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कोई बुआ-भतीजा-दीदी नहीं, भाजपा को रोकेगी केवल कांग्रेस ही, वरना आएगा तो मोदी ही

Lok sabha election 2019

भाजपा को सत्ता से दूर करना कांग्रेस के लिए बेहद कठिन काम Removing the BJP from power is very difficult for the Congress

एच. एल. दुसाध

H L Dusadh -एच.एल.दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय आध्यक्ष हैं.)
-एच.एल.दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय आध्यक्ष हैं.)

25 अप्रैल, 2019 सत्रहवीं लोकसभा चुनाव (Seventh Lok Sabha Elections) के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दिवसों में से एक रहा . इस दिन दोबारा पीएम बनने का आशीर्वाद लेने वाराणसी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi arrived in Varanasi) का जो सुपरहिट रोड शो हुआ, उससे अतीत के सारे रिकॉर्ड टूट गए. इस रोड शो में 4 किलोमीटर लम्बी यात्रा में उन पर 25 क्विंटल फूल बरसाए गए. रोड शो के बाद शाम को ‘मिलन’ आयोजन में मोदी ने योगी, अमित शाह इत्यादि के साथ जुटे पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा,’ यदि आप सभी आशीर्वाद और अनुमति दें तो मैं कल नामांकन कर दूं.’ अनुमति मांगने पर सभी लोगों ने खड़े होकर हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ मोदी-मोदी का नारा लगाकर अपना समर्थन जताया. इस पर मोदी ने कहा, ’अब मैं मान लेता हूँ कि आपने चुनाव संभाल लिया है, मैं आश्वस्त होकर विजय के बाद आभार जताने आऊंगा.’

वास्तव में 25 अप्रैल को मोदी के रोड शो में जो जनसैलाब उमड़ा उससे तय हो गया कि 23 मई के बाद वह काशीवासियों का आभार प्रकट करने के लिए आ सकते हैं. नामांकन के बाद अपने चुनाव प्रचार के लिए उन्हें यहाँ समय देने की कोई जरूरत नहीं, ऐसा भरोसा उनमें पनपा.

बहरहाल 25 अप्रैल को मोदी के रोड शो ने अगर भाजपा का मनोबल अचानक ऊँचा कर दिया तो उसी दिन कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की जगह 2014 में तीसरे स्थान पर रहे अजय राय को वाराणसी लोकसभा सीट से मोदी के खिलाफ उतरने की घोषणा से कांग्रेसियों के मनोबल पर विपरीत असर पड़ा.

जिस तरह वाराणसी से प्रार्थी के तौर पर प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) का नाम बार-बार उछला, उससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल लगातार ऊँचा होते जा रहा था. लोगों को भी लगने लगा था कांग्रेस मोदी को सत्ता से बहार करने के लिए अन्य दलों के मुकाबले ज्यादा गंभीर है. लेकिन अजय राय (Ajay Rai) के नाम की घोषणा के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मोदी को हारते देखने की कामना करने वाले कोटि-कोटि लोगों को आघात लगा. बहरहाल 25 अप्रैल की घटना राजनीतिक विश्लेषकों की नजर से ओझल न हो सकी, इसलिए असंख्य राजनीतिक विश्लेषकों ने इस पर टिप्पणियां की. इनमें वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता की टिप्पणी (Senior journalist Shekhar Gupta comment) बहुत खास रही.

शेखर गुप्ता ने अपने एक लेख में आंकड़ों के जरिये निर्णायक दौर में प्रवेश कर सत्रहवें लोकसभा चुनाव के परिणाम का सठीक कयास लगाने का एक ठोस आधार सुलभ कराया है. उन्होंने साबित किया है कि सिर्फ कांग्रेस ही भाजपा को सत्ता में आने रोक सकती है. उनका मानना है कि भाजपा यदि 200 सीटें जीत लेती है तो सत्ता में फिर वापसी कर लेगी. लेकिन यदि कांग्रेस 132 तक सीटें जीत लेती है, जैसा कि वरिष्ठ काग्रेसी नेता कमलनाथ ने कुछ दिन पूर्व घोषणा किया है कि पार्टी 2014 के मुकाबले तीन गुनी सीटें जीत सकती है,भाजपा की सीटों आंकड़ा उस सोचनीय बिंदु पर पहुँच जायेगा, जहाँ से उसका दुबारा सत्ता में पहुंचना बेहद कठिन हो जायेगा.

गुप्ता का दावा है कि यदि कांग्रेस 100 सीटें भी निकाल लेती है तो भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की अहम् बाधा पार कर लेगी. लेकिन यह बाधा पार करना आसान नहीं होगा, इसके लिए वह 2014 में काग्रेस द्वारा जीते गए 44 सीटों पर गौर करने को कहते हैं. 2014 उसे 44 सीटें 16 राज्यों से मिली थीं. केवल कर्नाटक में वह पूरे दहाई यानी 10 का आंकड़ा छू पाई थी. इसके बाद केरल में उसे 7 सीटें मिली थीं. बाकी 27 सीटें 14 राज्यों में फैली थीं, जिन्हें हम 1-2-3 करके गिन सकते हैं. इनमें से हरेक सीट चुनावी खेल से अलग, शुद्ध रूप से उम्मीदवार की व्यक्तिगत ताकत के बूते जीती गई थी. जिन 167 सीटों पर कांग्रेस भाजपा के बाद दूसरे नंबर पर रही थी (कुल 223 में से), उनमें से केवल 14 सीटों पर वह भाजपा को हासिल हुए कुल वोटों के 10 प्रतिशत से भी कम वोटों के अंतर से हारी थी. उलटकर देखें— 10 से 15 प्रतिशत वोटों के अंतर से हारी गई सीटें केवल 6 थीं. कोई भी समझदार चुनाव आंकड़ा विशेषज्ञ यही कहेगा कि 10 प्रतिशत के अंतर को पाटना विरोधी के पक्ष में बने जबरदस्त लहर को उलटने के समान होगा.

जहां तक बाकी सीटों की बात है, हार का अंतर 75 प्रतिशत तक चला गया है.तो पिछले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच हार-जीत का जो अंतर रहा, उसे पाटना कांग्रेस के लिए निश्चय ही बहुत बड़ी चुनौती है.

आखिर में निष्कर्ष देते हुए गुप्ता ने लिखा है-:

‘मोदी को दूसरे कार्यकाल से वंचित करने के लिए कांग्रेस को अगर 2014 के आंकड़े का तीन गुना यानी 132 सीटें जरूरी हैं, तो यह तीन महीने पहले मुमकिन दिख रहा था. लेकिन उसके बाद से काँग्रेस ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या किया है? क्या उसने प्रतिबद्धता, संकल्प, संगठन और निर्णय क्षमता दिखाई है? यहां पर मुझे 1980 की वह रात याद आती है जब हम कुछ पत्रकार हरियाणा की डबवाली में जहरीली शराब से हुई कई मौतों को कवर करके सुनसान हाइवे पर वापस लौट रहे थे. हममें से कुछ पत्रकार उस समय के विपक्ष के नेता देवीलाल की गाड़ी में उनके साथ लौट रहे थे. ड्राइवर ने कार की हेडलाइट के सामने अचानक आ गए एक खरगोश को देखकर ब्रेक लगा दिया था. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, खरगोश पहले दाएं, फिर बाएं भागा लेकिन चक्के के नीचे आ गया.

देवीलाल ने हमें एक कहानी सुनाई. उन्होंने कहा कि ऐसा ही एक बार तब हुआ था जब वे अविभाजित पंजाब के ताकतवर मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के साथ उनके राजनीतिक सहायक के तौर पर गाड़ी में जा रहे थे. कैरों ने भी कार रुकवाई थी और कहा था— चौधरी, तू देखिओ नेहरू के साथ भी ऐसा ही होगा. आपको तय करना होता है कि दाएं जाओगे या बाएं, दुविधा में जो रहा, वह गया.

कांग्रेस पर भी यही बात लागू होती है, जिसकी बागडोर आज नेहरू की तीसरी पीढ़ी के वारिसों के हाथों में है. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा से लेकर दिल्ली में ‘आप’ तक से तालमेल करने का सवाल हो, या बंगाल की ममता बनर्जी से लेकर तेलंगाना के केसीआर और उड़ीसा के नवीन पटनायक से हाथ मिलने का प्रश्न हो और किसी भी कीमत पर एक मकसद के लिए एकजुट होने का सवाल हो, कर्नाटक में अपनी फौज को जेडीएस के उम्मीदवारों से झगड़ा न करके उनका समर्थन करने के लिए अनुशासित करने की बात हो, या बनारस में मोदी के खिलाफ प्रियंका गांधी को खड़ा करने के फैसले में अंत तक रहस्य बनाए रखने का मामला हो, राहुल की कांग्रेस की क्या छवि उभरती है? कार की हेडलाइट के सामने आ गए खरगोश वाली ही तो!’

इसके कोई शक नहीं कि कांग्रेस ढाई तीन महीने पहले जिस अंदाज में मिशन-2019 की दिशा में आगे बढ़ रही थी, मोदी राज के अंत के लक्षण स्पष्ट होने लगे थे. लेकिन प्रतिबद्धता, संकल्प, संगठन और निर्णय क्षमता इत्यादि विविध कारणों से वह सम्भावना क्षीणतर हुई है. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष यह बड़ा सवाल है कि वह क्या करे, जिससे मोदी सरकार की वापसी न हो. अभी तक तीन चरणों के चुनाव हुए है. बाकी चरणों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, झारखंड, असम आदि में कुल करीब 150 सीटें ऐसी हैं, जहाँ भाजपा और काँग्रेस में सीधा मुक़ाबला होना है.

अगर कांग्रेस नेतृत्व भाजपा को रोकना चाहता है तो इन सीटों के लिए ऐसी रणनीति बनाये जिससे भाजपा कि हार सुनिश्चित कि जा सके. ऐसा करने के पहले कांग्रेस को सबसे पहले उसके शक्ति के स्रोतों और कमियों का और बारीकी से अध्ययन करना पड़ेगा.अब जहाँ तक भाजपा की शक्ति के स्रोतों का सवाल है, काग्रेस को यह बात ध्यान में रखना होगा कि जिस भाजपा के पास विश्व में सर्वाधिक,10 करोड़ से ज्यादे सदस्य हैं, उसके वर्तमान में 12 राज्यों में खुद के एवं 4 में गठबंधन के मुख्यमंत्री सरकार चला रहे हैं. केंद्र से लेकर राज्यों तक इतनी मजबूती से जिस भाजपा की सत्ता कायम है, उसका मातृ-संगठन आरएसएस ही उसकी शक्ति का प्रमुख स्रोत है. आज संघ के उसी राजनीतिक संगठन के मुखिया नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अप्रतिरोध्य बनकर उभरी है.

संघ के बाद भाजपा के दूसरे प्रमुख शक्ति के स्रोत में नजर आते हैं, वे साधु-संत जिनका चरण-रज लेकर देश के कई पीएम-सीएम और राष्ट्रपति-राज्यपाल तक खुद को धन्य महसूस करते रहे हैं.

मंडलोत्तर काल में गृह-त्यागी प्रायः 90 प्रतिशत साधु समाज का आशीर्वाद भाजपा के साथ रहा है. अगर भाजपा साधु-संतों के प्रबल समर्थन से भाजपा पुष्ट नहीं होती तो अप्रतिरोध्य बनना शायद उसके लिए दुष्कर होता. इन साधु-संतों में इतना दम है कि यदि ये चाह दें तो रातो-रात चुनाव हिन्दू-मुस्लिम पर केन्द्रित कर भाजपा के अनुकूल हालात बना दें.

भाजपा की शक्ति के स्रोत के रूप में रूप में तीसरे नंबर पर मीडिया(प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक्स) है, जो आज उसकी प्रवक्ता की भूमिका में उतर चुकी है. सिर्फ साधु-संत,लेखक-पत्रकार और पूंजीपति ही नहीं, खेल-कूद,फिल्म-टीवी जगत के प्रायः 90 सेलेब्रिटी भाजपा के साथ ही हैं. विगत कुछ दिनों में सन्नी देवल,निरहुआ, गौतम गंभीर, हंसराज हंस ,दलेर मेहंदी, सपना चौधरी इत्यादि का भाजपा से जुड़ना, यह बताता है कि देश के सेलेब्रेटीज कि पहली पसंद यही है.

भाजपा की शक्ति का एक बड़ा स्रोत सवर्ण मतदाता हैं, जो एकाधिक मतदाताओं प्रभावित करने की क्षमता रखता है. इस मतदाता वर्ग का प्रायः 90-95 प्रतिशत हिस्सा इसी के साथ है.

वास्तव में जो कांग्रेस भाजपा को सत्ता से बेदखल कर सकती है उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जो सवर्ण उसका कोर वोटर है आज वह प्रायः पूरी तरह भाजपा के पाले में चला गया. और अगर ऐसा है तो कोई विस्मय की बात नही नहीं है. कारण, मोदी राज में सवर्णों की स्थिति में आश्चर्यजनक रूप से सुधार हुआ है. आज इस वर्ग का राज-सत्ता, अर्थ-सत्ता, ज्ञान और धर्म –सत्ता पर आश्चर्यजनक रूप से 80-90 प्रतितिशत कब्ज़ा है. मंडल उत्तरकाल में जो सवर्ण आतंक के साए में जी रहे थे, वे आज हजारों साल के इतिहास में पहली बार स्वर्ण-काल का उपभोग कर रहे हैं.

मंडल उत्तरकाल में जिस तरह जाति चेतना का राजनीतिकरण हुआ है, उसमें वही नेता या पार्टी चुनाव को प्रभावित कर सकती है, जिसके पास जातियों का संख्या-बल हो. इस मामले में कांग्रेस कि स्थिति सबसे सोचनीय है, क्योंकि इस सवर्णवादी पार्टी से उसका लगभग पूरा बेस वोटर ही छिटक कर भाजपा के पाले में चला गया है. जो दलित कुछ दशक पहले आंख मूंदकर कांग्रेस को वोट करते थे, अब उनका झुकाव अपनी राष्ट्रीय पार्टी बसपा की ओर हो गया है. बचे मुसलमान तो वे कांग्रेस को तभी खुलकर वोट करते हैं जब यह भाजपा को रोकने कि स्थित में होती है है. किन्तु विगत दो तीन महीने में जो हालत बन गए है, उससे ऐसा नहीं लग पर रहा है कि यह भाजपा को सौ –डेढ़ सौ सीटों तक सीमित करने सफल होगी.

लेकिन तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद यदि नए सिरे से कांग्रेस पार्टी प्रतिबद्धता, संकल्प, संगठन और निर्णय क्षमता का परिचय दे तो भाजपा को सत्ता से दूर धकेलने का चमत्कार घटित कर, सकती है, ऐसा यकीन इस लेख की अगली कड़ी को पढ़कर जरूर पैदा हो सकता है.

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