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तो स्वार्थ सिद्धि कर रहा है मोदी विरोधी मीडिया भी

17वीं लोकसभा के चुनाव प्रचार (17th Lok Sabha election campaign) ने जोर पकड़ लिया है। मोदी के पांच साल के शासन (Modi’s five year rule) में संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं खतरे में (Constitution and democratic institutions in danger) पड़ गए हैं। इतना ही नहीं सामाजिक ताना-बाना भी बिखर रहा है। आर एस एस और भाजपा (RSS and BJP) द्वारा बाकायदा मुहिम चला कर देश के अल्पसंख्यकों को डराया और अपमानित किया जा रहा है। मोदी सरकार बनते ही आरएसएस और सांप्रदायिक सोच (Communal thinking) के लोगों ने अपने एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया था। देश में मॉब लिंचिंग (Mob lynching) की कई घटनाएं हुईं। गोरक्षा के नाम पर हत्याएं हुईं। सरकार और सांप्रदायिक तत्वों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले कई लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी गई। यह माना जाता है कि जब देश पर गंभीर संकट होता है तो विपक्ष के साथ बुद्धिजीवी और मीडिया मिलकर उस सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं। उससे देश की साधारण जनता जागरूक होती है। लेकिन विपक्ष बिखरा हुआ है, बुद्धिजीवी गंभीर नहीं हैं और मीडिया बिका हुआ है। अपने को मोदी-विरोधी कहने वाला मीडिया भी ऐसा लगता है स्वार्थ सिद्धि में लगा हुआ है।

सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने कोई बड़ी मुहिम मोदी सरकार के खिलाफ नहीं चलाई। केजरीवाल ने तो यहाँ तक कह दिया कि मोदी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दे दें तो वे लोकसभा चुनाव में मोदी का प्रचार करेंगे। कम्युनिस्ट केजरीवाल के साथ हैं। सामाजिक न्याय का दावा करने वाली पार्टियां भी सत्ता पर अपने परिवार का कब्ज़ा जमाए रखने की मुहिम में जुटी रहीं। इसका कारण है ये सभी पार्टियां और बुद्धिजीवी अपनी सत्ता की खिचड़ी नवउदारवाद की हांडी में पकाना चाहती हैं। संविधान की बात वे दिखावे के लिए करते हैं।

पूरे देश में केवल सोशलिस्ट पार्टी ने मोदी शासन की अराजकता का निर्णायक विरोध किया इसमें दो राय नहीं कि सोशलिस्ट पार्टी को छोड़ कर पार्टी स्तर पर मोदी शासन की अराजकता का निर्णायक विरोध किसी पार्टी ने नहीं किया। क्योंकि वह विचारधारा के स्तर पर संविधान और समाजवाद की सच्ची समर्थक पार्टी है। नवउदारवादी नीतियों का पूर्ण रूप से विरोध करने वाली वह अकेली पार्टी है। समय-समय पर जारी सोशलिस्ट पार्टी के दस्तावेज और पूरे देश में चलने वाले कार्यक्रम इसका सबूत हैं। लेकिन कभी कभार हिंदी के कुछ अखबारों को छोड़ कर मुख्यधारा मीडिया सोशलिस्ट पार्टी के विचारों और गतिविधियों को कवर नहीं करते। अपने को मोदी-विरोधी बताने वाला मीडिया भी सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से आँख बंद किये रहता है।

सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष डॉ. प्रेम सिंह सरकार ने मॉब लिंचिंग के खिलाफ एक सप्ताह का  उपवास किया। जस्टिस राजेन्द्र सच्चर के आग्रह के बावजूद उन्होंने अपना उपवास नहीं तोड़ा। सोशलिस्ट पार्टी ने भारत छोड़ो दिवस 9 अगस्त को दिल्ली में मंडी हाउस से लेकर जंतर मंतर तक रैलियाँ निकालीं. जिनमें ‘संविधान विरोधी तत्व सत्ता छोड़ो’ और ‘शिक्षा और रोजगार दो वर्ना गद्दी छोड़ दो’ रैलियों में मैं शामिल था। दोनों रैलियाँ जबरदस्त थीं। शिक्षा के निजीकरण और भगवाकरण के खिलाफ यह पार्टी लगातार काम करती है। रेलवे के निजीकरण के विरोध में केवल सोशलिस्ट पार्टी ने दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में धरना-प्रदर्शन किया, ज्ञापन दिए। यह पार्टी हर साल 10 मई को 1857 के क्रांतिकारियों की याद में ‘कूचे-आज़ादी’ का आयोजन करती है। जहां दूसरे राजनीतिक दलों ने क्रांतिकारियों के बलिदान को भुला दिया है वहीं सोशलिस्ट पार्टी ने 1857  के स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए क्रांतिकारियों की याद में पिछले साल मेरठ से लेकर लालकिले तक यात्रा निकाली। यह पार्टी अपनी स्थापना के समय से हर साल राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर बहादुरशाह ज़फर के अवशेष रंगून से भारत लाने की मांग करती है। इस बारे में पार्टी के फॉउंडर सदस्य राजेन्द्र सच्चर और कुलदीप नैयर खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिले थे। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद सबसे पहले पहुंचकर पीड़ितों को ढांढस बंधाया। जब भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण की गिरफ्तारी हुई तो राजेन्द्र सच्चर ने उनकी पैरवी की पेशकश की। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के 10 साल होने पर केवल सोशलिस्ट पार्टी ने ही राष्ट्रीय संवाद का आवोजन किया। मतलब आज की तारीख में सोशलिस्ट पार्टी ही कारपोरेट पूंजीवाद का विकल्प समाजवादी विचारधारा को मान कर चलने वाली पार्टी है। बाकी सब पूंजीवाद की वकालत या मिलावट करने वाली पार्टियां हैं। लेकिन कोई अखबार या चैनल सोशलिस्ट पार्टी की गतिविधियों को कवर नहीं करता। पार्टी के अध्यक्ष डॉ. प्रेम सिंह का लेखन हम सबके सामने लगातार रहता ही है। प्रेम सिंह नवसाम्राज्यवादी शिकंजे की रग-रग के जानकार जनता के  बुद्धिजीवी हैं। मैंने कभी उन्हें किसी टीवी वार्ता में नहीं देखा। मुझे नहीं पता कि वे टीवी चेनलों पर खुद नहीं जाते या उन्हें बुलाया ही नहीं जाता?

ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि गोदी मीडिया तो सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों को तवज्जो नहीं देगा पर मोदी विरोधी मीडिया क्यों नहीं देता है? इसका कारण मेरे जैसे कार्यकर्ता और पत्रकार को यही लगता कि बड़ी पूँजी वाले मोदी-विरोधी मीडिया के भी अपने स्वार्थ हैं? कारपोरेट-कमुनल गठजोड़ की जगह समाजवाद की स्थापना करना उनका उद्देश्य नहीं है। मतलब देश और समाज पर जो संकट उससे उसका लेना देना नहीं है।

मैंने कई बार मुस्लिम नेताओं को कहते सुना है कि जस्टिस राजेन्द्र सच्चर उनके लिए पैगम्बर साहब के बाद सबसे ज्यादा मान्य हैं। लेकिन मैंने कभी उन्हें सच्चर साहब की पार्टी को  समर्थन देते नहीं देखा? यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि सोशल एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक देश से विचार की राजनीति खत्म होने की बात करते हैं। चुनाव के समय लोगों को भी यह कहते सुना जा सकता है कि सभी दल लूटखसोट तक सिमट कर रह गए हैं।  मोदी सरकार बनने के बाद मीडिया पर सरकार की चाटूकारिता का आरोप सबसे ज्यादा लगा है। खुद मीडिया से जुड़े लोगों ने ये आरोप बड़ी स्पष्टता के साथ लगाए हैं। विपक्ष से लेकर मीडिया का एक तबका मोदी सरकार पर मॉब लिंचिंग, संविधान और लोकतंत्र को खत्म करने का आरोप लगातार लगाता रहा है। देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को तहस नहस करने की बात की जा रही है।

मेरा अब तक का जो अध्ययन और अनुभव है उसके आधार पर कह सकता हूं कि हमारा संविधान और लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता पर निर्भर है और समाजवाद पर। यही वजह है कि मैं संविधान पर इतना जोर देता हूं।

चरण सिंह राजपूत, 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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