेंडा इतनी बरबादी करने के बावजूद इतनी आसानी से हर क्षेत्र पर अपनी गिरफ्त बनाता जा रहा है।

अब हम अपने सवाल पर आते हैं।

प्रधानमंत्री का ऐलान है कि जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा आबादी को शहरों में ले आना है। अगर हमें ठीक से याद है तो उनका लक्ष्य 2020 तक, जो उनकी मंडली के मुताबिक भारत के महाशक्ति बनने का वर्ष भी है, 40 प्रतिशत आबादी शहरों में लाई जाएगी। उसके बाद 60 प्रतिशत को शहरों में लाने का काम जारी रहेगा। कहने की जरूरत नहीं, देश की सारी ग्रामीण और कस्बाई आबादी शहरों में लाकर नहीं बसाई जा सकती। अभी ही यह हालत है कि भारत का एक भी बड़ा शहर ऐसा नहीं है जिसमें कुल आबादी के एक-चौथाई हिस्से के लिए नागरिक और प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध हों। इसके बावजूद मौजूदा शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ता जा रहा है। तो फिर तेजी से अनेक नए शहर बनाने होंगे। हालांकि अभी तक मौजूदा छोटे-बड़े शहरों में सीवर की व्यवस्था पूरी नहीं है, यह मान कर चलना होगा कि नए शहरों में लोगों को बसाने के लिए भवन और सीवर की व्यवस्था करनी होगी।

शहर के लोग खुले में न रह सकते हैं, न जंगल-जोहड़ जा सकते हैं। भवन बनाने के लिए रेत नदियों से निकालना होगा जो पहले ही अंधाधुंध रेत-खनन (सैंड माइनिंग) से खोखली हो चुकी हैं। गंगा के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण 79 से 99 प्रतिशत तक किया जा चुका रेत-खनन है। शहरी लोग खेती नहीं करते लिहाजा शहरी आबादी की नौकरी के लिए हर शहर में कोई न कोई उद्योग लगाने होंगे।

जाहिर है, नए शहरों की नगरपालिकाओं की गंदगी और उद्योगों का कचरा नदियों में जाएगा।

गंगा 13452 फुट की उंचाई पर गंगोत्री ग्लेसियर से निकल कर 2525 किलोमीटर का फासला तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में जा कर मिलती है। वह पांच राज्यों से होकर गुजरती है जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे सघन आबादी वाले राज्य भी हैं। उसके किनारों पर छोटी-बड़ी आबादी वाले 114 शहर बसे हैं। उसकी घाटी में गंगा के पानी और धरती को व्रफोमियम कचरे से विषाक्त बनाने वाले कानफर के कुख्यात चमड़ा उद्योग सहित 132 बड़ी औद्योगिक ईकाइयां हैं। ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड’ की रपट के अनुसार शहरों की नगरपरलिकाओं की 1.2 बिलियन सीवेज गंदगी और 2.1 बिलियन लीटर औद्योगिक कचरा प्रतिदिन गंगा में गिरता है। प्रधानमंत्री, अथवा जिस आधुनिक औद्योगिक पूंजीवादी-उपभोक्तावादी सभ्यता के वे फरस्कर्ता हैं, की इच्छित शहरीकरण की प्रक्रिया में कुछ नए शहर गंगा के किनारे भी बनेंगे। बाकी नदियों और पूरे देश की बात जाने दीजिए, गंगा किनारे के शहरों की गंदगी और औद्योगिक कचरा कहां जाएगा? जाहिर है, गंगा में। फिर और परियोजनाएं बनेंगी, विश्व बैंक से और कर्ज आएगा,  और हजम होगा। इस पूरी प्रक्रिया में देश की ज्यादातर आबादी गंदगी और कचरे का ढेर बनी रहेगी। साथ में गंगा भी।

हम गंगा की सफाई के अभियान में हिस्सेदारी (Participation in the cleaning of the Ganges) करने वाले संगठनों और लोगों का सम्मान करते हैं।

हम उन विद्वानों और वैज्ञानिकों का भी सम्मान करते हैं जो गंगा व अन्य नदियों समेत पर्यावरण-प्रदूषण के दरपेश संकट की वास्तविकता समझा कर सामने रखते हैं और आगाह करते हैं। हमारा इतना कहना है कि वे अगर इस विकास के साथ हैं तो उनके प्रयास कभी सार्थक नहीं होने हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण के अध्ययन और उसके प्रति जागरूकता फैलाने के प्रयासों का औचित्य तभी बनता है जब पूंजीवादी-उपभोक्तावादी विकास की धुरी को वैकल्पिक विकास के दर्शन की तरफ अग्रसर करने के प्रयास किए जाएं। वरना यह सारा उद्यम एक छोटी आबादी के ऐश्वर्यपूर्ण किंतु खोखले जीवनस्तर को बनाए और बढ़ाए रखने के लिए हो जाता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण का संकट दुनिया के गरीबों की जान का संकट बना हुआ है। इस विकास के मॉडल के तहत उसके चलाने वालों के साथ उनकी संस्थाओं में बैठ कर समाधान निकालने में हिस्सेदारी करने वाले पर्यावरणविद और वैज्ञानिक गरीबों के मददगार नहीं होते।अब शुरू में दिए गए नेहरू जी के उद्धरण पर आते हैं।

भारत में ज्यादातर नदियां तीर्थस्थल भी हैं। उनके किनारे पूरे साल छोटे-बड़े नहान (स्नान) व अन्य पर्व चलते रहते हैं। उनमें महीनों तक विशाल संख्या में लोगों का जुटान होता है। इस तरह के नदियों वाले देश के विकास का मॉडल तय करते वक्त नदियों की सफाई के काम को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए था। लेकिन नेहरू जी खामखयाली में ज्यादा रहते थे। गोया औद्योगिकरण-शहरीकरण और प्राकृतिक शुचिता और सौंदर्य साथ-साथ चलते रहेंगे! उसी समय डॉ. लोहिया ने ‘नदियां साफ करो’ का आह्वान किया था। नेहरूवादियों ने पूरी ताकत से उनकी हर बात का विरोध किया। आज भी करते हैं।

‘गंगा एक्शन प्लान’ के निदेशक रहे के. सी. शिवरामकृष्णन का कहना है कि 70 के दशक के अंत तक गंगा सहित भारत की लगभग सभी नदियां गंदा नाला बन चुकी थीं। डॉ. लोहिया के आह्वान पर ध्यान दिया जाता तो आज समस्या उतनी विकराल नहीं होती।

यह डॉ. लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। सरकार को उससे कोई लेना-देना नहीं है। अगर जरा-मरा भी होता तो, जैसा कि सरकारें करती हैं, इस परियोजना को नदियों के प्रदूषण के प्रति जन-चेतना फैलाने वाले डॉ. लोहिया के नाम पर कर सकती थी।

डॉ. लोहिया का तमगा पहनने वालों का हाल किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में जिसे ‘पोर्न प्रेजीडेंट’ का नाम अता किया गया, उस बिल क्लिंटन के साथ लखनऊ में नाच-रंग जमाने वाले और परमाणु करार को संसद में पारित कराने के लिए अमेरिका और मनमोहन सिंह सरकार की खुली दलाली करने वाले ‘समाजवादी’ उनके जन्मशताब्दी वर्ष का भी समारोह कर रहे हैं। हमने जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत के पहले ‘समय संवाद’ में गांधीवादी समाजवादी साथियों से लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष के कर्तव्य के रूप में निवेदन किया था कि कांग्रेस और भाजपा की विचारधारा और राजनीति में हजम हो चुके समाजवादियों को छोड़ कर नई शुरुआत करें। लेकिन साथियों को हमारी बात उचित नहीं लगी। हम भारत में गंगा समेत सभी नदियों की सफाई और स्वच्छता की सच्ची इच्छा रखने वाले लोगों और संगठनों से आशा करते हैं कि वे अपना उद्यम गांधी और लोहिया के चितंन से जोड़ेंगे। ताकि प्रकृति और अनेक जीवधारियों सहित बहुलांश मानव आबादी का विनाश करने वाले इस विकास का विकल्प तैयार हो सके।………………. जारी

कैसे बचेगी धरती कैसे बचेगी दुनिया?

O – प्रेम सिंह

समाजवादी चिंतक डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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