आपकी नज़रहस्तक्षेप

सत्ता की लालसा में दल-बदल की राजनीति

Party Defection politics

बिके करोड़ों में यहां, नेतागण श्रीमान/ सब कुछ बिकता है यहां, बचा कहां ईमान

वर्तमान राजनीति में विधायकों और सांसदों के दल बदलने की प्रक्रिया (Party change process) जैसे बेहद आम हो गई है। जिसका सीधा कारण वैचारिक समानता (Conceptual equality) से ज्यादा सत्ता की लालसा (Longing for power) रह गया है। इससे मौकापरस्ती व राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है। 52वें संविधान संशोधन (52th Constitution Amendment) के अनुसार, किसी सदस्य द्वारा स्वेच्छा से दल छोड़ने या पार्टी व्हिप की अवहेलना करने पर उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है, परंतु किसी दल के एक तिहाई सदस्य अगर अलग होते हैं या किसी दूसरे दल में शामिल होते हैं तो सदस्यता खत्म करने का यह प्रावधान उन पर लागू नहीं होगा। 91वें संविधान संशोधन (91st Constitution Amendment) में यह अनुपात दो-तिहाई सदस्य कर दिया गया। इस संशोधन के बाद अब सदस्य विभाजन के बाद कोई स्वतंत्र ग्रुप नहीं बना सकते, बल्कि उन्हें किसी दूसरे दल में शामिल होना होगा।

वर्तमान में भारतीय राजनीति में बहुत से दलों का निर्माण हो चुका है और अब शासन की डोर एक दल नहीं बल्कि, गठबंधन की सरकार के हाथों में होती है। वर्तमान में यूपीए और एनडीए 2 गठबंधन के बीच सत्ता का परिसंचरण हो रहा है। पर गठबंधन का आधार वैचारिक समानता ना होकर सत्ता सुख हो गया है और इसका सबसे घातक पक्ष है ब्लैकमेलिंग। सहयोगी दल अपनी बात मनवाने के लिए प्रमुख पार्टी को ब्लैकमेल करते हैं कि वो गठबंधन तोड़ देंगे और सरकार गिर जाएगी। येन-केन-प्रकारेण वो अपनी बातें मनवाने के लिए मजबूर करते हैं और सवा सौ करोड़ की भारतीय जनता सब-कुछ देखती रह जाती है, जैसे उसे छला गया हो। चुनाव के वक्त वो किसी दल के टिकट से खड़े होकर निर्वाचित होते हैं, उसके बाद पार्टी अगर बहुमत में ना आए और सामने वाला दल उस पार्टी को तोड़ने के लिए विधायकों को खरीदने लग जाए तो भारी कीमत में विधायक बिक जाते हैं। विधायकों की खरीद-फरोख्त ऐसा लगता है, जैसे लोकतंत्र की आत्मा की हत्या हो रही हो या फिर जनता के साथ छल हो रहा हो। जो पार्टी अधिक मत लेकर आ रही हो, कई बार वो भी सरकार नहीं बना पाती, क्योंकि उसके विधायक तोड़ दिए जाते हैं और कम वोट पाने वाली पार्टी, जिसे जनता ने नकार दिया हो वो सरकार बना लेती है, जो एक प्रकार से जनता के आदेश की अवहेलना है, यह आखिर कहां तक सही है। क्या, इस पर पूरी तरह रोक नहीं लगनी चाहिए? क्या अधिक कड़ा कानून नहीं बनना चाहिए? क्या ये सब भारत की जनता के साथ छलावा नहीं है?

जो भी हो पर सत्ता की लालसा में ये एक राजनीतिक गिरावट देश को किस

Pooja Agarwal पूजा अग्रवाल, रायपुर, छत्तीसगढ़
पूजा अग्रवाल, रायपुर, छत्तीसगढ़

तरफ लेकर जाएगी, हम सब जानते हैं। जिसकी लाठी, उसकी भैंस, जो पार्टी ताकतवर होगी वो कमजोर पार्टी के विधायकों को खरीद कर राज्यों और केंद्र में अपनी सरकार बनाती चली जाएगी और एक वक्त ऐसा भी आएगा कि कोई मजबूत विरोधी पार्टी ही नहीं बचेगी और जब ऐसा होता है, तब शासन निरंकुश हो जाता है। मजबूत विरोधी पार्टी का अस्तित्व होना जनता के हित में लोकतंत्र के लिए बेहद आवश्यक है। आज के दौर में ये बात समझने की बेहद जरूरत है।

बिके करोड़ों में यहां, नेतागण श्रीमान,

सब कुछ बिकता है यहां, बचा कहां ईमान।

पूजा अग्रवाल, रायपुर, छत्तीसगढ़

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