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बापू की हत्या का सच जो मीडिया नहीं बताएगा, हिंदुत्ववादी तो बिल्कुल नहीं बताएंगे

 30 जनवरी 1948 (30 January 1948) को बिड़ला भवन (Birla Bhawan) में, बीसवीं सदी के नायक शांति और अहिंसा के पुजारी (priest of non-violence) महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या (shot dead) कर दी गयी। आज की राजनीतिक, सामाजिक शुचिता का स्तर देखकर यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि आज की ही वह तारीख है,जब भारत का सारा प्रकाश अपने साथ लेकर ही उस दिन का सूरज डूबा और भारत पर अंधेरी रात का साम्राज्य छा गया। बापू की हत्या (killing of Bapu) किन कारणों से की गयी देश का आधे से ज्यादा जनमानस आज भी काफी भ्रमित है। आज फिर बापू की 72वीं पुण्यतिथि है। बड़ा अजीब है कि बापू की हत्या के इतने दिन गुजर जाने के बाद भी देश के आधे जनमानस को आज भी बापू की हत्या के करणों की जानकारी नहीं है। बापू की हत्या के पीछे कुछ हत्यारे हिंदुत्ववादियों द्वारा दो कारण ही सामने रखकर बापू की हत्या का प्रचार – प्रसार किया जाता रहा है कि बापू (Mahatma Gandhi) देश के बंटवारे के लिए तथा पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाने के लिए जिम्मेदार थे तथा कुछ हिंदुत्ववादियों द्वारा यह भी अफवाह फैलाई जाती है कि बापू ने मुस्लिमों को सर पर चढ़ा रखा था और नाटकों के माध्यमों से बापू जी की हत्या के झूठे साज़िशों से देश के जनमानस को दिगभ्रमित करते हुये हत्या के तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया जाता रहा है। लेकिन सच यह नहीं है क्योंकि बापू की हत्या का प्रयास 1934 से ही किया जा रहा है उस समय न तो देश बंटवारे का प्रश्न था और न ही 55 करोड़ का मामला था।

The truth of the killing of Bapu which will not tell the media and Hindutva

साधारणत: बापू को देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले लोग शायद जो खुद बापू की हत्या के जिम्मेदार और सहभागी हैं। राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक “गिल्टी मैन आफ पार्टिशन’ में लिखा है कि – “महात्मा गांधी, सरहदी गांधी, जयप्रकाश नारायन और मैं – इन चार लोगों ने ही विभाजन का विरोध किया। अन्य किसी ने विभाजन के विरोध में कुछ नहीं कहा।”

बापू ताउम्र देश कि अखंडता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहे उन्होंने अपनी ज़िंदगी के आखिरी समय में देश विभाजन को रोकने के लिए एक नौ मुद्दों वाली योजना प्रस्तुत की थी। वह इस प्रकार है

1॰ मंत्रिमंडल बनाने का विकल्प जिन्ना को दिया जाय

2॰ मंत्रियों को चुनने का पूरा अधिकार मिस्टर जिन्ना को दिया जाये, वे चाहें तो सारे मंत्री मुस्लिम रखें या मुस्लिमों के सिवाय मंत्रिमंडल बनावें या सब जाति एवं धर्मों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दें

3॰ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस, जनहित के हर कार्य में सहयोग करेगी यदि जिन्ना चाहे तों।

4॰ किन बातों में भारतीयों का हित है और किन बातों में भारतीयों का हित नहीं है यह व्यक्तिगत तौर पर लॉर्ड माउंट बेटन एक पंच की तरह तय करेंगे।

5॰ पूरे देश में शांति रहे, इसके लिए जिन्ना स्वयं लीग के नाम से या जिन्ना जिस पक्ष की सरकार बनाएंगे, उस पक्ष के नाम से प्रयत्न करेंगे

6॰ इस सीमा में रहकर पाकिस्तान विषयक अपनी अवधारणा जिन्ना सत्ता हस्तांतरण से पहले सामने रखेंगे

7॰ नेशनल गार्ड या ख़ानगी सेना नहीं रहेगी

8॰ विधानसभा में काँग्रेस का बहुमत हो तो भी इस बहुमत का उपयोग कांग्रेस मुस्लिम लीग के विरोध में नहीं करेगी। सब भारतीयों के हित और कल्याण की जो योजनाएँ लीग की सरकार बानाएगी, उन सभी योजनाओं और कार्यक्रमों को कांग्रेस मंजूरी देगी

9॰ अगर जिन्ना इस योजना को स्वीकार न करें तो यही योजना कांग्रेस के सामने रखी जाएगी।

गांधी जी की इस योजना से स्पष्ट है गांधी जी विभाजन के पक्ष में कदापि भी नहीं थे और गांधी जी की इस योजना को वाइसराय ने भी पसंद किया था। इसके आलावा गांधी जी ने राजाजी की योजना को भी मंजूरी दी थी, जिसमें देश विभाजन को खारिज किया गया था, परंतु जिन्ना ने दोनों योजनाओं को पूर्णत: खारिज कर दिया। कुछ लोगों को यह लगता है की गांधी जी मुस्लिमों का तुष्टीकरण कर रहे थे लेकिन सच्चाई यह है कि वह किसी भी कीमत पर देश की अखंडता को बनाये रखना चाहते थे।

बापू की हत्या का दूसरा कारण कुछ हिंदुत्ववादी 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देना बताते हैं जो कि जनमानस को दिगभ्रमित और तथ्यों से खिलवाड़ करना है सच तो यह है कि 1948 का दौर आजादी कि प्राप्ति के तुरंत बाद का दौर था उस समय कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा देश में ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा था कि हिन्दुओं और मुसलमानों में संघर्षमय और तनावपूर्ण माहौल बना रहे जिसमें मुस्लिम धर्मन्धों ने भी सहयोग किया। विभाजन के बाद फैले दंगों कि चपेट में दिल्ली भी आ गयी। दिल्ली मानो कत्लखाना ही बन गयी। दिल्ली में हुये दंगों से गांधी जी बहुत दुखित हुये और गांधी जी मौलाना आजाद से कहा था कि “दिल्ली में शांति स्थापित करने के लिए उपवास ही मेंरे पास एक अस्त्र के रूप में बचा है।” तत्पश्चात गांधी जी ने 13 जनवरी को उपवास शुरू किया।

जब गांधी जी ने उपवास शुरू किया तब तात्कालिक गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने अपने सचिव वी॰ शंकर को बापू के पास भेजा और बापू से पुछवाया कि वो क्या कर सकते हैं तब बापू ने हर तात्कालिक समस्या पर राय देने के साथ 55 करोड़ पर भी अपनी राय दिया और उन्होंने 55 करोड़ पाकिस्तान को देने का सुझाव दिया जिसके पीछे बापू की समझ शायद यह थी कि अभी – अभी आजाद हुये देश की छवि किसी भी तरह धूमिल न हो। बापू के अलावा लार्ड माउंट बेटन, राजाजी और रिजर्व बैंक के तात्कालिक गवर्नर चिंतामानराव देशमुख का भी यहीं मत था।

बापू की उपवास के दौरान दिये गए इसी राय को कुछ हिन्दुत्ववादियों ने 55 करोड़ के लिए उपवास बताया और इसका प्रचार – प्रसार किया और झूठ सच लगने लगा जबकि यह उपवास सांप्रदायिक सौहार्द और दंगा रोकने के लिए था। अब यदि घटना क्रम को देखे तो बापू ने उपवास 13 जनवरी को शुरू किया और 15 जनवरी को 55 करोड़ पाकिस्तान को देने का निर्णय लिया गया। 18 जनवरी को बापू ने करीब 1 बजे उपवास खत्म किया। यदि उपवास 55 करोड़ के लिए होता तो तुरंत उसी समय या अगले दिन ही समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिससे स्पष्ट है कि 55 करोड़ और उपवास का आपस में कोई संबंध नहीं था।

दिल्ली सहित पूरे देश में शांति स्थापित हो इसके लिए उसी समय डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में सभी धर्मों के करीब 130 प्रमुख लोगों की एक समिति गठित कि गयी जिसमें आरएसएस और हिन्दू महासभा सहित बापू की हत्या के लिए जिम्मेदार सभी संगठनों के लोगों ने भागीदारी की। इस समिति की ओर से 17 जनवरी को दिल्ली में एक आमसभा हुयी। बापू ने उपवास समाप्ति के लिए सात शर्तें रखीं थीं। ये सातों शर्तें स्वीकृत हुयी और सभा में यह प्रण लिया गया कि –

1 ॰ हिन्दू ,मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग दिल्ली सहित पूरे देश में भाई –भाई की तरह और सौहार्दपूर्वक रहेंगे ऐसा विश्वास हम लोग दिलाते हैं और मुस्लिमों की जान – माल की रक्षा करने की प्रतिज्ञा हम करते हैं और ऐसे हादसे फिर न हो जिसके लिए पूरी सतर्कता बरती जाएगी।

2 ॰ गतवर्ष की तरह इस वर्ष भी ख्वाजा कुतुब्बूद्दीन मसर का उत्सव मनाया जाएगा ऐसा आश्वासन हम बापू जी से करते हैं

3 ॰ सब्जीमंडी, करोलबाग, पहाड़गंज सहित राज्य के अन्य हिस्सों में मुस्लिम समुदाय पहले की तरह अपना व्यवहार कर सकेंगे

4. जिन मस्जिदों पर अन्य धर्मों के लोगों ने अधिकार कर लिया है उसे मुस्लिमों को वापस कर दें

5. दंगे के दौरान जिन मुस्लिमों ने दिल्ली छोड़ दिया है यदि वो वापस आना चाहते हैं तो उन्हें आने दिया जाए तथा उन्हें उनका पुराना व्यवसाय करने दिया जाए

6. ये सारे प्रयास हम संगठन के लोग करेंगे

7. बापू जी हम पर विश्वास रखकर अपना उपवास समाप्त करें और आगे भी हमारा मार्गदर्शन करें

उपवास समाप्ति के लिए रखी गयी शर्तों में कहीं पर भी 55 करोड़ का उल्लेख नहीं हैं। 17 जनवरी 1948 को यह स्वीकृत होने पर बापू ने 18 जनवरी को अपना उपवास समाप्त किया। इससे स्पष्ट है कि बापू ने उपवास 55 करोड़ के लिए नहीं बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए रखा था।

अब प्रश्न उठता है कि फिर बापू की हत्या क्यों की गयी ?

Now the question arises that why Bapu was murdered?

आजादी की लड़ाई में हिंदुत्ववादी संगठनों नें अपने आप को दूर रखा जिसका कारण यह था कि वो हिन्दुत्व और हिंदूराष्ट्र के सपने को सँजोये हुये थे और प्रजातन्त्र के बजाय धर्मराष्ट्र का पक्ष ले रहे थे। गांधी युग में भी हिंदुत्ववादियों ने धर्मराष्ट्र की आवाज को उभारा भी था परंतु फिर भी वे आमजन को आजादी कि लड़ाई से दूर नहीं रख पाये थे। यदि हम संक्षेप में देखे तो बापू इन हिंदुत्ववादियों के राह में रोड़ा थे जिसके कारण इन हिंदुत्ववादियों का मानना था कि बापू की हत्या ही बस एक उपाय है जिससे हिंदुत्ववादी अपने उद्देश्य में कामयाब हो सके, जिसका प्रयास 1934 से ही किया जाने लगा और अंतत: उनको 30 जनवरी 1948 की शाम को उनको यह मौका मिल गया।

बापू की ह्त्या किसी विशेष संगठन द्वरा प्रायोजित थी जैसा कि नाथूराम ने बापू के सुपुत्र देवदास गांधी जी से भी बोला था कि उसने बापू कि हत्या व्यक्तिगत कारणों से नहीं किसी संगठन के राजनीतिक उद्देश्यों के से की है और नाथूराम का भाई गोपाल गोडसे जो खुद बापू की ह्त्या का आरोपी था, उसने जनवरी 1994 को फ्रंटलाइन पत्रिका को दिए इंटरव्यू में साफ कहा था कि उसका भाई आरएसएस का ही सदस्य था। उसने कहा था:

“हम सभी भाई आरएसएस में थे। नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविंद। आप कह सकते हैं कि हमारा पालन पोषण हमारे घर के बजाय संघ में ही हुआ। संघ हमारे लिए परिवार था। नाथूराम संघ में एक बौद्धिक कार्यवाह बन गया था। उसने अपने बयान में भले ही कहा हो कि उसने संघ छोड़ दिया था। ऐसा उसने इसलिए कहा था, क्योंकि गांधी जी की हत्या के बाद गोलवलकर और संघ बहुत बड़ी मुश्किल में फंस गए थे। लेकिन उसने कभी आरएसएस छोड़ा नहीं था।”  — (28 जनवरी, 1994 को फ्रंटलाइन पत्रिका को दिए इंटरव्यू में गोपाल गोडसे का बयान Gopal Godse's statement in the interview given to Frontline magazine on January 28, 1994)

बापू की हत्या करने के मकसद में तो वो हिंदुतवावादी हत्यारे तो कामयाब हो गए परंतु बापू द्वारा दी गयी लोकतन्त्र, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और भाई चारे की विरासत को वो खत्म नहीं कर सके।

राजेंद्र कुमार यादव

एम॰फिल॰शोधार्थी (गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग )

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा

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