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Piyush Goyal on train

रेलमंत्री अखबार में जगह पाने के लिए सिर्फ नौटंकी कर रहा है

रेल मंत्री रेल में घूम घूमकर पूछ रहे हैं कि बताइए, आपको कोई कष्ट तो नहीं है!

पीयूष गोयल की यह पहल अच्छी है। पीयूष गोयल खानदानी नेता हैं। उनके बाप भी भाजपा के बड़े नेता और मंत्री भी रहे हैं। स्वाभाविक है कि उन्होंने कभी ट्रेन में यात्रा नहीं की होगी और अगर की होगी तो एसी फर्स्ट क्लास से नीचे न उतरे होंगे।

ऐसे में अगर वह सचमुच यात्रियों की तकलीफ समझना चाहते हैं तो अच्छी बात है। लेकिन उनके चरित्र पर शक होता है।

शक की वजह यह है कि यह पूरी सरकार ही नाटकबाजों और फर्जीवाड़ों की सरकार है। इसके पहले रेल मंत्री सुरेश प्रभु ट्वीट करने पर बच्चों को दूध पहुंचाते थे! मीडिया में खूब खबरें आईं। मुझे समझ मे न आया कि यह क्या नौटंकी है?

आखिरकार एक बार स्लीपर क्लास में यात्रा करते हुए मैंने सुरेश प्रभु को 5-7 ट्वीट किया कि मेरी रिजर्व सीट पर ढेर सारे लोग कब्जा किये हुए हैं कम से कम मेरी सीट ही खाली करा दें, मुझे डर लग रहा है कि यह लोग जबरी खाली करने की मेरी कवायद पर मुझे पीट सकते हैं! प्रभु जी का कोई जवाब न आया। बहरहाल जब बहुत रात हो गई तो सीट पर बैठे लोगों से कुछ प्यार से बातकर और कुछ हड़काकर मैंने ही सीट खाली कराई और शेष रात की यात्रा किसी तरह काट ली।

दिव्य ज्ञान तो पहले से था कि रेल यात्रा बहुत पीड़ादायक है और ट्वीट से समस्या हल करना सम्भव नहीं है। रेलमंत्री अखबार में जगह पाने के लिए सिर्फ नौटंकी कर रहा है। उसे प्रायोगिक तौर पर भी आजमाया।

रेल के जनरल बोगी में हजार समस्या है। पहली तो पीयूष गोयल के पीछे सुरक्षा कर्मी दिख रहा है और इससे लगता है कि रेल अधिकारियों ने इस कथित यात्रा का प्लान बनाया होगा, उस बोगी में सीमित यात्रियों को ही सिपाहियों ने घुसने दिया होगा, तब मंत्री साहब जनरल बोगी में घुस पाए।

अगर किसी सामान्य ट्रेन में देखें तो नई दिल्ली स्टेशन पर जनरल बोगी में घुसने के लिए 400- 500 लोगों की लाइन लगती है। कुली और पुलिस वाले लाइन लगने से बचाने और सीट दिलाने के लिए पैसे लेते हैं। मंत्री जी बताएं कि उन्होंने जनरल बोगी में घुसने के लिए कितने रुपये दिए ?

जनरल बोगी में बैठने के आधे घण्टे के भीतर ट्रेन में हिजड़े पहुंचते हैं जो ताली बजाकर पैसे मांगते हैं। न देने पर गालियां देते हैं, गाल वगैरा नोचने लगते हैं, थप्पड़ तक मार देते हैं। गोयल जी बताएं कि उन्होंने थप्पड़ खाने के बाद पैसे दिए या ताली बजाने वाले स्टेप पर ही दे दिया ? यह दिल्ली से लेकर मुम्बई लोकल तक मेx हाल में मैंने देखा है।

थोड़ी रात होने पर पुलिस/ आर पी एफ के सिपाही पहुंचते हैं। वह यात्रियों से पैसे वसूलते हैं। स्वाभाविक रूप से पैसे न देने या हीलाहवाली करने वाले को मारते हैं और उसकी जेब से पैसे निकाल लेते हैं जिससे टेरर हो जाता है और यात्री खुद-ब-खुद पैसे देने लग जाते हैं। गोयल साहब के साथ कैसी गुजरी ?

कैंटीन वाले 40 रुपये दाम वाला खाना 80 रुपये में देते हैं जिसमें दो पराठे, घटिया सी दो सब्जियां, दाल और अचार का एक टुकड़ा होता है। अगर भूख लगी हो तो दो प्लेट खाने पर ही पेट भरता है। गोयल साहब को खाना कितने में मिला ? मैं तो अक्सर 80 रुपये बचाने के लिए भूखे ही रात काटता हूँ सिर्फ एक थाली खाकर। गोयल साहब ने क्या तरीका अपनाया ?

यह मेरे जैसे लाखों यात्रियों का सवाल है। इसे दुखड़ा या तकलीफ मानें ही नहीं, क्योंकि रेल यात्रियों की मजबूरी बन गई है इसे झेलना। उसे लोगों ने यात्रा लाइफ का हिस्सा बना लिया है। “कोई दिक्कत तो नहीं है” यह सब ?

(सत्येंद्र पीएस की फेसबुक टाइमलाइन से साभार)

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Lalit Surjan ललित सुरजन। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं। देशबन्धु के प्रधान संपादक

साठ साल का देशबन्धु

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