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रवींद्रनाथ टैगोर की लोक विरासत पर मोदी सरकार का हमला,  किसी को देशिकोत्तम न देने का प्रधानमंत्री का फतवा

रवींद्रनाथ टैगोर की लोक विरासत पर मोदी सरकार का हमला,  किसी को देशिकोत्तम न देने का प्रधानमंत्री का फतवा

पलाश विश्वास

कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार के गठन से जो विद्वतजन भारत में लोकतंत्र और न्याय की बहाली का जश्न मना रहे हैं, उनके लिए यह निवेदन है।

पूंजीवादी साम्राज्यवादी विकल्प के मुक्तबाजारी सत्ता समीकरण में भारत का भविष्य देखने वाले पढ़े लिखे लोगों के लिए भी यह मामला शायद प्रासंगिक है।

फासीवादी निरंकुश सत्ता की नजर में रवींद्रनाथ राष्ट्रद्रोही है और बाल गंगाधर तिलक से लेकर शहीदेआजम भगतसिंह तक सारे स्वतंत्रता सेनानी आतंकवादी।

रवींद्रनाथ को पाट्यक्रम से बाहर रखने का फतवा पहले ही जारी हो चुका है और अब सीधे विश्वभारती की स्वायत्तता पर हमला करके रवींद्र विरासत के सफाये पर तुला है जनपदों का हत्यारा केंद्र।



रवींद्रनाथ औपचारिक शिक्षा के लिहाज से अपढ़ थे और अनौपचारिक शिक्षा की नींव में ही उनकी रचनात्मकता है। वे राष्ट्रीयता और राष्ट्र की पश्चिमी सामंती साम्राज्यवादी अवधारणाओं के विरुद्ध बहुलता और विविधता में रचे बसे भारतीय जनपदों के संघीय सामाजिक लोकतंत्र के पक्षधर थे।

व्यवस्था का वर्गीय जाति वर्चस्व को कायम रखने के लिए समूची युवा पीढ़ी को ज्ञान विज्ञान की विविधता बहुलता से वंचित करने वाली महानगरीय औपचारिक शिक्षा के बजाय भारत की बहुलता विविधता की संस्कृति पर आधारित लोक-संस्कृति की जमीन पर समानता और न्याय पर आधारित समाज के निर्माण के लिए शिक्षा की वैकल्पिक भारतीय व्यवस्था के निर्माण के लिए उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।

रवींद्र विमर्श के बारे में हम सिलसिलेवार लिखते बोलते रहे हैं लेकिन मठों के वर्चस्व के कारण हम इस पर न बंगाल में और न बाकी देश में कोई संवाद शुरू कर पा रहे हैं।

आज सुबह बांग्ला दैनिक आनंदबाजार पढ़ने पर पता चला कि देश की केंद्रीय निरंकुश सत्ता ने रवींद्र की इस लोक विरासत पर हमला कर दिया है।

परंपरा के मुताबिक विश्वभारती के के कुलाधिपति पदेन प्रधानमंत्री होते हैं और इस वक्त भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री विश्वभारती के कुलाधिपति हैं और वे ही विश्वभारती के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि होंगें।

इस मौके पर हर वर्ष दिए जाने वाले विश्वभारती के सर्वोच्च सम्मान देशिकोत्तम के लिए विश्वभारती की ओर से अमिताभ बच्चन, अमिताभ घोष,  गुलजार,  वैज्ञानिक अशोक सेन, सुनीति पाठक, चित्रकार योगेन चौधरी और द्विजेन मुखोपाध्याय के नाम केंद्रीय मानवसंसाधन मंत्रालय को भेज दिए गए हैं और वहां से यह सूची कुलाधिपति प्रधानमंत्री को भेज दी गई।

चूकिं अमिताभ घोष और गुलजार गुजरात नरसंहार के खिलाफ मुखर रहे हैं तो यह सूची देखकर दिल्ली की सर्वोच्च सत्ता नाराज बताई जाती है। चित्रकार योगेन चौधरी ममता बनर्जी के घनिष्ठ हैं, इस पर भी नाराजगी बताई जाती है।

लिहाजा मानव संसाधन मंत्रालय और पीएमओ दोनों ने इस सूची को अनुमोदित करने से इंकार कर दिया।

केंद्र सरकार ने विश्वभारती का यह सर्वोच्च सम्मान अब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को देने की सिफारिश की है, जबकि उन्हें पहले ही देशिकोत्तम दिया जा चुका है।

विश्वभारती ने केंद्र को यह जानकारी दी और यह भी स्पष्ट कर दिया कि नयी सूची बनाने के लिए समय बचा नहीं है।

इस पर दिल्ली ने फतवा जारी कर दिया है कि प्रधानमंत्री इस साल किसी को देशिकोत्तम नहीं देंगे।

सम्मान और पुरस्कार सत्ता समीकरण के मुताबिक ही तय होते हैं और सत्ता समीकरण से बाहर के लोग विवेचना में ही नहीं आते। यह बात तो समझ में आती है, लेकिन विश्वभारती जैसी संस्था के कामकाज में केंद्र का यह हस्तक्षेप अभूतपूर्व है।

वैसे तो संघीय व्यवस्था के स्वतंत्रतासेनानियों और संविधाननिर्माताओं के सपने को ध्वस्त कर दिए जाने से लोकतंत्र, संविधान और कानून का राज खत्म है तो संसद, न्यायपालिका और माध्यमों समेत सारे के सारे लोकतांत्रिक प्रतिष्ठान सत्ता के नाभिनाल से जोड़ दिए गए हैं।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना के बाद से जनपदों के इलाहाबाद,  बनारस,  कोलकाता,  आगरा जैसे विश्वविद्यालयों की शुरु से अनदेखी हो रही है।

समूची शिक्षा व्यवस्था अब बाजार के हवाले है और केंद्र की निरंकुश सत्ता ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खत्म कर दी है। शोध और उच्चशिक्षा भी खत्म है।

क्रय शक्ति के मुताबिक डिग्रियां बांटकर बेरोजगार कंबंध गुलामों की व्यवस्था का विरोध न करने में ही अपना वर्गीय जाति हित समझने वाले कुलीन तबकों की नवधनाढ्य सेहत पर शायद इसका कोई असर नहीं होगा।



राष्ट्रवाद के अंधायुग में यही सत्तावर्ग का लोकतंत्र है।

यही मनुस्मृति राजकाज का संविधान है।

जनपदों के विरुद्ध नरसंहारी अभियान की पश्चिमी साम्राज्यवादी राष्ट्र और राष्ट्रवाद के विरुद्ध थे रवींद्रनाथ। हमने इस पर भी उनके लेखों औरभाषणों के आधार पर सिलसिलेवार चर्चा की है।

गांधी का हिंद स्वराज भी इस राष्ट्र और राष्ट्रवाद के विरुद्ध है, जो किसानों, कामगारों, कृषि और जनपदों का सिरे से सफाया कर दें। हम इस पर भी लगातार बोल लिख रहे हैं।

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