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Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

यह अघोषित इमर्जेंसी है, जो इंदिरा गांधी की घोषित इमर्जेंसी से ज्यादा खतरनाक है

इमर्जेंसी की 44वीं सालगिरह पर लोकसभा में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi’s address in the Lok Sabha on the 44th anniversary of the Emergency) अगर इमर्जेंसी को याद नहीं करते, तो ही अचरज की बात होती। आखिरकार, 17वीं लोकसभा (17th Lok Sabha) में पहले से भी कमजोर हो गए विपक्ष में से भी मुख्य विपक्षी पार्टी को पीटने और हो सके तो अपने विरोधियों को विभाजित करने के लिए भी, इमर्जेसी के नाम से कारगर हथियार दूसरा नहीं हो सकता था।

… और जाहिर है कि इमर्जेंसी का जिक्र भाजपा और संघ परिवार की जनतंत्र के रक्षक की छवि बनाने का तो हथियार है ही। कहने की जरूरत नहीं है कि इस छवि के निर्माण के लिए जरूरी, बहुतों के आंखों देखे इस इतिहास का भी काफी ‘पुनर्लेखन’ संघ-भाजपा के प्रचारतंत्र और शासन के जरिए मीडिया तथा शिक्षा व शोध के ढांचे पर उनके बढ़ते नियंत्रण के सहारे कर लिया गया। इस छवि में संघ-भाजपा के नेता जनतंत्र के चमकदार योद्घा नजर आते हैं, निष्कलंक चांद की तरह।

जाहिर है कि आरएसएस के तत्कालीन सर संघचालक देवरस की चिट्ठयों के जरिए, इमर्जेंसी के दौरान ही इंदिरा गांधी के साथ सहयोग की पेशकशों से लेकर, संजय गांधी के बदनाम ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ के समर्थन तक और जगह-जगह बड़ी संख्या में संघ-जनसंघ नेताओं द्वारा जेल से छूटने के लिए दिए गए माफीनामों के सारे ‘कलुष’ को, अच्छी तरह से धो-पोंछकर मिटाया जा चुका है।

बहरहाल, विडंबनापूर्ण तरीके से नरेंद्र मोदी के राज में, संघ-भाजपा को ‘जनतंत्र रक्षक’ की इस छवि की जरूरत, पहले किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा है।

आखिरकार, इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी की ज्यादतियों और जुल्मों की याद दिलाना, नरेंद्र मोदी के राज में नया सामान्य बना दी गयी अघोषित इमर्जेंसी की लीपा-पोती करने के लिए बहुत उपयोगी है।

क्या इंदिरा गांधी की घोषित इमर्जेंसी की बड़ी रेखा के आगे, मोदी राज की अघोषित इमर्जेंसी की रेखा छोटी ही नजर नहीं आती है!

स्वाभाविक ही था कि प्रधानमंत्री मोदी 17वीं लोकसभा में अपने पहले संबोधन में, इमर्जेंसी के खिलाफ खूब गरजे-बरसे। ‘‘25 जून की रात, देश की आत्मा को कुचल दिया गया था।…किसी की सत्ता न चली जाए सिर्फ इसके लिए, उस आत्मा को कुचल दिया गया था।…न्यायपालिका का अनादर किया गया था। मीडिया पर ताला लगा दिया गया था’’ आदि।

बेशक इसके साथ प्रधानमंत्री ने यह भी जोड़ा कि, ‘‘आज 25 जून को लोकतंत्र के प्रति हमारे संकल्प को और ताकत से साथ समर्पित करना होगा।’’ यहां तक कि उन्होंने यह भी जोड़ा कि, ‘‘इस दाग को बार-बार इसलिए याद करने की जरूरत है ताकि फिर कोई ऐसा पाप नहीं कर सके।’’

लेकिन, अचरज की बात नहीं है कि इस रस्मी ‘पाप-निवारण’ जाप के अलावा, अपने दूसरे कार्यकाल के राष्ट्रपति के पहले अभिभाषण पर बहस के जवाब में प्रधानमंत्री के पूरे भाषण में, इसका कोई आश्वासन तो दूर, जरा सा इशारा तक नहीं था कि मोदी-1 में जनतंत्र को सिकोड़े जाने का जो सिलसिला तेजी से आगे बढ़ाया गया था, उसे मोदी-2 में और आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। उल्टे, उनका तो सारा जोर इसी पर था कि, ‘‘उसमें जो भी भागीदार रहे, यह दाग कभी मिटने वाला नहीं है।’’ यहां तक कि उन्होंने इसे दोहराना जरूरी समझा कि, ‘‘जो-जो भी इस पाप के भागीदार थे, ये दाग कभी मिटने वाला नहीं है।’’ न मिटने वाले दाग का सरल सा अर्थ यही है कि यह एक ऐसा हथियार है जिसकी मदद से वे अपने विरोधियों को पीटते रहेंगे और अपनी अघोषित इमर्जेंसी का रास्ता निरापद बनाते रहेंगे। अचरज नहीं कि प्रधानमंत्री के भाषण की एक ही टेक थी–और हमसे सवाल करते हैं! बेशक, मोदी-1 में भी उनके भाषणों की आम टेक यही थी।

फिर भी, मोदी-1 से मोदी-2 के बीच एक बदलाव जरूर आया है। मोदी-2 में सच को नकारने की महत्वाकांक्षा और भी बढ़ गयी है और इसके लिए मिथ्या सिद्धांतों का गढ़ा जाना भी।

संक्षेप में यह कि मोदी-2 के नरेंद्र मोदी, चौबीसो घंटे और तीन सौ पैंसठ दिन, चुनाव प्रचार के मोड में रहते हुए भी, एक राजनीतिक नेता से आगे एक राजनेता का स्वांग धारण करने की कोशिश करने जा रहे हैं।

जाहिर है कि कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया का बड़ा हिस्सा इस स्वांग के इशारों को लपकने के लिए तैयार बैठा है, जैसाकि चुनावी जीत के फौरन बाद आये प्रधानमंत्री के ‘अब सब का विश्वास’ जैसे जुम्लों के मामले में हुआ है। यह तब है जबकि मोदी-2 में खासतौर पर अल्पसंख्यकों व दलितों के मामले में ‘सब का विश्वास’ की जो दुर्गत होनी है, उसके पर्याप्त इशारे खुद प्रधानमंत्री के गृह-राज्य में दलित उप-सरपंच की बाकायदा चेतावनी देकर की गयी नृशंस हत्या से लेकर झारखंड से बंगाल तथा दिल्ली तक, मुसलमानों के खिलाफ भीड़ हिंसा तथा तबरेज की भीड़ हत्या से मिल गए हैं। लेकिन, इसके सिवा और कुछ होता भी कैसे?

नरेंद्र मोदी के एलान के मुताबिक तो ‘सब का विश्वास’ हासिल करने का रास्ता ही यह है कि अल्पसंख्यकों तथा अन्य कमजोर तबकों के मन में जो भेदभाव का झूठ उनके विरोधियों ने बैठा दिया है, उसे भेदा जाए!

वास्तव में यह तो सिद्घांत ही भेदभाव तथा उत्पीडऩ की सचाई को दफ्न करने का था।

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने इमर्जेसी की भयावहता का बखान करते हुए यह सिद्धांत पेश कर दिया कि, ‘‘भारत में लोकतंत्र संविधान के पन्नों से पैदा नहीं हुआ है। भारत में लोकतंत्र सदियों से हमारी आत्मा है।’’ अगर यह सिद्धांत एक स्वयंसेवक प्रधानमंत्री के मुंह से नहीं निकला होता तो इसे सिर्फ एक रिहटोरिकल दावा मानकर छोड़ा जा सकता था, जिसका मकसद यह दिखाना था कि इमर्जेंसी ने सिर्फ संविधान पर ही आघात नहीं किया था, यह देश की आत्मा पर भी आघात था। लेकिन, जब स्वयंसेवक प्रधानमंत्री यह दावा करता है कि ‘‘भारत में लोकतंत्र संविधान के पन्नों से पैदा नहीं हुआ है’’ आदि, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या यह भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में भी, प्राचीन धार्मिक ‘परंपरा’ को, संविधान के ऊपर बैठाने की ही कोशिश नहीं है?

यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रधानमंत्री का पितृ संघ परिवार, जब पश्चिम प्रेरित अंबेडकरी संविधान के मुकाबले भारत में जनतंत्र के कहीं पुराना होने का दावा करता है, तो इस ‘पुरानेपन’ के तर्क के बल से जनतंत्र को और ताकतवर बनाने के बजाए, वास्तव में जनतंत्र की आत्मा को ही नकारने वाले उसके ‘प्राचीन भारतीय मॉडल’ को ही आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा होता है। इस मॉडल के मूल स्वरूप का कुछ अंदाजा हमें वर्तमान आंबेडकरी संविधान के बुनियादी मूल्यों की, संविधान के स्वीकार किए जाने से ठीक पहले के वर्षों में आरएसएस की आलोचनाओं से लग सकता है।

संक्षेप में यह मॉडल मनुस्मृति का है, जिससे निकले ‘एक प्रधान’ के चरम रूप को सच करने में नरेंद्र मोदी लगे हुए हैं।

अचरज नहीं कि भारतीय जनतंत्र की संविधान के मुकाबले ‘बहुत प्राचीनता’ का यह तर्क, मोदी-2 के राज में संविधान के जरिए स्थापित जनतंत्र की व्यवस्थाओं को औपचारिक रूप से ज्यादा से ज्यादा कमजोर किए जाने के तर्क के रूप में सामने आए।

जाहिर है कि इस मुहिम में निशाने पर सबसे पहले तो संविधान का, धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र का बुनियादी ढांचा ही है।

अचरज की बात नहीं है कि इंदिरा गांधी द्वारा इमर्जेंसी में ही संविधान में संशोधन कर ‘धर्मनिरपेक्षता’ के संविधान के प्राक्कथन में जोड़े जाने को बहाना बनाकर, संघ परिवार धर्मनिरपेक्षता को बाकायदा संविधान से ही बाहर किए जाने की मांग करता रहा है। इस मांग का एक बड़ा मकसद, यह सरासर झूठी धारणा बनाना है जैसे 26 जनवरी 1950 को जो संविधान स्वीकार किया गया था, वह धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा हो और धर्मनिरपेक्षता का तकाजा उसमें बाद में जोड़ा गया हो। वास्तव में स्थिति इससे ठीक उल्टी है।

1970 के दशक के उत्तरार्द्ध की परिस्थितियों में और उससे भी बढ़कर अपने ही राजनीतिक-विचारधारात्मक स्वार्थों के लिए, इंदिरा गांधी को संविधान के प्राक्कथन में उसके ‘धर्मनिरपेक्ष’ चरित्र के उल्लेख की जरूरत पड़ी होने का मतलब सिर्फ इतना है कि इससे पहले, इसकी जरूरत महसूस नहीं की गयी थी।

सचाई यह है कि सौ साल से लंबे स्वतंत्रता आंदोलन की कोख से निकले भारत के संविधान की सभी नागरिकों की बराबरी पर टिकी जनतंत्र की मूल कल्पना में ही, धर्मनिरपेक्षता और संघवाद के मूल्य समाहित थे।

संविधान का बुनियादी ढांचा ही नहीं, अपवादस्वरूप आए इक्का-दुक्का तथा अपेक्षाकृत महत्वहीन प्रावधानों को छोड़ दिया जाए तो, संविधान के सभी प्रावधान भी इसी की गवाही देते हैं।

संघ परिवार शुरू से ही हमारे संविधान के आधार के रूप में जनतंत्र के खिलाफ और उससे भी बढ़कर उसकी परिभाषा के धर्मनिरपेक्ष तथा संघात्मक विस्तार के खिलाफ रहा है। ‘‘एक निशान, एक विधान, एक प्रधान’’ और ‘‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’’ जैसे नारे, आंबेडकरी संविधान से उसके इसी विरोध को दिखाते थे। बेशक, अब ये नारे ज्यों के त्यों नहीं दुहराए जाते हैं, फिर भी उनके पीछे के मूल्यों को और हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य को, संघ परिवार ने छोड़ा नहीं है और इसमें उसका राजनीतिक बाजू, भाजपा भी शामिल है। देश को अपने इस लक्ष्य की ओर धकेलते हुए वे वास्तविक अमल में, भारतीय राज्य को गैर-धर्मनिरपेक्षता की ओर धकेलने में लगे रहे हैं।

मोदी-1 के पांच सालों में भारतीय राज्य का काफी हद तक हिंदूकरण किया जा चुका है, जहां नौबत यहां तक आ गयी है कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर किसी भी अल्पसख्ंयक की नियुक्ति की कोलीजियम की सिफारिश को, अनिवार्य रूप से सरकार के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

मोदी-2 के पहले महीने में देश के विभिन्न हिस्सों में हुई सांप्रदायिक व जातिवादी हिंसा की और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकारी हमलों की घटनाएं गवाह हैं कि मौजूदा संविधान के रहते हुए भी, राज्य के इस हिंदूकरण को और तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

जाहिर है कि जनतंत्र को उतनी ही तेजी से सिकोड़ा और वास्तव में खोखला किया जा रहा होगा। आखिर, भारत जैसे समृद्घ धार्मिक, भाषायी, संस्कृतिक विभिन्नताओं वाले देश में, धर्मनिरपेक्षता या संघवाद का कमजोर किया जाना, जनतंत्र का ही नष्ट किया जाना है।

देश के सभी नागरिकों की शासन की नजरों में बराबरी सुनिश्चित किए बिना, जनतंत्र, जनतंत्र नहीं रह सकता है। लेकिन, जनतंत्र को ठीक ऐसे ही गैर-जनतंत्र में बदला जा रहा है। यही अघोषित इमर्जेंसी है, जो इंदिरा गांधी की घोषित इमर्जेंसी से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय की रक्षक होने का दावा करती है और इसीलिए ज्यादा मारक है तथा उसे शिकस्त देना भी ज्यादा मुश्किल है। फिर भी है तो इमर्जेंसी ही!

0 राजेंद्र शर्मा

This is an undeclared emergency, which is more dangerous than the declared Emergency of Indira Gandhi

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