Breaking News
Home / हस्तक्षेप / आपकी नज़र / छलावा है आरएसएस का महिला सशक्तिकरण, क्या संघ का चरित्र और प्रकृति बदल रही है?

छलावा है आरएसएस का महिला सशक्तिकरण, क्या संघ का चरित्र और प्रकृति बदल रही है?

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत (RSS chief Mohan Bhagwat) ने हाल में विदेशी समाचारपत्रों और मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ एक प्रेस वार्ता में कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 (Article 370) के हटाये जाने, असम में एनआरसी (NRC in Assam), नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill) और राममंदिर सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की. भागवत ने इन मुद्दों पर जो कुछ भी कहा, वह संघ की घोषित नीतियों के अनुरूप था. परन्तु महिलाओं के बारे में उनका एक कथन विस्मयजनक था. भागवत ने कहा कि, “महिलाओं का उत्थान किस तरह हो, यह तय करने की क्षमता पुरुषों में नहीं है. केवल महिलायें ही यह तय कर सकती हैं. अपने सम्बन्ध में निर्णय लेने में महिलाएं सक्षम हैं.”

RSS’s thinking about women

यह कथन, महिलाओं के सम्बन्ध में संघ की सोच और दृष्टिकोण के विपरीत था. संघ का राष्ट्रवाद (RSS nationalism), अति-पुरुषवादी है जो ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक मानसिकता से गहरे तक प्रभावित है और जो समाज में महिलाओं को निम्न स्थान देता है. क्या हम भूल सकते हैं कि संघ में एक भी महिला नहीं है. लक्ष्मीबाई केलकर के बहुत जोर देने पर भी संघ के संस्थापक सरसंघचालक के.बी. हेडगेवार महिलाओं को संघ में प्रवेश देने पर राजी नहीं हुए और उन्होंने केलकर को सलाह दी कि वे राष्ट्रसेविका समिति नाम से महिलाओं का एक अलग संगठन बना लें. यह संगठन, आरएसएस के अधीन काम करता है और उसकी वैचारिक प्रतिबद्धताओं का पालन करता है.

Is the character and nature of RSS changing?

फिर अचानक यह क्या हुआ? क्या संघ का चरित्र और प्रकृति बदल रही है? क्या वह समावेशी और प्रगतिशील बन रहा है? या किसी विशेष कारण से संघ प्रमुख ने विदेशी मीडिया के प्रतिनिधियों के समक्ष ऐसी बातें कहीं?

इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम संघ की मूल विचारधारा को जानें और यह समझें कि वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर संघ कोई समझौता नहीं कर सकता (क्योंकि ऐसा करने से उसके गठन का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा) और वे मुद्दे कौन से हैं जिन पर वह समझौता कर सकता है. लगभग 95 वर्ष के अपने जीवन में संघ ने अलग-अलग तरीकों से दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और श्रमिकों को अपने से जोड़ा. संघ की मूल विचारधारा में इन वर्गों और उनके हितों के लिए कोई जगह नहीं है. अपनी स्थापना से लेकर अब तक संघ ने कई वैचारिक कलाबाजियां खाईं हैं और यह जानना दिलचस्प होगा कि इस दौरान, महिलाओं के बारे में उसकी सोच वही बनी रही या उसमें कुछ परिवर्तन हुए.

संघ में महिलाओं की भूमिका और राष्ट्रवाद के लैंगिक पहलुओं पर अगणित विद्वतापूर्ण अध्ययन हुए हैं. अध्येताओं ने संघ के साहित्य, उसके चिंतकों के विचारों और उसके शीर्ष पदाधिकारियों के वक्तव्यों के आधार पर महिलाओं के सम्बन्ध में संघ की नीति का अध्ययन किया है. अतः हम यह बता सकते हैं कि संघ के अनुसार, महिलाओं की समाज और देश में क्या भूमिका होनी चाहिए.

श्रेष्ठतावादी विचारधारा से प्रेरित किसी भी अन्य संगठन की तरह, संघ एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना करता है जिसमें केवल कुछ वर्गों का वर्चस्व होगा. संघ का दावा है कि उसका फोकस केवल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर है और इसी के रास्ते वह हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है. हिन्दू राष्ट्र, मुसलमानों और अन्य हाशियाकृत समुदायों के बहिष्करण पर आधारित होगा और उसमें हिन्दू धर्म की प्रधानता और प्रभुत्व होगा. हिन्दू राष्ट्र में पुरुषों और महिलाओं की भूमिका, संघ की पुरुषत्व और नारीत्व की परिभाषा से निर्धारित होगी. यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि संघ, भारत की कल्पना एक स्त्री – भारत माता – के रूप में करता है.

संघ की मान्यता है कि महिलाएं देश के सम्मान का प्रतीक हैं और उन्हें (बलात्कार आदि से) अपवित्र करने वाले दुश्मन को नष्ट कर दिया जाना चाहिये. यह दुश्मन कोई व्यक्ति हो सकता है, कोई समुदाय या फिर कोई देश. संघ कहता है कि भारत माता को उसके आतंरिक शत्रुओं, अर्थात मुसलमानों, से खतरा है. इस खतरे के नाम पर समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया जाता है. संघ का राष्ट्र का आख्यान और परिकल्पना यह तय करती है कि राष्ट्र और समाज में महिलाओं की क्या भूमिका होगी. मूलतः, महिलाओं को पत्नी और माता के रूप में देखा जाता है और यह माना जाता है कि परिवार में उनकी प्रमुख भूमिका है.

अगर संघ यह चाहता और मानता है कि महिलाओं को घर की चहारदीवारी के भीतर रहना चाहिए तब फिर भला इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं संघ की विचारधारा की अनुयायी कैसे और क्यों हैं? राष्ट्र निर्माण की परियोजना में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने की सीमित अनुमति दी जाती है. परन्तु सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में उनका प्रवेश, पितृसत्तात्मक मूल्यों की कीमत पर नहीं वरन हिंदुत्व की विचारधारा और हिन्दू राष्ट्र की तानेबाने के भीतर रहते हुए होता है. महिलाओं की भूमिका और उनके स्थान को अपरिवर्तित रखते हुए, संघ उन्हें कुछ स्वतंत्रता देता है और यहाँ तक कि कुछ पुरुषोचित काम करने की इज़ाज़त भी (जैसे आत्मरक्षा और हथियार चलाने का प्रशिक्षण).

परिवार की परिकल्पना

संघ की दृष्टि में, परिवार समाज की मूलभूत और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है. परिवार की संस्था और उसके ढांचे को मजबूती देने के लिए संघ ‘कुटुंब प्रबोधन’ नामक एक कार्यक्रम भी चलाता है. परिवारों के खानपान और उसके सदस्यों के व्यवहार का निर्धारण करने के अलावा, संघ यह भी बताता है कि परिवार में किन विषयों पर चर्चा हो सकती है. “परिवारजन अपने पूर्वजों, देवी-देवताओं, संस्कृति, धर्म और देशभक्ति पर आपस में चर्चा कर सकते हैं”. ये वचन कुटुंब प्रबोधन परियोजना के सह-संयोजक रविन्द्र जोशी के हैं. परिवार के अन्दर भी, लैंगिक भूमिकाएं सुपरिभाषित हैं और लीक से हट कर चलने को प्रोत्साहित नहीं किया जाता. प्रत्येक महिला – चाहे वह गृहणी हो या कामकाजी – की प्राथमिक भूमिका माता की है.

राष्ट्रीय सेविका समिति की उत्तर क्षेत्र कार्यवाहिका चंद्रकांता ने समिति द्वारा आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह को मुख्य अतिथि बतौर संबोधित करते हुए कहा, “पुरुष का काम है बाहर के काम करना, धन के काम करना – पौरुष उसका गुण है. मातृत्व, स्त्रियों का गुण है. इस गुण को औरत को कभी नहीं भूलना चाहिए.” किसी भी ऐसे तर्क या मुद्दे (जैसे महिलाओं की असमानता का प्रश्न) जो परिवार की संस्था के संतुलन को बिगाड़ सकता है, से बचा जाना चाहिए. उदाहरण के लिए, समिति की महासचिव सीता अन्नदानम, हिन्दू महिलाओं को उनके परिवार की पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिए जाने के खिलाफ है. “हमारी परम्पराओं और महिला अधिकारों के बीच संतुलन होना चाहिए और यह संतुलन शास्त्रों के आधार पर बनाया जाना चाहिए. अन्यथा, हमारे परिवार टूट जाएंगें और बहनों और भाइयों के बीच जंग छिड़ जाएगी,” उन्होंने कहा.

उन्होंने आगे कहा कि पति द्वारा बलात्कार जैसी कोई चीज नहीं होती. विवाह एक पवित्र बंधन है. पति-पत्नि को एक-दूसरे के साथ रहने से परमानंद की प्राप्ति होनी चाहिए. इस परमानंद की अवधारणा समझ में आ जाने के बाद, सब कुछ एकदम ठीक ठाक चलेगा.

भागवत पहले ही यह समझा चुके हैं कि विवाह और परिवार, दोनों में महिलाएं पराधीन हैं और पति अपनी पत्नि को कभी भी त्याग सकते हैं. उनके अनुसार, “पति और पत्नि के बीच एक अनुबंध होता है जिसमें पति, पत्नि से कहता है कि तुम मेरे घर की देखभाल करो और मैं तुम्हारी सारी आवश्यकताएं पूरी करूंगा. मैं तुम्हें सुरक्षित रखूंगा. यदि पति, इस अनुबंध की शर्तों का पालन करता है तो जब तक पत्नि अपने हिस्से की शर्तों को पूरा करती है तब तक पति, पत्नि के साथ रहता है. अगर पत्नि अनुबंध का उल्लंघन करती है तो पति उसे त्याग सकता है”. अगर भागवत यह मानते हैं कि महिलाएं इतनी महत्वहीन हैं कि उन्हें उनके पति और परिवार द्वारा आसानी से त्यागा जा सकता है तब वे यह कैसे कह सकते हैं कि महिलाएं अपने निर्णय स्वयं लें.

माता के रूप में भूमिका

हिन्दू राष्ट्र और संघ, दोनों में मातृत्व की केन्द्रीय भूमिका है. संघ के लिए मातृत्व दो कारणों से महत्वपूर्ण है. पहला,माताएं हिन्दू राष्ट्र के सिपाहियों को जन्म देती हैं. दूसरे, माताएं केवल जैविक प्रजनन नहीं करतीं. वे संस्कृति का भी पुनरूत्पादन करती हैं. वे अपने बच्चों को संस्कार देती हैं, उन्हें भारत के गौरवशाली अतीत से परिचित करवाती हैं और उनमें हिन्दुत्व के प्रति गर्व का भाव जागृत करती हैं. यही कारण है कि भागवत चाहते हैं कि हिन्दू महिलाएं ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें. उन्हें डर है कि हिन्दू महिलाओं की प्रजनन दर अपेक्षाकृत कम होने से जल्दी ही भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे. उन्होंने चेतावनी दी कि “अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो 2025 तक हिन्दुओं का उनके ही देश से अस्तित्व समाप्त हो जाएगा”.

भागवत यह भी मानते हैं कि महिलाओं की मां के तौर पर केन्द्रीय भूमिका है. उनकी मान्यता है कि महिलाएं अपने बच्चों को संस्कार देती हैं और इस प्रकार समाज व देश को मजबूत बनाती हैं, “हमारी कुटुम्ब व्यवस्था ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है,” उन्होंने कहा।

सतीत्व

जिन अन्य गुणों को संघ महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण मानता है वे हैं सतीत्व और सम्मान. महिलाएं समाज के सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतिनिधित्व करती हैं. महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसा कोई रिश्ता न बनाएं जिससे समुदाय की ‘बदनामी’ हो. अर्थात महिलाओं के शरीर पर भी परिवार और समुदाय का नियंत्रण है. इसी मानसिकता के चलते संघ अंतर्धार्मिक विवाहों की खिलाफत करता आ रहा है. लव जेहाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर वह महिलाओं के अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकार को उनसे छीन लेना चाहता है. हाल में भागवत ने एक चिंतित पिता के अंदाज में हिन्दुओं को चेतावनी देते हुए कहा कि “आने वाली पीढ़ियों की लड़कियों को लव जिहाद के अर्थ से परिचित करवाया जाना चाहिए और उन्हें इस जाल से बचने के तरीके समझाए जाने चाहिए”.

एक अन्य अवसर पर भागवत यौन हिंसा के लिए “पश्चिमी संस्कृति’ को दोषी ठहराते हैं और उन मूल्यों की प्रशंसा करते हैं जिनका ‘भारत’ में आचरण होता आया है. “जब भारत पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में इंडिया बन जाता है तब इस तरह की घटनाएं होती हैं. समाज के हर स्तर पर सच्चे भारतीय मूल्यों और संस्कृति को स्थापित किया जाना चाहिए – उस संस्कृति को जो महिलाओं को माता मानती है,” उन्होंने कहा. भागवत, भारत में बढ़ते बलात्कारों के कारणों का विश्लेषण कर रहे थे.

निष्कर्ष

आरएसएस अस्तित्व में ही इसलिए आया है ताकि वह हिन्दू राष्ट्र स्थापित कर सके. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ आदर्शों और मूल्यों के साथ संघ कोई समझौता नहीं कर सकता. हिन्दू राष्ट्र में महिलाओं को पराधीन रहना ही होगा. संघ, महिलाओं को देवी कहता है और भारत माता का वंदन करता है परंतु ये एक मुखौटा मात्र हैं. इन खोखले शब्दों से महिलाओें का सशक्तिकरण नहीं होगा. उलटे, ये पितृसत्तामकता और पितृसत्तात्मक ढ़ांचे को और मजबूत करते हैं. भागवत ने विदेशी मीडिया के सामने जो कुछ कहा, उसका एकमात्र उद्देश्य दुनिया को यह बताने का प्रयास करना था कि संघ बदल रहा है और महिलाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर उदारवादी बन रहा है. विदेशी मीडिया के प्रतिनिधियों से भागवत की यह बातचीत पिछले वर्ष संघ प्रमुख द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ द्वारा आयोजित “भविष्य का भारतः आरएसएस के परिपेक्ष्य में” विषय पर आयोजित तीन-दिवसीय सम्मेलन की अगली कड़ी थी. सम्मेलन और हालिया बातचीत दोनों का उद्देश्य संघ की छवि को एक नए कलेवर में प्रस्तुत करना था. यह बताना था कि संघ बदल रहा है और वह समावेशी और एकताबद्ध भारत का हिमायती है. भागवत ने कुछ ऐसी बातें कहीं जो संघ की घोषित नीतियों और कार्यक्रमों से मेल नहीं खातीं. संघ का एक उद्देश्य भारत में मची उथलपुथल से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान हटाना भी हो सकता है. भारत में असम में 19 लाख नागरिकों को राज्य-विहीन घोषित कर दिया गया है और कश्मीर में दो महीने से भी अधिक समय से अघोषित कर्फ्यू लागू है।

नेहा दाभाडे

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

 

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल (First Home Minister of India, Sardar Vallabhbhai Patel)

पकड़ा गया सरदार पटेल पर संघ-मोदी का झूठ

आखिर, किस मुंह से संघ-मोदी कहते हैं कि सरदार पटेल उनके थे; इस बात का …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: