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Mohan Rakesh

कहानी को अस्मिता की राजनीति से सबसे पहले मोहन राकेश ने जोड़ा

आज मोहन राकेश के जन्मदिन पर विशेष Special on the birthday of Mohan Rakesh

जगदीश्वर चतुर्वेदी

आज मोहन राकेश का जन्मदिन (Mohan Rakesh’s Birthday) है। सन् 1925 में आज के ही दिन उनका जन्म हुआ था। मोहन राकेश के पिता वकील थे और साथ ही साहित्य और संगीत के प्रेमी (Lover of literature and music) भी थे। पिता की साहित्यिक रुचि का प्रभाव मोहन राकेश पर भी पड़ा। उन्होंने पहले लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज‘ (Lahore’s ‘Oriental College’) से ‘शास्त्री’ की परीक्षा पास की, फिर हिन्दी और अंग्रेज़ी विषयों में एम.ए. किया। उसके बाद अनेक वर्षों तक दिल्ली, जालंधर, शिमला और मुम्बई में अध्यापन कार्य करते रहे। मोहन राकेश पहले कहानी विधा (story mode) के ज़रिये हिन्दी में आए। उनकी ‘मिस पाल’, ‘आद्रा’, ‘ग्लासटैंक’, ‘जानवर’ और ‘मलबे का मालिक’, आदि कहानियों ने हिन्दी कहानी का परिदृश्य ही बदल दिया। वे नयी कहानी आन्दोलन (Nai Kahani literary movement of the Hindi literature) के शीर्ष कथाकार के रूप में चर्चित हुए। उन्होंने अनेक उपन्यास और नाटक भी लिखे। उनकी कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं। उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के उस्ताद थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक में उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा (Pain of India-partition) बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है। कहानी के बाद राकेश को सफलता नाट्य-लेखन के क्षेत्र में मिली है। एक वर्ष तक उन्होंने ‘सारिका’ पत्रिका का सम्पादन किया।

उनके विचारों में अनेक ऐसी बातें हैं जो हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं। कहानी को अस्मिता की राजनीति (politics of identity) से सबसे पहले मोहन राकेश ने जोडा।

उनका मानना है,

“आज की कहानी कल की कहानी से बदल गयी है, इसमें सन्देह नहीं। यह परिवर्तन कहानी लिखने के ढंग में उतना नहीं है, जितना कहानी की वस्तु में और कहानी के दृष्टि-बिन्दु में। कभी कहानीकार को अद्भुत और मनोरंजक की खोज रहती थी। परन्तु आज प्रश्न खोज का नहीं, पहचान का है—जीवन की ठोस वास्तविकताओं की पहचान का। ”

मोहन राकेश ने बड़ी महत्वपूर्ण बात कही है-

“साहित्यकार अपनी वैयक्तिक कुंठाओं के कारण जब अपनी रचना से जनहृदय में स्पन्दन नहीं भर पाता तो वह अपनी असमर्थता को ढाँपने के लिए एक दर्शन की सृष्टि करता है। जिस रचना में अपने पैरों खड़े होने की सामर्थ्य नहीं होती, उसे आलोचना की छड़ी के सहारे खड़ा करने का प्रयत्न किया जाने लगता है।”

मोहन राकेश का मानना था-

“समकालीन आलोचना का अध्ययन करने पर नई कहानी तो क्या कहानी के अस्तित्व में ही सन्देह होता है। जैसाकि नामवर सिंह के ‘कहानी’ के विशेषांक में प्रकाशित लेख से स्पष्ट है, कहानी के सम्बन्ध में समकालीन हिन्दी आलोचक की उदासीनता या उखड़ी-उखड़ी-सी जानकारी कहानी की सीमाओं को नहीं, आलोचक की सीमाओं को ही व्यक्त करती है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में साहित्य की इस विधा के अन्तर्गत जितने प्रयोग हुए हैं, उन सबसे परिचित रह सकना और अपेक्षित विचारान्विति में उनकी परीक्षा कर सकना आज के आलोचक को दुस्तर-सा कार्य प्रतीत हुआ है। यह एक बहुत बड़ी ट्रेजेडी है कि सामान्य पाठक की दृष्टि से साहित्य की जो विधा सबसे महत्त्वपूर्ण है और उसके मानसिक धरातल के निर्माण में जिसका सबसे बड़ा हाथ है, उसी को लेकर हमारी आलोचना-दृष्टि स्पष्ट नहीं है। इतना आश्वासन फिर भी है कि लेखक और पाठक के बीच एक सम्बन्ध-सूत्र बना हुआ है, जिससे लेखक चाहे तो अपनी कुशाग्रता से अपने लिए निर्देश प्राप्त कर सकता है।”

यांत्रिक आलोचकों में परिभाषाओं और अवधारणा के प्रबंधों में बोलने की परंपरा रही है। इस तरह के नजरिए की आलोचना करते हुए लिखा,

“दिन-भर परिभाषाएँ घड़ते रहे। साहित्य की, जीवन की, मनुष्य की। बे-सिर-पैर। सभी पढ़ी-सुनी परिभाषाओं की तरह अधूरी और स्मार्ट। दूसरों ने जितनी स्मार्टिंग की कोशिश की, उससे ज़्यादा खुद की। जैसे परिभाषा नहीं दे रहे थे, कुश्ती लड़ रहे थे। महत्त्व सिर्फ़ इस बात का था कि दूसरे को कैसे पटखनी दी जाती है। या फिर पटखनी खाकर भी कैसे बेहयाई से उठ खड़े होते हैं।”

मोहन राकेश का यह भी मानना है कि

“किसी भी अपरिचित व्यक्ति से, चाहे उसकी भाषा, उसका मज़हब, उसका राजनीतिक विश्वास तुमसे कितना ही भिन्न हो, यदि मुस्कराकर मिला जाए तो जो तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाता है, वह कोरा मनुष्य होता है : कुछ ऐसी ही मुस्कराहट की प्रतिक्रिया नाना व्यक्तियों पर मैंने लक्षित की है। यह ठीक है कि बाद में भाषा, मज़हब और विश्वास के दाग़ उभर आते हैं, परन्तु वे सब फिर उस वास्तविक रूप को छिपा नहीं पाते, और मनुष्य की मनुष्य से पहचान बनी रहती है। मुझे याद आता है कि डेल कार्नेगी की पुस्तक ‘हाउ टु विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल’ में एक जगह उसने लिखा है कि ‘‘जब अपरिचित व्यक्तियों से मिलो, तो उनकी ओर मुस्कराओ।’’ यद्यपि लेखक एक मनोवैज्ञानिक सत्य का उद्घाटन करने में सफल हुआ है, फिर भी मनुष्यता के इस गुण का व्यापारिकता, और परोक्ष लाभ की कूटनीति से सम्बन्ध जोडक़र उसने एक अबोध सत्कौमार्य को कटे-फटे हाथों से ग्रहण करने की चेष्टा की है। वह मुस्कराहट जो तहों में छिपे हुए मनुष्यत्व को निखारकर बाहर ले आती है, यदि सोद्देश्य हो तो, वह उसके सौन्दर्य की वेश्यावृत्ति है।”

मोहन राकेश ने लिखा है-

“बहुत उलझन होती है अपने से। सामने के आदमी का कुछ ऐसा नक्शा उतरता है दिमाग़ में कि दिमाग़ बिल्कुल उसी जैसा हो जाता है। दूसरा शराफत से बात करे, तो बहुत शरीफ़। बदमाशी से बात करे, तो बहुत बदमाश। हँसनेवाले के सामने हँसोड़। नकचढ़े के सामने नकचढ़ा। जैसे अपना तो कोई व्यक्तित्व ही नहीं। जैसे मैं आदमी नहीं, एक लेंस हूँ जिसमें सिर्फ़ दूसरों की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। कभी जब तीन-चार आदमी सामने होते हैं, तो डबल-ट्रिपल एक्सपोज़र होता है। अपनी हालत अच्छे-खासे मोंताज की हो जाती है।”

मोहन राकेश की मुख्य रचनाएँ इस प्रकार हैं-

उपन्यास

अंधेरे बंद कमरे, अन्तराल, न आने वाला कल।

नाटक

अषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे अधूरे।

कहानी संग्रह

क्वार्टर तथा अन्य कहानियाँ, पहचान तथा अन्य कहानियाँ, वारिस तथा अन्य कहानियाँ।

निबंध संग्रह

परिवेश, एकत्र – असंकलित तथा अप्रकाशित रचनाएं, बकलम, खुद, आखिरी चट्टान तक (यात्रा-वृत्त) तथा डायरी।

अनुवाद

इसके अतिरिक्त उन्होंने कुछ संस्कृत नाटकों और विदेशी उपन्यासों का अनुवाद भी किया। मृच्छकटिकम, शाकुंतलम ।

सम्मान

1968 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।

निधन

3 जनवरी 1972 को नयी दिल्ली में आकस्मिक असमय निधन हो गया।

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