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पूर्वोत्तर में उग्रवादी-अलगाववादियों के सहारे खिलेगा कमल !

 

पलाश विश्वास

होली का मजा किरकिरा करने के लिए माफ करें। ईव्हीएम मशीनों पर पहले ही खुद लौहमानव ने सवाल खड़े कर दिये, तो एक भी मुसलमान उम्मीदवार को टिकट दिये बिना मुसलमानों का दस फीसद वोट हासिल करके यूपी दखल करने में कामयाबी डिजिटल कैशलैश मिशन का है। जनादेश भी वही डिजिटल कैशलैस है।

यूपी और उत्तराखंड में बहुमत हासिल करने वाली मोदी सुनामी और राम की सौगंध की युगलबंदी का असर बाकी देश में कितना है, उसका अंदाजा पंजाब में दस साल की सत्ता के बाद सघ परिवार की दिशाहीन कांग्रेस के मुकाबले हार से लगाया जा नहीं सकता।

बहरहाल हारे हुए मणिपुर और गोवा में सत्ता दखल करने के जो रास्ते संघ परिवार ने अपनाये,  वह डिजिटल कैसलैस इंडिया की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक हैं।

हमने एक्जिट पोल के हिसाब से कह दिया था कि मणिपुर में संघ परिवार का कब्जा बहुत बड़े संकट के संकेत हैं।

मणिपुर में कांग्रेस के विघटन के साथ संघ परिवार की हुकूमत में एन वीरेन सिंह मुख्यमंत्री बन रहे हैं और इस सरकार को उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आईएम) का समर्थन है। न्यूज 18 असम ने इस सिलसिले में समाचार प्रकाशित किया है।

यानी हमारी राष्ट्रवादी देशभक्त भाजपा को पूर्वोत्तर जीतने के लिए उग्रवादी तत्वों का सहारा लेनें में भी परहेज नहीं है। असम में अल्फाई राजकाज का नतीजा हम देख ही रहे हैं।

अब मणिपुर के बाद मेघालय में भी तख्ता पलट की तैयारी है।

असम, अरुणाचल, मेघालय के बाद त्रिपुरा में वाम शासन के अवसान के लिए जाहिर है कि भूमिगत उग्रवादी संगठनों का सहारा लेने से परहेज नहीं करेगा संघ परिवार।

इस बीच धेमाजी में होली के मौके पर कर्फ्यू में ढील दी गयी है लेकिन वहां हिंसा, फतवा और आगजनी की वारदात थमने के आसार नहीं है क्योंकि वहां उपचुनाव होने हैं।

सत्ता पर वर्चस्व के लिए आसू को धता बताने की तैयारी बंगाली हिंदू शरणार्थियों को मोहरा बनाकर भाजपा ने की थी, जिसके जबाव में आसू के पलटमार से असम के हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं।

दूसरी तरफ आसू के सौ घंटे के बंद के अलावा कोकराझाड़ में अलग राज्य आंदोलन के तहत सौ घंटे के बंद की अलग तैयारी है, इऩके पीछे कौन है, अभी कहना मुश्किल है।

धेमाजी के बाद आसू ने डिब्रूगढ़ में सत्याग्रह किया तो आज तिनसुकिया में आर्थिक अवरोध हुआ। शरणार्थी संगठन और शरणार्थी आंदोलन को निषिद्ध करने का अभियान अलग चल रहा है।

असम में शरणार्थी आंदोलन के दौरान निखिल भारत के हर मंच पर शरणार्थी वोट बैंक के दखल के लिए कांग्रेस और भाजपा के मंत्री नेता हाजिर रहे हैं, जो अब शरणार्थी नेताओं और उनके संगठन को न जानने की बात कह रहे हैं, जबकि इन्हीं शरणार्थियों की बात कहकर सिर्फ हिंदुओं को नागरिकता देने का विधेयक पेश करके उस पास न करके हिंदी मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति भी करता रहा है संघ परिवार।

इससे असम में हिंदू मुसलिम और असमिया गैर असमिया दो तरह के ध्रुवीकरण हैं और आज हुई आर्थिक नाकेबंदी से साफ जाहिर है कि सत्ता की इस लड़ाई का अंजाम क्या होगा।

मणिपुर में सशत्र सैन्य बल विशेषाधिकार कानून आफ्सा खत्म करने के लिए 14 साल तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला को सिर्फ नब्वे वोट मिले हैं और वहां मनुस्मृति विधान लागू है औऱ इसमें भी उग्रवादी तत्वों का साथ है।

पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत पर गायपट्टी के बाद कब्जा करने का यह हिंदुत्व एजंडा उग्रवादी संगठनों की मदद से पूरा किया जा रहा है तो समझा जा सकता है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रति संघपरिवार की प्रतिबद्धता कैसी है और उसके राष्ट्रवाद और देशभक्ति की असलियत क्या है।

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