Breaking News
Home / हस्तक्षेप / आपकी नज़र / शिक्षा में गुणवता के नाम पर निजी शिक्षा संस्थानों का कारोबार : कहीं यह आम जनता को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश तो नहीं?
National News

शिक्षा में गुणवता के नाम पर निजी शिक्षा संस्थानों का कारोबार : कहीं यह आम जनता को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश तो नहीं?

शिक्षा में गुणवता : एक यक्ष प्रश्न

शिक्षा किसे दी जाये, कितनी दी जाये और क्या दी जाये, यह शासक वर्ग तय करता है

डा. विजय विशाल                   

बीसवीं सदी के महान शिक्षा शास्त्री पॉआलो फ्रेरे ने शिक्षा की भूमिका को इन शब्दों में व्यक्त किया है, ”कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती। शिक्षा या तो पालतू बनाती है या मुक्त करती है।“ उनके इस कथन से निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा वैसा कोई निरापद क्षेत्र नहीं जैसा सामान्यतः उसे माना या समझा जाता है। बल्कि यह शासक वर्ग की नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहता है। जिसमें मुख्यतः तीन बातों का निर्धारण शासक वर्ग करता आया है- पहला यह कि शिक्षा किसे दी जाये अर्थात् समाज के कौन से हिस्से तक शिक्षा सीमित रखी जाये। दूसरा, कितनी शिक्षा दी जाये और तीसरा क्या शिक्षा दी जाये।

इन बातों की पुष्टि शिक्षा की विकास यात्रा को परख कर की जा सकती है। इतिहास में बहुत से वर्ग व जातियां अशिक्षित रहीं तो इसलिए नहीं कि वे अशिक्षित ही रहना चाहती थी। बल्कि उन्हें तत्कालीन शासक वर्ग द्वारा शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार ही नहीं दिया जाता था। आज भी अनेक वर्ग व जातियां निरक्षर पाई जाती हैं, इनमें भी महिलाओं का प्रतिशत अधिक है, यह स्थिति भी उन्हीं नीतियों की परिणीति है। इसलिए यदि हम शिक्षा के सम्बन्ध में चिंतन करना चाहते हैं या शिक्षा को लेकर समाज में बहस चलाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से इसके केन्द्र में सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक मुद्दे रहेंगें।

देश के सरकारी विश्वविद्यालय एक ही दिन में ध्वस्त नहीं कर पाएगी सरकार

देश की आजादी के लिए लड़ने वाले कई नेताओं ने लोकतांत्रिक समाज की रचना में शिक्षा की उपयोगिता को पहचाना था। गोपालकृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय, ऐनीबेसेंट और महात्मा गांधी आदि ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपने राजनैतिक प्रयासों में शिक्षा को भी तरजीह दी। स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत के सामने पहली जिम्मेवारी थी, उपनिवेशवादी शासकों से विरासत में मिली शिक्षा प्रणाली के ढांचे की खामियों को दूर करना और भारतीय राजनीतिक प्रणाली के सामाजिक आर्थिक रूपांतरण के लिए इसमें परिवर्तन करना। ताकि हमारा देश औपनिवेशिक अल्प विकास की अवस्था से निकलकर विकास के आत्मनिर्भर रास्ते पर चल सके। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु आदी के बाद श्रीमाली, मुदालियर, कोठारी और जे.पी.नाइक ने शिक्षा को सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम का हिस्सा मानने की परपंरा बनाए रखी।

भारत में शिक्षा ने लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाने में मदद नहीं की

इसके बावजूद स्वतंत्र भारत में शिक्षा लोकतांत्रिक दृष्टि और मूल्यों के मुताबिक नहीं चली। फलस्वरूप शिक्षा ने देश में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाने में मदद नहीं की। न ही उसने सामाजिक व्यवस्था की जमीन से सामंती और औपनिवेशिक तत्वों को उखाड़ने में सकारात्मक भूमिका अदा की।

रवींद्रनाथ टैगोर की लोक विरासत पर मोदी सरकार का हमला,  किसी को देशिकोत्तम न देने का प्रधानमंत्री का फतवा

आजादी के पश्चात के इन छः दशकों में शिक्षा व्यवस्था की व्यापक विफलता को स्वीकार करते हुए शिक्षाविद् प्रोफेसर कृष्ण कुमार लिखते हैं-

”हमारी शिक्षा व्यवस्था ने तर्क और विवेक की भाषा को लोकप्रिय बनाने की कोशिश नहीं की। सत्य को ढूंढने और ढूंढ कर दूसरों को दिखाने के लिए भाषा की शिक्षा न हमारी पाठशालाओं में दी जा रही है न हमारे विश्वविद्यालयों में। इन संस्थानों में दी जा रही शिक्षा सत्य से, जीवन से, अपने समाज के यथार्थ से, अपने परिवेश से और पर्यावरण से जी चुराना सीखाती है, इनसे जुड़ना और जूझना नहीं सीखाती। नारी-पुरूष संबंधों में आज हम जैसी संवेदनशून्यता देखते हैं, मंहगी और विकसित मशीनों के इस्तेमाल में जैसी फिजूलखर्ची और विवेकहीनता देखते हैं, अपनी जमीन, आबोहवा और पेड़ पौधों के प्रति जैसी नृशंसता देखते हैं, उसकी जड़ में शिक्षा की विफलता ही है।“

दोहरी शिक्षा व्यवस्था की वजह है शिक्षा की विफलता की

इस विफलता का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमारी शिक्षा- व्यवस्था दो धाराओं में बंटी है। एक धारा में वे बच्चे हैं, जिनकी शिक्षा का खर्च राज्य के जिम्मे है। दूसरी धारा के बच्चों का खर्च उनके मां-बाप उठाते हैं। इन दोनों धाराओं के पृथक बने रहने का अर्थ यह है कि धनी परिवारों के बच्चे गरीबों की संतान से अलग कर दिये जाते हैं। इस दोहरी शिक्षा व्यवस्था का बीज उन्नीसवीं सदी में तब पड़ा था जब अंग्रेजी राज ने आज की शिक्षा व्यवस्था स्थापित की थी। तब देश के प्रभावशाली वर्ग ने तुंरत ताड़ लिया कि नई शिक्षा उनकी तरक्की के लिये एक उपयोगी साधन है। उन्हें इस साधन के दो मुख्य उपयोग नजर आए- एक था अंग्रेजी राज में प्रभावशाली हिस्सेदारी निभाने के लिए जरूरी ज्ञान और कौशल प्राप्त करना और दूसरा समाज के निचले तबकों पर अपनी पारंपरिक पकड़ और मजबूत बनाना।

वाह रे अच्छे दिन : एक ही विश्वविद्यालय में एक ही पढ़ाई पढ़ने के लिए फीस अलग-अलग

हालांकि हमारी राजनैतिक प्रणाली प्रतियोगी गतिशीलता की पक्षधर है और समान अवसर के विचार पर बल देती है। मगर यह एक सच्चाई है कि ऊॅची नौकरियों तक पहुंचने के रास्ते इन अभिजात संस्थाओं से होकर गुजरते हैं। जिनके पास शिक्षा को खरीदने की क्षमता है, उनके लिए अधिकारिक शिक्षा उपलब्ध है। जिनके पास शिक्षा खरीदे की क्षमता नहीं, उन्हें सब्र करना सीखाने के लिए अनौपचारिक शिक्षा दी जा रही है। जबकि आधुनिक कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक को शिक्षित करें। मगर वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियों के चलते राज्य अपने इस कर्तव्य से विमुख होकर निजीकरण को बढ़ावा दे रहा है। परिणाम स्वरूप बेहतर शिक्षा के नाम से शिक्षा का व्यापारीकरण तीव्र गति से हो रहा है। आज गली-गली, गांव-गांव में निजी व्यापारिक शिक्षण संस्थाएं कुकरमुत्ते की तरह पनप रही हैं। सड़कों के किनारे, हाट बाजार के बीच चलने वाली इन शिक्षा संस्थाओं के माध्यम से भले ही बच्चों की पढ़ाई और पकौड़ों की तलाई में कोई अंतर नजर न आता हो, परन्तु यह दुहाई दी जाती है कि निजी संस्थायें बाजार की मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर चल रही है, जबकि इन शिक्षा संस्थानों का बढ़ना, राज्य का अपनी जिम्मेवारी से विमुख होना है। इस बात की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में समूचा शिक्षा तंत्र इन निजी हाथों में चला जाये।

शिक्षा में गुणवता के नाम पर निजी शिक्षा संस्थानों का कारोबार

पढ़ाई के मामले में अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे राजकीय शिक्षण संस्थानों की साख लगातार कम होती जा रही है। जिसके मुकाबले में निजी शिक्षा संस्थानों का कारोबार निरंतर बढ़ता जा रहा है। हालांकि यहां भी यह सब ”शिक्षा में गुणवता“ के नाम पर हो रहा है। ‘‘शिक्षा में गुणवता’’ की चुनौतियां सरकारी व निजी दोनों ही शिक्षा तंत्रों के समक्ष मुहं बाए खड़ी है। हां, सरकारी उदासीनता, राजनीतिक दखलअंदाजी, आर्थिक विपन्न्ता व कमजोर शिक्षा प्रशासन के कारण सरकारी विद्यालयों की स्थिति इन निजी शिक्षा संस्थाओं के समक्ष और भी दयनीय होती जा रही है। इतनी दयनीय कि शिक्षा के प्रति जागरूक मजदूर व छोटे किसान भी इन सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने से कतराते हैं। अतः इन शिक्षण संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना तथा शिक्षा में गुणवत्तात्मक सुधार लाना हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है।

यह अंतत: राजनीति से तय होता है कि हम कितने स्वस्थ हैं

इस चुनौती को दो रूपों में देखा जा सकता है। पहला औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन के रूप में और दूसरा मौजूदा व्यवस्था में व्यापक सुधार करते हुए इसे समाज व समय के अनुरूप बनाना। जहां तक आमूल-चूल परिवर्तन की बात है इस चुनौती से निपटने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत है, जिसे राष्ट्र आज से छः दशक पहले इसी औपनिवेशिक शिक्षा के प्रभाव से खो चुका है। अगर ऐसा न होता तो क्या स्वतंत्र भारत में गांधी जी द्वारा प्रस्तावित ”बुनियादी तालीम“ से हम अपनी शिक्षा की शुरूआत न करते ? जब तक संपूर्ण राष्ट्र इन प्रश्नों पर एकजुट नहीं हो जाता, हमें मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को ही ठोक बजाकर अपने समय के अनुरूप ढालना होगा। जो कुछ शिक्षा के नाम पर हो रहा है या चल रहा है, उसे बेहतर कैसे बनाया जा सकता है उसी में गुणवत्तात्मक सुधार कैसे लाए जा सकते हैं? यही चुनौती हमारे चिंतन का मुख्य विषय होनी चाहिए।

यूजीसी भंग करने का फैसला : शिक्षा के हिंदुत्वकरण का संघ परिवार के एजंडे का क्रमबद्ध हमला

शिक्षा में गुणतवा की बात जब हम करते हैं तो हमें शैक्षिक स्तर दो पक्षों से देखना होगा। एक- अंकज्ञान और अक्षर ज्ञान में आत्मनिर्भरता की स्थिति और दूसरा शिक्षा के बृहत्तर उद्देश्यों की स्थिति में, जिसमें शिक्षा के द्वारा बेहतर इंसान व समाज के निर्माण की परिकल्पना की गई है। एक ऐसे बेहतर इंसान के रूप में जो राष्ट्र व समाज के लिए एक आदर्श नागरिक हो। जो वैज्ञानिक चेतना व दृष्टिकोण से लैस हों। धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक जीवन पद्धति का आचरण करें। जो राष्ट्रीय प्रेम से सराबोर हो तथा जिसे अपने सांस्कृतिक मूल्यों से लगाव हो। जो मेहनत से जी न चुराता हो। जिसमें सहिष्णुता, त्याग आदि मानवोचित गुणों का समावेश हो तथा जो अपनी सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक परिस्थितियों का आलोचनात्मक विवेचन करने में सक्षम हो।

2019 के बाद आपकी लंगोटी, रोटी और बोटी नहीं मिलेगी क्योंकि मोदी के आदर्श हैं तालिबान और पोलपोट

शिक्षा के इन व्यापक लक्ष्यों से पहले अगर हम अक्षर ज्ञान और अंक ज्ञान की स्थिति का आकलन करें तो हमें इसे एक कड़वी सच्चाई के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा कि बारह वर्षो तक इन औपचारिक शिक्षा संस्थानों में रहने के बाद भी कई छात्र इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं पाए जाते। स्थिति की दयनीयता से पता तब चलता है, जब जमा एक व दो के कई छात्र एक बटा-चार को एक बटा तीन से बड़ा मानते हैं। अंग्रेजी की अनिवार्यता ने देहाती छात्रों के मनोबल को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस विदेशी भाषा का हौवा इस कदर उनके सिर पर चढ़ कर बोलता है कि अपनी पढ़ाई का तीन चौथाई समय वे इसे ही अर्पित कर देते हैं मगर हाथ तब भी कुछ नहीं आता। शेष बचे एक चौथाई समय में वे अन्य विषयों को भी ध्यान से नहीं पढ़ पाते। इसी कारण राजनीति शास्त्र में उनके लिए शीत युद्ध की परिभाषा सर्दियों में लड़े जाने वाले युद्ध से होती है। जबकि हिन्दी साहित्य में वे कबीर जैसे भक्त कवि को अंग्रेजी भाषा का विद्वान घोषित कर देते हैं। इस आकलन के बाद शिक्षा के बृहतर उद्देश्यों की प्राप्ति पर बात करने की और गुंजाईश नहीं रहती।

कौन लेगा शिक्षा के इस निरंतर गिरते स्तर की जिम्मेवारी

विडम्बना यह है कि स्कूली शिक्षा के इस गिरते स्तर के प्रति शिक्षकों का कोई भी वर्ग आत्म स्वीकारोक्ति करता नजर नहीं आता। प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षा में बंटा हमारा शिक्षक समुदाय अपने-अपने टापू को सुरक्षित रखने में जुटा है। शिक्षा के इस निरंतर गिरते स्तर की जिम्मेवारी लेने को न कोई शिक्षक समुदाय तैयार दिखाई देता है और न ही समाज का कोई हिस्सा पहल करता नजर आ रहा है। सभी अपने अपने बचाव में बेहतर तर्क गढ़ने में माहिर हो चुके हैं। इसी तर्क पद्धति के चलते स्कूल प्राध्यापक छात्रों के निम्न शैक्षिक स्तर का सारा दोष उच्च व माध्यमिक शिक्षा के अध्यापकों पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। माध्यमिक शिक्षा के अध्यापक इस कलंक के ठीकरे को प्राथमिक शिक्षकों के माथे पर फोड़ देते हैं और प्राथमिक शिक्षक सरकार व समाज को इस सबके लिए जिम्मेवार मानते हुए, स्वयं कन्नी काट जाते हैं। अगर यही सिलसिला जारी रहा, उसे रोकने व सुधारने के प्रयास न किये गए तो वह दिन दूर नहीं, जब यह संपूर्ण ढांचा भूरभूरा कर ढह जायेगा। बिना किसी भूकंप या तुफान के।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भंग : उच्च शिक्षा बाजार के हवाले

नई आर्थिक नीतियों के चलते ”अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा“ के क्षेत्र में पूंजीगत निवेश बढ़ा है। (भले यह पूंजी विश्व बैंक द्वारा लंबी समयावधि के लिए कर्ज क्यों न हो?) जिसके चलते ‘सर्व शिक्षा अभियान ’ या सबके लिए शिक्षा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भौतिक संरचनात्मक ढांचा खड़ा किया जा रहा है। मगर दूसरी ओर नियमित व स्थाई शिक्षकों की नियुक्तियां लगभग बंद कर दी गई है। शिक्षा मित्र, पंचायत सहायक अध्यापक, ग्रामीण विद्या उपासक, विद्या उपासक, पैरा टीचर, पी.टी.ए. अध्यापक, अनुबंध अध्यापक जैसे अनके पदनामों के आधार पर बेरोजगारों को मामूली मासिक मानदेय या वेतनमान देकर शिक्षक की जिम्मेवारी सौंपी जा रही है। अपने भविष्य के प्रति स्वयं असुरक्षित व्यक्ति कैसे भावी पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर पायेगा? यह प्रश्न हवा में तैर रहा है।

कहीं यह आम जनता को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश तो नहीं?

हालांकि शिक्षा में पतन के कारणों पर अनेकों बार चर्चाएं होती रही है। इसकी खामियों को दूर करने के लिए कई शिक्षाविदों व आयोगों ने समय समय पर अपनी प्रस्तावनाएं व सुझाव विभिन्न सरकारों को दिये हैं। मगर राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव के चलते तथा व्यापक जन दबाब न होने के कारण इन प्रस्तावनाओं व सुझावों को ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि शासक वर्ग, जिसमें राजनीतिज्ञ, बड़े सरकारी अधिकारी व उद्योगपति शामिल है, के बच्चे इन सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते।

अच्छे दिन : दौलत के हवाले शिक्षा और सेहत

इस मायने में भले ही हमारे अनुभव सुखद न हो, परन्तु स्थिति की गंभीरता को देखते हुये चुप रहना भी श्रेयस्कर नहीं हैं। इसलिए हमें बार बार बिना किसी थकान के अपने प्रयास जारी रखने होगें। तब तक,जब तक कि राजसत्ता शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए सचमुच गंभीर न हो जाये। आम जनता जब तक दबाव न डाले और सभी शिक्षक संगठन जब तक इसके लिए पहल न करें, हमें किसी भी हालत में हार नहीं माननी होगी। हमें यह भी मानना होगा कि केवल शासकीय कदमों से शिक्षा में गुणवता नहीं आने वाली। इसके लिए जहां अभिभावकों को पहल करनी होगी, वहीं शिक्षक समुदाय को भी इस चुनौती से निपटने के लिए कमर कसनी होगी।

 (डा. विजय विशाल, लेखक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

About हस्तक्षेप

Check Also

BBC

बीबीसी : निर्भीक पत्रकारिता का सर्वोच्च स्वर

इस समय विश्व का अधिकांश भाग हिंसा, संकट, सत्ता संघर्ष, साम्प्रदायिक व जातीय हिंसा तथा …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: