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राजनीति चमकाने के लिए मेरठ प्रहलाद नगर के साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास

India news in Hindi

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ इस तरह के किसी पलायन से इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हिंदुओं का पलायन कैसे हो सकता है

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दुनिया में भारत की असभ्य इमेज बनाने वाले तत्व हैं हिंदुत्व – आरएसएस का प्रचार और कारपोरेट मीडिया

Jagadishwar Chaturvedi

आज सारी दुनिया में भारत की जो खराब इमेज बनी है उसमें मोदी सरकार के अलावा मीडिया कवरेज की सबसे बड़ी भूमिका है।

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पंडित नेहरू का जमाना जब डर दिखा कर वोट लेना बहुत गलत काम माना जाता था

How much of Nehru troubled Modi

आजादी के शुरुआती पन्द्रह वर्षों में जवाहरलाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) ने जो बुनियाद डाली उसी का नतीजा है किस आज दुनिया में भारत का सर ऊंचा है।

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लोकसभा चुनाव – बहरी और गूंगी संसद के गठन की हो रही तैयारी

Lok sabha election 2019

आज स्थिति यह है कि कायर, नौतिक रूप से कमजोर विपक्ष और व धंधेबाज लोगों के जनप्रतिनिधि बनने से सड़क सुनसान और संसद बहरी और गूंगी हो जा रही है।

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साफ़ दिखाई देने लगी है मोदी की पराजय… मोदी की सूरत बदहवासी में कैसी दिखाई देने लगी है !

Narendra Modi An important message to the nation

गली गली में शोर है’ के प्रत्युत्तर में मोदी का ‘मैं भी चौकीदार’ मैं ही चौकीदार की आत्म-स्वीकृति बन चुका है। मोदी ने फिर एक बार शुद्ध झूठ के आधार पर अपने को ग़रीब चौकीदार दिखाने की जो कोशिश की है, उसे उनके पैसे वाले मित्रों ने ही खुद को चौकीदार घोषित करके ध्वस्त कर दिया है।

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घटिया राजनीति : भारत के इतिहास में सैनिकों की अर्थियां दिखाकर किसी पीएम ने वोट नहीं मांगे

Sikar: Prime Minister and BJP leader Narendra Modi addresses during a public meeting in Rajasthan's Sikar, on Dec 4, 2018. (Photo: IANS)

भारत के इतिहास में सैनिकों की अर्थियां (Corpses of soldiers) दिखाकर किसी पीएम ने वोट नहीं मांगे। हद है घटिया राजनीति (Shoddy politics) की।

अब तक अधिकतम सैनिकों को आतंकियों ने मारा है, सत्तर साल में यह पहली बार हुआ है। यह मोदी की गलत नीतियों का परिणाम (Results of Modi's wrong policies) है।

भारत की जनता को शांति चाहिए। सैन्यबल का प्रदर्शन और युद्ध नहीं। युद्ध महा-अपराध है।

आतंकियों को सेना कभी हरा नहीं सकती, सीरिया-ईराक-यमन आदि देख लो मोदीजी! कूटनीति,अक्ल और विवेक का विकल्प नहीं है सैन्यबल। सैन्यबल मूर्खता है, कूटनीति विवेक है। भारत की पहचान सैन्यबल से नहीं कूटनीति से बनी है।

मोदी ने पांच साल के शासन में गलत कश्मीर नीति के चलते आतंकियों को महाबली बना दिया। आज कश्मीर सबसे ज्यादा वहां की आम जनता परेशान है, लेकिन मोदी ने कभी कोई कदम नहीं उठाया जिससे आम जनता की परेशानी कम हो, बल्कि उलटे ऐसे कदम उठाए जिससे आम जनता और ज्यादा तकलीफ़ में रहे। मोदी के राज्य में आतंकियों की बल्ले-बल्ले है और हथियार उद्योग की। वहीं अहर्निश मैदान में रहने से सैन्यबल परेशान हैं। लेकिन मोदी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्यों कि कश्मीर भाजपा नदारत है, संघियों को कोई तकलीफ़ नहीं है। वहां सैन्य और आतंकी हमलों में कभी कोई संघी नहीं मारा गया, बल्कि गरीब कश्मीरी युवा मारे जा रहे हैं।

सन् 1965 और 1971 में पाक युद्ध में हारा,पर कांग्रेस ने कभी सैनिकों को वोट बैंक का हिस्सा नहीं बनाया। कभी किसी नेता ने सैनिकों की अर्थियां दिखाकर राष्ट्रोन्माद पैदा नहीं किया। कांग्रेस ने युद्ध को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। मोदी राजनीति का सबसे गंदा खेल खेल रहे हैं, वे सैनिकों की मौत को वोट बैंक बनाने में लगे हैं। अब उनके पास विकास की बातें नहीं हैं!

प्रायोजित आतंकवाद, प्रायोजित राष्ट्रवाद और फेक न्यूज (Sponsored Terrorism, Sponsored Nationalism, Fake News) ये तीन तत्व मिलकर घर घर मोदी का माहौल बना रहे हैं।

मोदी की नई रणनीति- सैनिकों की मौत को वोट बैंक में तब्दील करो। जो इसका विरोध करे उसे राष्ट्र शत्रु करार दो।

वल्गर राजनीति का टीवी प्रदर्शन देखें। एक तरफ मोदी की जनसभा और स्क्रीन के दूसरी ओर सीआरपीएफ जवानों की अंतिम यात्रा के सीन! यह है नियोजित फेक राष्ट्रवाद!

सुरक्षित और सैन्य संरक्षित रोड पर सुरक्षा खामी के कारण कश्मीर में सीआरपीएफ पर आतंकी हमला हुआ। सवाल यह है यह खामी किसके कारण हुई ? वे 350किलो बारूद कहां से लाए और कहां जमा किया ? जबकि सारे इलाके में घर-घर सर्च ऑपरेशन सेना कर चुकी थी, सीमा पर सेना की अहर्निश चौकसी है।

अवन्तीपुरा में आतंकी हमले में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि।

(प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी की एफबी टिप्पणियों का समुच्चय साभार)

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मोदीजी, देश की छवि को कितना बट्टा और लगाओगे?

Narendra Modi new look

महेन्द्र मिश्र एनएसजी मामले पर मोदी सरकार की कूटनीति औंधे मुंह गिर गई है। और पूरी दुनिया अब प्रधानमंत्री के खड़े किए गए इस तमाशे पर हंस रही है। दरअसल मोदी जी को समझना होगा कि कूटनीति राजनीति का उच्चतम शिखर होती है। उसे देश की सड़क छाप राजनीति के तरीके से नहीं चलाया जा सकता है। शालीनता के साथ नफासत और धैर्य के साथ गंभीरता उसकी बुनियादी शर्त है। राजनीति अगर बोलने की कला है तो कूटनीति चुप रहने की। दुनिया की शतरंजी विसात पर राजा नहीं बल्कि उसके वजीर लड़ते हैं। राजा के कमान संभालने का मतलब है कूटनीति से ज्यादा राजनीति पर भरोसा। जबकि सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र कूटनीति का होता है। लेकिन शायद मोदी जी अभी कूटनीति का क ख ग सीख रहे हैं। यह शिक्षा पूरी दुनिया की यात्रा के जरिये या फिर पूरे देश की इज्जत का फालूदा निकाल कर ही पूरी हो। यह कोई जरूरी तो नहीं? इस मामले में चीन को अपने पक्ष में करने की कोशिशें बेहद बचकाना साबित हुईं। केवल चीन के साथ ही नहीं बल्कि स्विटजरलैंड और आयरलैंड समेत दूसरे देशों के साथ भी ऐसा ही रहा। अव्वल न तो इस मसले पर चीन के रूख को लेकर आपका एक पुख्ता आंकलन होना चाहिए था। और फिर उसके हिसाब से अपने कदम तय करने चाहिए थे। आपने विदेश सचिव के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल चीन भेजा था। उसी दौरान चीन का रुख स्पष्ट हो गया होगा। और अगर वह नकारात्मक था। तो ऐसे में दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के मिलने का कोई तुक नहीं बनता था। क्योंकि उनके मिलने का ही मतलब हां होता है। ना होने से साख के जाने का खतरा या फिर स्टेट्समैनशिप पर सवालिया निशान लग जाता है। लेकिन साथ ही सरकार को इस सवाल का भी जवाब जरूर देना चाहिए कि 2008 में जब एनएसजी में भारत को एनपीटी से छूट दी गई, तो उस समय भी तो चीन वहां मौजूद था। इस बीच ऐसा क्या हो गया जिससे चीन भारत के विरोध में चला गया। दरअसल यही वह पेंच है जिसको समझना जरूरी है। तब भारत पश्चिमी देशों और आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक के खिलाफ चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर एक समानांतर गठजोड़ बनाने की राह पर था। ब्रिक्स उसी का नतीजा था। यहां तक कि डालर के विकल्प के बारे में भी सोचा जाने लगा था। लेकिन मोदी जी के शासन में आते ही विदेश के मोर्चे पर भारत की सामरिक नीति और दिशा दोनों बदल गई। अब सरकार की पूरी रणनीति चीन विरोध पर आधारित है। किसी बड़े रिश्ते में जाने की बात तो दूर अविश्वास का बादल कितना घना हो गया है वह एक उदाहरण से ही काफी है।  कुछ दिन पहले ही उड़ीसा में कार्यरत कुछ चीनी कर्मचारियों को इसलिए वैरंग वापस भेज दिया गया, क्योंकि उनसे खुफियागिरी की आशंका थी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत उस अमेरिका के साथ खड़ा है जिससे चीन का 36 का रिश्ता है। बाजार पर कब्जे की लड़ाई हो या कि दक्षिण चीनी समुद्र में सैन्य तैनाती का फैसला या फिर पूंजीवाद और समाजवाद की परंपरागत दुश्मनी। हर जगह दोनों आमने सामने हैं। इस रिश्ते में भारत एक तीसरा पक्ष जरूर है। लेकिन वह अपना कोई अलग कोण बनाने की जगह अमेरिकी शागिर्दी के लिए तैयार है। इस दौर में अमेरिकी बैताल को एक विक्रम चाहिए। और मोदी जी उसे अपनी पीठ देने के लिए राजी हैं। अमेरिका के साथ भारत का सामरिक समझौता उसी कड़ी का हिस्सा है। अगर भारत की पूरी विदेश नीति चीन के विरोध पर टिकी है। जिसकी कि वो खुलेआम घोषणा करता फिरता रहता है। ऐसे में चीन के रास्ते में कदम-कदम पर कांटे बोकर अपने लिए फूल की उम्मीद बेमानी है। अकेले चीन ने नहीं बल्कि विरोध करने वालों की फेहरिस्त में स्विटजरलैंड भी है। मोदी जी ने एक पखवाड़ा पहले जिसकी यात्रा की है। इस विरोध में ब्राजील भी शामिल है। जिसका भारत के घनिष्ठ मित्रों में नाम शुमार है। वह ब्रिक्स और इब्सा का सदस्य भी है। या फिर न्यूजीलैंड, आस्ट्रिया और आयरलैंड क्यों विरोध कर रहे हैं? भारत की जो पश्चिमोन्मुख दिशा है उसमें आज चीन और ब्राजील गए हैं। कल रूस और दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हो जाएंगे। और फिर आप पस्त अमेरिका और संकटग्रस्त यूरोप की डूबती नैया के खेवनहार बनकर रह जाएंगे। मोदीजी की विदेश यात्राओं का जमा यही है। लाभ तो कुछ हासिल नहीं हुआ। भारत की छवि को बट्टा लगना जरूर शुरू हो गया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बिरादरी में मोदी की छवि एक सेल्फी लेने वाले, बेवजह गले पड़ने वाले और प्रवासी भारतीयों के बीच आत्मप्रशंसा के भूखे शख्सियत की बन रही है। भारत की जिन पहचानों और शख्सियतों के साथ अंतरराष्ट्रीय बिरादरी बावस्ता रही है उसे खारिज करने की कोशिश खुद अपनी जमीन से चादर खींचने जैसी होगी। नेहरू कोई नाम नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की नींव हैं। उन्हें उखाड़कर आप अपनी कोई जमीन नहीं बना सकते हैं। ऐसे में पूरे मामले का राजनीतिकरण करने की जगह सरकार को अपनी गल्तियों का विश्लेषण करना चाहिए। जिससे भविष्य में इसके दोहराव से बचा जा सके। विदेश से जुड़े मामलों को बड़ा मुद्दा बनाने के पीछे एक और वजह है। दरअसल सरकार घरेलू मोर्चे पर लगातार नाकाम हो रही है। ऐसे में जनता का ध्यान उससे हटाने के लिए सरकार को एक अच्छा हथियार मिल गया है। भला एफडीआई के लिए इससे बड़ा पर्दा और क्या हो सकता है? लेकिन सवाल यह है कि अगर विदेश के मोर्चे पर भी मोदी जी की पोल खुल गई तो उनके छुपने के लिए फिर कौन ठिकाना होगा।

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