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विनायक सेन की रिहाई के लिए आंदोलन

लखनऊ दिसम्बर। पीयूसीएल
के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा विनायक सेन की रिहाई
(Release of National Vice President of
PUCL, Dr. Vinayak Sen) के लिए उत्तर प्रदेश प्रदेश के कई जिलों में आज धरना , प्रदर्शन कर विरोध जताया गया है। इलाहाबाद, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर समेत कई
जिलों में बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठनों और
छात्र-युवा संगठनों ने प्रदर्शन कर विनायक सेन की रिहाई की मांग की।

इलाहाबाद में जहां
असहमति दिवस मनाया गया तो वहीं वाराणसी में विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप
(Binayak Sen
charged with sedition) लोकतंत्र की अवमानना (Contempt of democracy) मानते हुए विरोध प्रदर्शन हुए। इस बीच
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने विनायक सेन को सजा दिए
जाने का विरोध करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा – जिस देश में तरह
तरह के अपराधी छुट्टा घूम रहे हो वहां विनायक सेन को सजा दिया जाना लोकतंत्र का
उपहास उड़ाने जैसी घटना लगती है जिसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।

इलाहाबाद के सिविल
लाइन्स, सुभाष चौराहे पर आयोजित धरने को संबोधित
करते हुए प्रसिद्ध गांधीवादी डाक्टर बनवारीलाल शर्मा ने कहा कि विनायक सेन को
आजीवन कारावास की सजा सरकार के उस व्यापक प्रचार कार्यक्रम का हिस्सा है जिसमें वह
निर्दोष विनायक सेन पर राष्ट्द्रोह के आरोप के शोर में जल-जंगल-जमीन की लूट के
मुद्दे को खामोश कर देना चाहती है। हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन ने
फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए राजनीतिक दबाव में दिया गया फैसला कहा।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका द्वारा दिया गया यह फैसला सिर्फ और सिर्फ जनतांत्रिक
आवाजों को दबाने वाला फैसला है।


डीवाइएफआई के प्रदेश
सचिव सुधीर सिंह ने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार व नागरिक
आजादी पर कुठाराघात है तो वहीं आइसा के प्रदेश सचिव रामायन राम ने कहा कि विकास के
हत्यारे माडल और दमन के खिलाफ लड़ते हुए लोकतंत्र और मानवाधिकार की जिस लड़ाई को
आगे बढ़ाया उसकी सजा विनायक सेन को दी गई है।


कवि अंशु मालवीय ने
कविता के माध्यम से कहा कि विनायक ने अलिफ के बजाय बे से शुरु किया था और सबसे
पहले जनता के अधिकारों के लिए सलवा जुडूम के खिलाफ बगावत की थी।
काशी
के बुद्धिजीवियों ने विनायक सेन की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा है कि 31 तारीख को बीएचयू गेट से लेकर चितरंजन पार्क तक एक मौन जुलूस
निकाल इस फैसले का वे विरोध करेंगे।

वाराणसी कचहरी में
धरने को संबोधित करते हुए पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहा कि
न्यायालय ने फैसले के माध्यम से तमाम जनतांत्रिक आवाजों को यह चेतावनी दी है कि
अगर राज्य के लूट तंत्र के खिलाफ वह आवाज उठाएंगे तो उनका हश्र भी यही होगा। इस
प्रतिरोध में फादर आनंद, सुनील सहस्त्रबुद्धे, बल्भाचार्य, लेनिन रघुवंशी समेत
अनेक संगठनों ने शिरकत की।

डीबेट सोसाइटी की
गुंजन सिंह ने बताया कि सभी ने एक स्वर में छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जैसे
असंवैधानिक कानूनों को रद्द करते हुए विनायक सेन को तत्काल रिहा करने की मांग की।

पत्रकार संगठन
जेयूसीएस ने भी अपील जारी करते हुए कहा कि विनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर
न्यायपालिका ने अपने गैरलोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया
है।

विनायक सेन प्रकरण के
इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढ़ांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह
न्यायपालिका की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका
हम विरोध करते हैं। आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों के उत्तपीड़न के मरकज बन गए
आजमगढ़ के लोग भी विनायक सेन पर देशद्रोह के आरोप के खिलाफ संजरपुर में सामाजिक व
मानवाधिकार संगठनों के लोगों ने बैठक कर इस मानवाधिकार विरोधी फैसले के खिलाफ
‘न्याय के सवाल पर’ राष्ट्रीय स्तर का मानवाधिकार सम्मेलन करने की घोषणा की।

मानवाधिकार नेता मसीहुद्दीन संजरी और तारिक शफीक ने कहा कि जब एक मानवाधिकार नेता का मानवाधिकार सुरक्षित नहीं रह सकता तो आम आदमी को आतंकवाद के फर्जी मुकदमों में फसाकर उसके जीवन को बर्बाद करना देना तो मामूली बात है। इसी क्रम में बलिया और गाजीपुर में बैठक कर इस फैसले का विरोध किया गया।


छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जिसके तहत विनायक सेन को देशद्रोही कहा गया वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। विनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।


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