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तो क्या लड़ना भूल गयी है कांग्रेस ? विपक्ष की भूमिका में भाजपा कल भी सर्वश्रेष्ठ थी और आज भी है

बीते पांच साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस लगता है जनता की लड़ाई लड़ना ही भूल गयी है। कांग्रेस का मौथरापन ही उसके लिए घातक साबित हो रहा है। कांग्रेस से ठीक उलट पांच साल से केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा ने अपनी धार उतरने नहीं दी है और जहां भी देश में गैर कांग्रेसी सरकारें हैं वहां अपना जनसंघर्ष जारी रखा है। जनसंघर्ष सियासी दलों की पहली जरूरत मानी जाती है।

कांग्रेस ने छह माह पूर्व जब तीन राज्यों में भाजपा की पुरानी सरकारों को उखाड़ फेंका था, तब लगा था कि कांग्रेस पुनर्जीवित हो रही है लेकिन ये कोरा भ्रम था। लोकसभा चुनाव में भाजपा की आक्रामक रणनीति के सामने कांग्रेस एक बार फिर चारों खाने चित हो गयी।

कांग्रेस 2019 के जनादेश के बाद अभी तक सन्निपात में है, जबकि भाजपा ने उन राज्यों में अपना संघर्ष तेज कर दिया है जहां उसे लोकसभा पराजय में अपेक्षित सफलता मिली थी। बंगाल और मध्यप्रदेश में भाजपा की धार जनांदोलनों की शक्ल में देखी जा सकती है।

एक चुनाव हारने के बाद दूसरे की तैयारी में जुटना कोई भाजपा से सीख सकता है, कांग्रेस से नहीं।

भाजपा बंगाल विधान सभा चुनावों से पहले ही ममता बनर्जी की सरकार गिराने के लिए संघर्षरत है। भाजपा का संघर्ष पोस्टकार्डों से लेकर सड़कों और रेल पटरियों तक पर दिखाई दे रहा है, लेकिन कांग्रेस जहां हारी और जहां जीती वहां भी सक्रिय नजर नहीं आ रही है।

कांग्रेस के लिए भाजपा शासित राज्यों में काम करने के लिए मैदान खुला पड़ा है लेकिन कांग्रेस तो जैसे जन संघर्ष करना भूल ही चुकी है। वो किसी सरकार को उखाड़ फेंकना तो दूर उसे लंगड़ा करने की स्थिति में भी नहीं है।

एक ज़माने में जहां-जहाँ कांग्रेस का वजूद था वहां-वहां आज दूसरे दल हैं, लेकिन कांग्रेस न अपनी प्राथमिकताएं तय कर पा रही है और न अपने होने का अहसास ही करा पा रही है। एक छत्तीसगढ़ को छोड़ कांग्रेस की सरकार के होने का अहसास कहीं और हो ही नहीं रहा है।

मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस सत्तारूढ़ होते हुए भी न चलती नजर आ रही है और न विपक्ष का मुकाबला करते दिखाई दे रही है। उलटे इन राज्यों में भाजपा ने अपनी जमावट शुरू कर दी है।

कांग्रेस का नेतृत्व आज भी ये स्वीकार करने को राजी नहीं है कि जनसंघर्ष के बिना मैदान में नहीं टिका जा सकता।

लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के पास प्रियंका गांधी एक ट्रम्प कार्ड थीं, लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में वो भी नहीं चल पाया। अब सवाल ये है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में राज्यों में कोई आंधी खड़ी कर सकती है ?

कांग्रेस के पास दोबारा खड़े होने के लिए पांच साल हैं लेकिन इसका अभ्यास उसे आज से ही करना चाहिए, किन्तु ऐसा हो नहीं पा रहा।  रोज नए मुद्दे सामने आने लगे हैं, लेकिन कांग्रेस किसी एक को भी स्पर्श नहीं कर पा रही है। उसे शायद नहीं पता कि अपने पैरों पर खड़े होने के लिए संसद ठप्प करने से ज्यादा सड़कों पर अपना वजूद दिखाना अहम होता है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब देश की सबसे नयी और सीमित क्षेत्र की पार्टियों के सामने हल्की पड़ती दिखाई दे रही है।

कांग्रेस में जो धार श्रीमती इंदिरा गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी के जमाने में थी, वो अब नदारद है। राहुल गांधी कांग्रेस को जितना आगे ले जाते हैं, कांग्रेस उतनी पीछे हो जाती है। ऐसे में अब एक ही विकल्प है कि कांग्रेस अपनी हार का रंज मनाने के बजाय जनसंघर्ष में जुट जाये। कांग्रेस के जितने भी दिग्गज लोकसभा चुनाव में हारे हैं उन सबको मैदान में उतार दे। देश का उत्तर प्रदेश जैसा राज्य इस जनसंघर्ष का पहला मैदान हो सकता है।

सच मानिये कि एक मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का आनंद ही नहीं आता। विपक्ष की भूमिका में भाजपा कल भी सर्वश्रेष्ठ थी और आज भी है। नजरिया आपका भिन्न हो सकता है लेकिन हकीकत तो हकीकत है।

राकेश अचल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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