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‘‘न्यू इंडिया’’- 5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था : ये सुहाने जुमले हैं, जुमलों का क्या!

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

  वास्तव में, मोदी-1 के पांच साल में जो हुआ है उसे अगर संकेत मानें तो ‘‘न्यू इंडिया’’ में भी चमकी की मौतें हमारे साथ होंगी बल्कि और ज्यादा होंगी।

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जनता के पास विकल्प ही क्या है ?

Between protest Modi assures Citizenship Bill will not harm Assam and Northeast

बदलाव के नाम पर 1967 से यह सिलसिला लगातार जारी है और लगातार जनपदों, किसानों, कामगारों, आम लोगों के खिलाफ हमले तेज होते गये हैं और दिल्ली की सत्ता निरंकुश होकर जनपदों को कुचलती रही है।

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2019 चुनावी परिदृश्य पर एक शुद्ध दार्शनिक चर्चा : मोदी की बुरी हार सुनिश्चित है

Why Modi Matters to Indias Divider in Chief

इस बार के चुनाव का सत्य पूरी तरह से मोदी विरुद्ध खड़ा है। उनकी पराजय का स्वरूप कितना बड़ा और गहरा होगा, इसका चुनाव परिणाम के पहले कोई सटीक अनुमान नहीं लगा सकता है। लेकिन उनकी बुरी हार सुनिश्चित है।

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2014 से 2019 का फरक सबको दिखने लगा, व्हाई मोदी मैटर्स से “इंडिया’स डिवाइडर इन चीफ“ तक का सफर

Why Modi Matters to Indias Divider in Chief

Why Modi Matters to "India's Divider in Chief" : धर्म-जाति-भाषा और साम्प्रदायिकता फैलाकर मोदी देश को बांटना चाहते हैं

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मोदी के कुतर्कों को जनता समझ रही है और खुद मोदी जी भी समझ रहे हैं तभी उनकी भाषा स्तरहीन हो चुकी है

Rajiv Gandhi Narendra Modi

नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और उनके सलाहकार अगर नेहरू और राजीव गाँधी के विरुद्ध चुनाव लड़ रहे हैं तो कांग्रेस के नेताओं ने भी कोई कमी नहीं की कि विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) को राजीव गाँधी की हत्या (Rajiv Gandhi’s assassination) के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए. विश्वनाथ प्रताप …

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लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की अपील – मोदी को हराने के लिए वोट दें

Modi go back

लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की अपील - मोदी को हराने के लिए वोट दें

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सुबह-सुबह राहुल का मोदी पर हमला, पीएम ने अर्थव्यवस्था नष्ट कर दी, चौकीदार चोर है, सच्चाई है

Rahul Gandhis press conference

कांग्रेस की न्याय योजना नोटबंदी का जवाब है। मोदी ने नोटबंदी में पैसे लिए थे हम न्याय से पैसे देंगे। चौकीदार चोर है, सच्चाई है…

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महाराष्ट्र : तीसरे चरण में 14 सीटों पर मुश्किल में मोदी की भाजपा

bjp vs congress

मुंबई, 21 अप्रैल। लोकसभा चुनाव 2019 के तीसरे चरण (Third phase of Lok Sabha election 2019) में आगामी 23 अप्रैल 2019 (23 April 2019,) को होने वाले मतदान में महाराष्ट्र की 14 सीटों पर प्रमुख राजनेताओं के परिवार के सदस्य और बागी प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। महाराष्ट्र की 48 …

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मोदीजी आपका विरोध न करूं, ये कैसे सम्भव है ? आपने 5 साल में वो किया जो लोग सौ साल में नहीं कर पाते !

Narendra Modi new look

मोदीजी आपने इस देश के सामाजिक ढाँचे को बहुत नुक्सान पहुँचाया है। आपने इतना कुछ गलत किया मेरे देश के साथ और आप चाहते हैं कि मैं आपका विरोध भी न करूं ?

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घटिया राजनीति : भारत के इतिहास में सैनिकों की अर्थियां दिखाकर किसी पीएम ने वोट नहीं मांगे

Sikar: Prime Minister and BJP leader Narendra Modi addresses during a public meeting in Rajasthan's Sikar, on Dec 4, 2018. (Photo: IANS)

भारत के इतिहास में सैनिकों की अर्थियां (Corpses of soldiers) दिखाकर किसी पीएम ने वोट नहीं मांगे। हद है घटिया राजनीति (Shoddy politics) की।

अब तक अधिकतम सैनिकों को आतंकियों ने मारा है, सत्तर साल में यह पहली बार हुआ है। यह मोदी की गलत नीतियों का परिणाम (Results of Modi's wrong policies) है।

भारत की जनता को शांति चाहिए। सैन्यबल का प्रदर्शन और युद्ध नहीं। युद्ध महा-अपराध है।

आतंकियों को सेना कभी हरा नहीं सकती, सीरिया-ईराक-यमन आदि देख लो मोदीजी! कूटनीति,अक्ल और विवेक का विकल्प नहीं है सैन्यबल। सैन्यबल मूर्खता है, कूटनीति विवेक है। भारत की पहचान सैन्यबल से नहीं कूटनीति से बनी है।

मोदी ने पांच साल के शासन में गलत कश्मीर नीति के चलते आतंकियों को महाबली बना दिया। आज कश्मीर सबसे ज्यादा वहां की आम जनता परेशान है, लेकिन मोदी ने कभी कोई कदम नहीं उठाया जिससे आम जनता की परेशानी कम हो, बल्कि उलटे ऐसे कदम उठाए जिससे आम जनता और ज्यादा तकलीफ़ में रहे। मोदी के राज्य में आतंकियों की बल्ले-बल्ले है और हथियार उद्योग की। वहीं अहर्निश मैदान में रहने से सैन्यबल परेशान हैं। लेकिन मोदी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्यों कि कश्मीर भाजपा नदारत है, संघियों को कोई तकलीफ़ नहीं है। वहां सैन्य और आतंकी हमलों में कभी कोई संघी नहीं मारा गया, बल्कि गरीब कश्मीरी युवा मारे जा रहे हैं।

सन् 1965 और 1971 में पाक युद्ध में हारा,पर कांग्रेस ने कभी सैनिकों को वोट बैंक का हिस्सा नहीं बनाया। कभी किसी नेता ने सैनिकों की अर्थियां दिखाकर राष्ट्रोन्माद पैदा नहीं किया। कांग्रेस ने युद्ध को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। मोदी राजनीति का सबसे गंदा खेल खेल रहे हैं, वे सैनिकों की मौत को वोट बैंक बनाने में लगे हैं। अब उनके पास विकास की बातें नहीं हैं!

प्रायोजित आतंकवाद, प्रायोजित राष्ट्रवाद और फेक न्यूज (Sponsored Terrorism, Sponsored Nationalism, Fake News) ये तीन तत्व मिलकर घर घर मोदी का माहौल बना रहे हैं।

मोदी की नई रणनीति- सैनिकों की मौत को वोट बैंक में तब्दील करो। जो इसका विरोध करे उसे राष्ट्र शत्रु करार दो।

वल्गर राजनीति का टीवी प्रदर्शन देखें। एक तरफ मोदी की जनसभा और स्क्रीन के दूसरी ओर सीआरपीएफ जवानों की अंतिम यात्रा के सीन! यह है नियोजित फेक राष्ट्रवाद!

सुरक्षित और सैन्य संरक्षित रोड पर सुरक्षा खामी के कारण कश्मीर में सीआरपीएफ पर आतंकी हमला हुआ। सवाल यह है यह खामी किसके कारण हुई ? वे 350किलो बारूद कहां से लाए और कहां जमा किया ? जबकि सारे इलाके में घर-घर सर्च ऑपरेशन सेना कर चुकी थी, सीमा पर सेना की अहर्निश चौकसी है।

अवन्तीपुरा में आतंकी हमले में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि।

(प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी की एफबी टिप्पणियों का समुच्चय साभार)

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चुनावी मोड में मोदी : अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

Election Mode Modi chunavi mod men Arun Maheshwari चुनावी मोड में मोदी : अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

चुनावी मोड में मोदी : अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

'चुनावी मोड' में जनतंत्र-प्रेमियों का दायित्व

अरुण माहेश्वरी

कल ही 'एबीपी न्यूज' चैनल पर पुण्य प्रसून वाजपेयी कह रहे थे — मोदी अब चुनावी मोड में आ चुके हैं। इसे सही रूप में कहा जाए तो आरएसएस चुनावी मोड में आ गया है। अर्थात्, अब आगे, 2019 तक इनका जो भी प्रकट होगा, मोदी जो बोलेंगे, आंकड़ें देंगे, विरोधियों के लताड़ेंगे और थोथे उपदेश देंगे, सब चुनावी होंगे, एक काल विशेष की जरूरतों के लिये। इन सबका सब कुछ संघोनुकूल हो, जरूरी नहीं है। इसमें बहुत कुछ ऐसा भी होगा जो संघमति वालों के शुद्ध संसार की नजर में पतनशील होगा। मसलन् मोदी मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की बात कर सकते हैं, तो भारत की विविधता में एकता की बात भी कह सकते हैं और किसानों, मजदूरों की सेवा की बात कर सकते हैं। संघमति के शुद्ध मानदंडों पर ये सब पतनशील बाते हैं। कमजोर तबकों की सेवा तो संघमति में पूरी तरह से निषिद्ध है। जैसे हिटलर ने सिर्फ यहूदियों के सफाये का नहीं, देश के सभी अपंगों, बीमार और वृद्ध लोगों को भी गैस चैंबरों के सुपुर्द किया था।

संघ की तात्विकता नाजीवाद है।

हिटलर की 'माइन कैंफ' (आत्मजीवनी) ही नाजियों के बाइबल की तरह इनकी भी गीता है। अर्थात्, जब हम संघमति कहते हैं तो उसका तात्पर्य होता है — मूढ़मति, विनाशमति और सांप्रदायिक मति आदि के योग से निर्मित फासिस्ट-नाजी मति।

क्या मतलब है चुनावी मोड में मोदी' का

दरअसल, 'चुनावी मोड में मोदी' का मतलब होता है संघ जगत के बाहर के एक नये जगत का मोदी। शुद्ध रूप से संघी भुवन से बाहर, उसकी तात्विक विशेषताओं से किंचित भिन्न प्रकट रूपों का मोदी। तत्वमीमांसा में प्राणी के मूल तत्व का हर नया प्रकट रूप उसकी पतनशीलता को दर्शाता है।

चुनावी मोड का मोदी और ट्रौल

तो यह जो चुनावी मोड का मोदी है, कहना न होगा, संघ संसार से अलग इसका अपना एक स्वतंत्र जगत होगा। यह ऑनलाइन गुंडे कहे जाने वाले ट्रौल और खास प्रकार के भक्तों का जगत होगा। चुनावी मोड के मोदी को उनका यही जगत बिल्कुल सही रूप में समझेगा और इसके कामों का असली रूप जाहिर करेगा। इसीलिये, अगर आपको चुनावी मोड के मोदी को जानना है तो उसके ट्रौल जगत के भीतर की तमाम हलचलों को जानना होगा, आपको इस चुनावी मोड के मोदी का मूल रूप समझ में आ जाएगा।

अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

इस दौरान इनकी भाषणबाजियों से लेकर भाव-भंगिमाओं तक पर सबकी नजर रहेगी। इनके मर्म को पकड़ने के लिये ही इन पर विचार किया जाएगा। और जब यह विचार-विश्लेषण होगा, इस चुनावी मोड के मोदी के पीछे का पूरा घटना प्रवाह तेजी से सामने आने लगेगा। उनके पूरे काल की समस्याओं से नये सिरे से सामना होगा। दुखों-कष्टों को भूल कर जीने वाले आम आदमी के जख्म फिर एक बार हरे होंगे। दैनंदिन जीवन का यथार्थ लोगों के सर पर चढ़ कर बोलेगा। और इनकी प्रतिक्रिया में मोदी और उनका ट्रौल जगत जो तमाम नाटक करेगा, उनसे उनके हर आने वाले दिन की हरकतों को पहले से ही भापा जा सकेगा। क्या कहा था, क्या किया ! अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ नहीं बचा है। कहना न होगा, आगे उनकी रोजमर्रे की जुमलेबाजी ही उनकी वह सामयिकता होगी, जिसके छद्म को भेद कर रोज इनकी फासीवादी तात्विकता को उघाड़ा जाएगा।

विपक्ष की राजनीति का स्वरूप इन रोजमर्रे के विश्लेषणों और मोदी-संघ की दिशा-दशा पर निर्भर करेगी। उसकी राजनीतिक सिद्धांतवादिता भी इसी प्रकार नये सैद्धांतिक निष्कर्षों के लिये जगह छोड़ेगी। जो ऐसा नहीं करेंगे, वे राजनीति के बाहर के तत्व होंगे। मान लिया जाएगा कि अभी के राजनीतिक घटना-क्रम में उनका कुछ भी दाव पर नहीं है। अन्यथा, इसमें अब कोई शक नहीं है कि हर जनतंत्रप्रेमी और देशभक्त भारतीय के लिये आगे का पूरा साल हर दिन मोदी-संघ और उनके ट्रौल-भक्त जनों के सारे छद्मों को पूरी शक्ति के साथ खोल कर भारत को फासीवाद-नाजीवाद के पंजे से मुक्ति की लड़ाई का साल होना चाहिए।   

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