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Rahul Gandhis press conference

कांग्रेस में घुसे संघियों के षड़यंत्र का शिकार हुए राहुल गांधी

सौ साल से भी पुरानी पार्टी की कयादत एक बार फिर माँ के आँचल में पहुँच गई

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। सौ साल से भी अधिक पुरानी पार्टी की कयादत एक बार फिर माँ के आँचल में पहुँच गई है। लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Elections 2019) में अपेक्षा से कम सफलता मिलने पर आदर्शवादी नेता राहुल गांधी (Idealist leader Rahul Gandhi) ने पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए नैतिकता के नाते पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और काफ़ी मानमनौव्वल के बाद भी पार्टी की कयादत संभालने को तैयार नहीं हुए थे।

संघी कांग्रेसियों के षड़यंत्रों का शिकार हुए राहुल गांधी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को लगा कि अगर कांग्रेस की कमान किसी गैर गांधी को दी गई तो कही कांग्रेस का हाल सीताराम केसरी वाली कांग्रेस न हो जाए। उस समय भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने जाकर कांग्रेस की कयादत करने को सोनिया गांधी को मनाया था। कमोबेश तब भी कांग्रेस की यही हालत थी या यूँ कहे कि इससे भी बुरे दौर में थी तो गलत नहीं होगा।

कांग्रेस की हालत देख और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की अपील को स्वीकार कर कांग्रेस को मजबूत करने के लिए श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कयादत को क़बूल कर लिया था, जैसे अब क़बूल किया है। हालाँकि राहुल गांधी ने इस्तीफ़े के बाद कहा था कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा।

राहुल गांधी का कथन मोदी की भाजपा के हिसाब से सही भी था कि गांधी परिवार ही है जो उसके झूठ के बने महल को गिरा सकता है, इस लिए वह चाहती है कि कांग्रेस का नेतृत्व गैर गांधी के हाथ में आ जाए और वो अपने झूठ से पूरे हिन्दुस्तान की जनता को मूर्ख बनाती रहे।

इस रणनीति को तो कांग्रेस के चाणक्य अहमद पटेल ने फेल कर दिया और फिलहाल सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनवाकर सोनिया गांधी पर एक बार फिर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की उम्मीदों पर खरा उतरने की ज़िम्मेदारी आ गई है।

कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को उनसे उम्मीद गलत भी नहीं है क्योंकि जब उन्होंने पहली बार कांग्रेस की कयादत सँभाली थी उस समय भी पार्टी और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए कांग्रेस को सत्ता की चाबी लाकर दी थी जो लगभग दस साल तक चली थी।

सोनिया गांधी उस समय अटल-अडवाणी जैसे भाजपा के दिग्गज़ नेताओं के जबड़े से सत्ता निकाल कांग्रेस को सत्ता के केन्द्र में लायी थीं।

सोनिया गांधी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराया ही नहीं था बल्कि तब की भाजपा को महत्वहीन भी कर दिया था। ठीक उसी तरह से मोदी-शाह की जोड़ी को परस्त कर पार्टी को सत्ता के केन्द्र में लाना बडी चुनौती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 की सफलता के बाद से एक ही बात मंच से करते हैं कि हिन्दुस्तान को कांग्रेस मुक्त करना है। हालाँकि मोदी की भाजपा की पीछे से मदद करने वाला संगठन RSS ये बात साफ कर चुका है कि हमारी कांग्रेस मुक्त हिन्दुस्तान की कोई कोशिश नहीं है, जबकि वह झूठ बोलकर कांग्रेस में संघ की मदद करने वालों को यह संदेश देना है कि यह सोच मोदी की होगी हमारी नहीं। यह कहकर आरएसएस मूर्ख बनाता है। असल मक़सद तो संघ का ही है कि किसी भी तरह कांग्रेस को सत्ता के केन्द्र से साफ किया जाए तब जाकर ही अपना काम खुलकर करेंगे।

आज तक कांग्रेस के अंदर मौजूद लोगों ने संघ को पाला पोसा है। नहीं तो संघ इतना बड़ा और पावरफुल संगठन न बनता। यह कड़वी सच्चाई है जिसे कांग्रेस को और उसके वर्तमान नेतृत्व को मानना पड़ेगा। राहुल गांधी उन्हीं नेताओं के हाथों में नहीं खेले और वही नेता राहुल के खिलाफ षड्यंत्र रचते रहे और आख़िरकार राहुल गांधी को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा।

मई 1991 में आतंकवादी हमले के चलते राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस गांधी परिवार से अलग रही केन्द्र में और कई राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद 1996 आते-आते जहाँ कई राज्यों से कांग्रेस विलुप्त सी हो गई थी सिर्फ़ नाममात्र को बची थी। इसी का फ़ायदा उठाकर कई राज्यों में स्वार्थी कांग्रेस नेताओं ने बग़ावत कर अपनी अलग पार्टियाँ बना ली थीं। कांग्रेस की राज्य समितियों को अपनी पार्टियाँ घोषित कर दी गई थीं।

1996 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की इतनी बुरी हालत हुई कि उसे गठबंधन के लायक भी नहीं समझा गया और तीसरे मोर्चे की सरकार बनी। उस समय कांग्रेस हिन्दी हार्ट में चार राज्य हार गई थी और पूरे हिन्दुस्तान से साफ सी हो गई थी।

1996 में बनी तीसरे मोर्चे की सरकार ज़्यादा नहीं चली और 1998 में मध्यावधि चुनाव हुए और भाजपा की पहली बार सरकार बनी। कांग्रेस की हालत और भी ख़राब हो गई। कश्मीर और केरल तक से कांग्रेस जा चुकी थी।

बस यही से होश आने की शुरूआत होती है। कांग्रेस के नेताओं को महसूस होना शुरू हो गया था कि अगर गांधी परिवार के सदस्य को कांग्रेस की कयादत नहीं दी गई तो कांग्रेस गुज़रे ज़माने की बात हो जाएगी। ये बात त्याग की मूर्ति सोनिया गांधी की भी समझ में आ रही थी क्योंकि कांग्रेस से उनका पुराना रिश्ता है कि कांग्रेस को इस बुरे दौर में सहारा नहीं दिया तो कांग्रेस गुज़रे ज़माने की बात हो जाएगी और कांग्रेस नेता भी सोनिया गांधी को इमोशनल ब्लैकमेल कर रहे थे।

इसके बाद सोनिया गांधी 1999 में कांग्रेस की कयादत करने तैयार हो गईं। तब की भाजपा ने सोनिया गांधी के सियासत में आने को बहुत गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन 13 महीने पुरानी अटल सरकार सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर बहुमत साबित नहीं कर पायी और सरकार गिर गई।

अब संघ ने झूठ के षड्यंत्रों का दौर शुरू किया सोनिया गांधी के खिलाफ विदेशी होने का मुद्दा उछाला गया जिसका असर ये हुआ कि महाराष्ट्र के क़द्दावर नेता शरद पवार और पी ए संगमा जैसे नेता पार्टी छोड भाग खड़े हुए और अपनी पार्टी बना ली।

अचानक हुए इस षडयंत्र के लिए पार्टी तैयार नहीं थी और एक बार फिर भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की केन्द्र में सरकार बन गई। इसी बीच सोनिया गांधी कांग्रेस को मजबूत करने में लगी रही कांग्रेस की गुटबाज़ी ख़त्म और जनता में कांग्रेस के प्रति लगाव को बढ़ाती रही।

इसी बीच 2003 में चार राज्यों में चुनाव हुए जिसमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, व दिल्ली के विधानसभा के चुनावों में भाजपा ने बहुमत वाली सरकारें बना लीं। इसी से प्रभावित होकर छह महीने पहले लोकसभा चुनाव का एलान कर दिया गया और नारा दिया गया “इंडिया शाइनिंग”। पर कांग्रेस ने गुटबाज़ी को एक तरफ़ रख सोनिया गांधी के नेतृत्व में मज़बूती से इस खोखले नारे की हवा निकाली जिसका परिणाम कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी। कांग्रेस ने इस बात पर कि भाजपा क्या कह रही है क्या कर रही है इसको ध्यान न देकर देश को मजबूत करने पर ध्यान दिया, जबकि भाजपा का पूरा ध्यान गांधी परिवार पर रहा। सबसे पहले सुषमा स्वराज और उमा भारती को यह षड्यंत्र रचने पर लगाया कि किसी भी तरह सोनिया गांधी प्रधानमंत्री न बन पा।ए सोनिया का इटली का होना भाजपा के षड्यंत्र में काम आया।

सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर पहले भी शोर मचाता रहता था अब सत्ता जाने के बाद उसे ही हथियार बना लिया। संघियों ने घोर निंदनीय दुष्प्रचार किया, बारबाला व कॉलगर्ल्स बताया गया जिस तरह राहुल गांधी के खिलाफ झूठे क़िस्सों को प्रचारित कर उन्हें पप्पू नाम देकर बदनाम किया गया। जहाँ तक राहुल को जानने वालों का मानना है कि राहुल बहुत ही होनहार हैं और वह सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं क़ाबलियत तो उनमें बेशुमार है।

संघियों को मालूम है कि जब भी देश राहुल गांधी के नेतृत्व में आएगा तो देश अपनी कामयाबी की नई इबारत लिखेगा, ये सच है। धार्मिक भावनाओं पर सवार होकर जिस तरीक़े से प्रधानमंत्री नौजवानों को राष्ट्रवाद की चादर ओढ़ाने में कामयाब हो रहे हैं, और मोदी की भाजपा जनता को मूल मुद्दों से दूर ले जा रही हैं उसको अगर कोई बेनक़ाब करने में सक्षम है तो वह गांधी परिवार ही है जो जनता को सच दिखाएगा।

सोनिया गांधी के फिर से अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को संघर्ष करने का मौक़ा मिलेगा राहुल और प्रियंका गांधी का उन्हें भरपूर सहयोग मिलेगा। अगर पार्टी के वर्कर सोनिया राहुल व प्रियंका गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे तो कांग्रेस 2024 में मोदी की भाजपा के सामने काफ़ी मजबूत होकर मोदी की भाजपा व संघ के झूठ का पर्दाफ़ाश करेगी।

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