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Sikar: Prime Minister and BJP leader Narendra Modi addresses during a public meeting in Rajasthan's Sikar, on Dec 4, 2018. (Photo: IANS)

अपने खिलाफ हर आवाज को दबाने पर आमादा बेगैरत बादशाह

सेना में खाने (diet in army) को लेकर व्यवस्था पर उंगली उठाने वाले सैनिक तेज बहादुर (soldier Tej Bahadur who took finger at the system) के वाराणसी लोकसभा सीट (Varanasi Lok Sabha seat) से पर्चा रद्द होने का मतलब है कि यह चुनाव निष्पक्ष नहीं (Election is not fair) हो रहा है। जिस तरह से तेज बहादुर का पर्चा रद्द हुआ है उससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता (EC reliability) पर संदेह जाना वाजिब है।

मतलब चुनाव आयोग भी मोदी सरकार के दबाव में है। EC is under the pressure of the Modi Government.

ईवीएम मामले में भी कितने लोगों ने साबित कर दिया है कि उसे हैक किया जा सकता है। वैसे भी अखिलेश यादव, मायावती और कपिल सिब्बल ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगा चुके हैं। मतलब साफ है कि सत्ता के लिए मोदी का साम दंड दाम भेद सब कुछ चल रहा है।

समझने की जरूरत यह है कि ये जो लोग सत्ता पर काबिज हैं, ये लोग अंग्रेजी हुकूमत के पैरोकार रहे हैं। अंग्रेजों की तरह ही अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने में विश्वास रखते हैं। चाहे उसके लिए इन्हें कुछ भी करना पड़े। क्योंकि जब तेज बहादुर ने सेना में पतली दाल को लेकर आपत्ति जताई तो केंद्र में मोदी की ही सरकार थी। ऐसे में मोदी जैसा घमंडी आदमी भला कैसे बर्दाश्त करता कि उसकी सरकार की खामियां गिनाने वाला उसके खिलाफ़  चुनाव लड़े।

दरअसल तेज बहादुर के रूप में मोदी को वे सैनिक दिखाई दे रहे हैं जो स्वाभिमान के लिए कितनी भी बड़ी ताकत से टकराने को तैयार बैठे हैं।

पुलवामा में हुए आतंकी हमले में सेना की ही जवान शहीद हुए थे। उस मुद्दे को न उठने देने वाले मोदी सेना की एयर स्ट्राइक को चुनाव में भुना रहे हैं। मोदी को तेज बहादुर के उनके खिलाफ चुनाव लड़ने पर उनके नकली राष्ट्रवाद (Counterfeit nationalism) का खुलासा होने का अंदेशा है। जिस व्यवस्था में समझौता वादी प्रवत्ति लोगों के घर कर गई हो,  उसमें तेज बहादुर ने सेना की व्यवस्था पर उंगली उठाई है।

यह जगजाहिर हो चुका है कि सेना में भी भ्रष्टाचार (Corruption in the army) घुस गया है। कितने अफसरों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के मामले उजागर हो चुके हैं। कितने अफसरों के सैनिकों से दुर्व्यवहार करने के मामले सामने आते हैं। कितने जवानों की जिंदगी तो अफसरों के घर में ही तीमारदारी करने में ही गुजर जाती है। ऐसे में यदि तेज बहादुर ने सेना में खाने की व्यवस्था पर उंगली उठाई तो इसमें गलत क्या है। समझने की बात है कि उनमें कितना नैतिक साहस है। मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, उन्हें मामले पर उच्च स्तरीय जांच बैठानी चाहिए थी। उल्टे तेज बहादुर पर अनुसाशनहीनता का दोष लगाकर उन्हें बर्खाश्त कर दिया गया।

जब बात राष्ट्रवाद की चल रही है तो तेज बहादुर के परिवार की पृष्ठभूमि देखने की जरूरत गया। तेज बहादुर हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक किसान परिवार से हैं। जो देश के प्रति समर्पित रहा है। इनके दादा ईश्वर सिंह ने सुभाष चंद्र बोस के साथ काम किया है। ऐसे परिवार के जुझारू सैनिक को देश में इतना अपमान झेलना पड़ रहा है। व्यवस्था की लड़ाई में तेजबहादुर अपने 22 वर्षीय बेटे को भी खो चुके हैं।

अब जब वह व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के लिए चुनावी समर में उतरे तो उनका पर्चा ही रद्द कर दिया गया।

ऐसे ही एक पर्चा गौतमबुद्धनगर सीट से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी का भी रद्द किया गया था।

सोचने का विषय यह है कि प्रधानमंत्री किस हद तक गिरकर राजनीति कर रहे हैं। तेज बहादुर के पर्चा रद्द करने के पीछे इसलिए भी षड्यंत्र लग रहा है क्योंकि मोदी भक्त पर्चा रद्द होने से पहले ही सोशल मीडिया पर पर्चा रद्द होने की पोस्ट डालने लगे थे।

बात तेज बहादुर की ही नहीं है। मोदी ने उमके माध्यम से यह संदेश दिया है कि उन्हें अपने खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं। उनके खिलाफ उठने वाली हर आवाज को ऐसे ही दबा दिया जाएगा।

सोचने की जरूरत यह है कि यदि फिर से मोदी की सरकार बन गई तो वह भूमि अधिग्रहण और श्रम कानून में संशोधन कर। कानून में वह संसोधन कर किसानों की जमीन हथिया कर पूंजीपतियों को दे देंगे। वैसे भी मोदी भक्त खेती में घाटा उठाने पर किसानों को नकारा साबित करने पर तुले हैं। मजदूर को फैक्ट्रियों व कार्यालयों में बंधुआ बनाकर रख दिया जाएगा। चीन से 200 अमरीकी कंपनियों की भारत आने की खबरें ऐसे ही थोड़े आ रही हैं। सस्ती जमीन और सस्ता श्रम देने के नाम पर मोदी उन्हें आमंत्रित कर चुके हैं। यही तो मोदी की राजनीति है।

मतलब इस बार मोदी का राज आया तो पीड़ित अपनी लड़ाई भी नहीं लड़ पायेगा। वैसे भी लोकतंत्र और संविधान के प्रति इन लोगों के मन में कोई सम्मान तो है नहीं। ऐसे में देश में क्या अराजकता का आलम होगा यह बताने की जरूरत नहीं है। इन परिस्थितियों में इस अराजक व्यवस्था के विरोध की आवश्यकता है। जरूरत सत्ता की वजह से नहीं है। इसलिए है कि यह व्यक्ति झूठी शान के लिए देश से सब कुछ तबाह कर देना चाहता है। देश के आम आदमी को पूंजीपतियों का बंधुआ बनाने की तैयारी चल रही है।

CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जिन-जिन लोगों ने मोदी सरकार का विरोध किया मोदी उनका दमन करने में लगे हैं। क्योंकि किसानों की फसल का डेढ़ गुना मूल्य और हर साल डेढ़ करोड़ युवाओं को रोजगार देने के मामले पर मोदी की किरकिरी हुई है। किसानों, मजदूरों और युवाओं ने बड़े स्तर पर मोदी के खिलाफ आंदोलन किये हैं। यही वजह है कि किसान, मजदूर और युवा को इस बार भाजपा के घोषणापत्र में तवज्जो नहीं दी गई है। मतलब जो व्यक्ति मोदी का भक्त बनकर रहेगा। वह ही देश में सुरक्षित रह पायेगा। इस तरह की राजनीति पर उतारू हो गए हैं मोदी।

चरण सिंह राजपूत

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