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Satta Ki Suli सत्ता की सूली, लोया की गाटेगांव यात्रा

लोया की गाटेगांव यात्रा

महाराष्ट्र का लातूर एक विनाशकारी भूकंप के लिए जाना जाता है। 30 सितंबर,1993 कीउस तबाही को याद कर लोगों की आज भी रूह कांप जाती है। जज लोया 30 हजार जिंदगियों के लिए कब्र बन चुके इसी लातूर से तालुक रखते थे। उनका गांव गाटेगांव लातूर से तकरीबन 20 किमी दूर है। उस साल 23 अक्तूबर 2014 को दिवाली पड़ी। लोया अपने गांव से बहुत प्यार करते थे। इन परेशानियों से दूर जाने के लिए उन्हें यह एक अच्छे मौके की तरह दिखा। लिहाजा, उन्होंने दिवाली पर घर जाने का फैसला लिया। लेकिन मुंबई से गांव के लिए निकलते लोया के दिलो-दिमाग में जजमेंट ड्राफ्ट की हलचल किसी भूकंप से कम नहीं था। यह किसी भी समय फट सकता था। दो दशक पहले आए भूकंप से तो लातूर के लोग संभल गए थे। लेकिन, लोया के दिमाग में चल रहे भूकंप का क्या नतीजा होगा। उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल था। मन में जारी उथल-पुथल के साथ लोया पैतृक घर गाटेगांव पहुंचे। लातूर आकर उन्होंने वकालत के दिनों के अपने दोस्तों से मिलने की योजना बनाई। इसी कड़ी में उनकी मुलाकात एडवोकेट उदय गवारे से हुई। गवारे जज लोया के सहपाठी होने के साथ ही घनिष्ठ और पारिवारिक मित्र भी थे। दोनों परिवारों का एक दूसरे के घर आना-जाना और हर सुख-दुख में साथ खड़े होने का रिश्ता था। उदय की शादी में भी लोया शरीक हुए थे।

बात चलने पर उदय गवारे को लोया के साथ गुजारे अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं। कारवां के साथ उन्होंने विस्तार से इसे साझा किया। उन्होंने बताया

‘‘मैं और बृज ने एक साथ ही दयानंद लॉ महाविद्यालय में एलएलबी की पढ़ाई की थी। पढ़ाई पूरी होने के बाद हम दोनों ने लातूर जिला अदालत में करीब सात-आठ वर्षों तक साथ-साथ वकालत की। इसके बाद बृज का चयन जुडिशियरी में हो गया।जुडिशियरी में जाने के बाद भी बृज जब लातूर या अपने पैतृक घर गाटेगांव आता था, तो मुझसे जरूर मिलता था।” (1 दिसंबर, 2017 कारवां, पोर्टल)

दिवाली के दौरान लोया के अपने पैतृक गांव के दौरे की याद भी ताजी है। और इस मुलाकात में उनके साथ हुई बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी परेशानियों को उनके साथ साझा किया था। उदय ने बताया कि,

“दिवाली की छुट्टियों में बृज से मेरी मुलाकात हुई। घर-परिवार और कामकाज की बात हुई। लेकिन उस समय बृज काफी तनाव में लग रहे थे। तनाव का कारण पूछने पर कहा कि बहुत हाई प्रोफाइल केस को हैंडल कर रहा हूं। चारों तरफ से दबाव पड़ रहा है। राजनीतिक दबाव के साथ ही मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मोहित शाह भी दबाव डाल रहे हैं।”

उदय इस पूरे मामले में बांबे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस मोहित शाह की भूमिका को बेहद अहम बताते हैं। उनकी मानें तो एक तरह से वह सूत्रधार की भूमिका में थे। उदय के मुताबिक,

“बृज ने उनसे बताया था कि अवकाश के दिनों या अदालत समाप्त होने पर जस्टिस मोहित शाह उनसे मिलने का बहाना ढूंढते रहते थे। कभी वह चाय पर आमंत्रित करते थे, तो कभी बात करने के लिए वह लोया के पास आ जाते थे। हर मुलाकात में जस्टिस शाह जज लोया पर सोहराबुद्दीन शेख केस को रफा-दफा करने का दबाव बनाते थे।”

ऐसा नहीं है कि जज लोया ने अपनी परेशानियां केवल दोस्तों के साथ ही साझा की थी, बल्कि इस दौरे में उन्होंने परिजनों को भी पूरे वाकये की जानकारी दी थी। उन्हें रिश्वत की पेशकश से लेकर मामले को लेकर अपने ऊपर पड़ने वाले दबाव के बारे में विस्तार से बताया था। इस बात को तस्दीक करते हुए लोया के पिता हरकिशन लोया ने बताया,

‘‘दिवाली की छुट्टी में जब बृज मुंबई से लातूर आया, तो गांव भी आया था। एक रात को जब सब लोग बैठकर खाना खा रहे थे, तो बृज ने अपनी परेशानी हम सबके सामने रखी। कहा कि ऊपर से बहुत दबाव पड़ रहा है। किसी भी हालत में केस को रफा-दफा करने को कहा जा रहा है।

सोहराबुद्दीन शेख केस में मनमुताबिक फैसला सुनाने के लिए जस्टिस मोहित शाह ने 100 करोड़ रुपये और मुंबई में एक प्लाट या मकान का ऑफर दिया है। बृज जिस समय यह बता रहा था, उस समय परिवार के अधिकांश सदस्य मौजूद थे। लेकिन वह किसी अन्यायपूर्ण और आपराधिक समझौते में जाने के लिए तैयार नहीं था।”

रिश्वत की पेशकश की पुष्टि जस्टिस कोलसे पाटिल ने भी की। उन्होंने बताया,

“मुझे भी यह जानकारी मिली थी कि जज लोया को इस मामले में सरकार के पक्ष में फैसला देने के लिए 100 करोड़ रुपये ऑफर किए गए थे”।

जज लोया अपनी ईमानदारी को लेकर कितने प्रतिबद्ध और निडर थे, इसका अंदाजा एक दूसरी बात से भी लगाया जा सकता है। उन्होंने किसी भी तरह से समझौते में नहीं जाने और जरूरत पड़ने पर इस्तीफा देकर गांव में खेती करने तक का मन ही मन फैसला ले लिया था। इस बात को उन्होंने छुपाया भी नहीं था।

उदय गवारे ने बताया,

“जज लोया ने मुझसे कहा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा, गांव वापस आकर खेती कर जीवन गुजार लूंगा। लेकिन मैं गलत जजमेंट नहीं दूंगा।”

लोया किसी भी रूप में समझौते के मूड में नहीं थे। लातूर मेंदिवाली की छुट्टियां बिता कर वापस लौटने पर वह सोहराबुद्दीन केस की और गहराई से छानबीन करने और अध्ययन में जुट गए।

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