किसानों ने की बी.आर.ए.आई. विधेयक वापस लेने की माँग

बी.आर.ए.आई. विधेयक के विरोध में जी.एम. मुक्त भारत गंठबंधन की सभा नई दिल्ली। भारत के 20 राज्यों से हजारों लोग आज जी.एम.ओ. और मॉनसैंटो को भारत से हटाने की माँग करने के लिये जंतर मंतर में दिन भर चली सभा के लिये एकत्रित हुये और संसद की ओर जुलूस निकाला, साथ ही स्पष्ट शब्दों में यह भी माँग की कि सरकार को भारतीय जैवप्रौद्योगिकी नियामक प्राधिकरण (बी.आर.ए.आई.) विधेयक, 2013 को वापस लेना चाहिये। कार्बनिक फैब्रिक से बनाया गया एक भारतीय ध्वज, जिसके उत्पादन में मॉनसैंटो कपास का प्रयोग नहीं किया गया, उसे कार्यक्रम के केन्द्र में रखा गया था; इस ध्वज को सभा ने भारत के प्रधान मंत्री को उपहार दिया और उनसे यह विनती की कि इस साल 15 अगस्त को इस गैर-मॉनसैंटो, गैर-बी.टी. कपास के ध्वज को फहराया जाए। प्रतिभागी समूहों ने काफी गर्व से इन गैर-बी.टी. भारतीय ध्वजों को लहराया और जतन के कपिल शाह ने कहा, ‘‘यह काफी शर्मनाक है कि स्वतंत्रता संग्राम के हमारे चिन्हों कपास और खादी को आज हमारी उदासीनता और निष्क्रियता के कारण अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा नियन्त्रित किया जा रहा है। इस स्वतंत्रता दिवस में हम उन सभी 20 राज्यों में गैर-बी.टी. कार्बनिक कपास के राष्ट्रीय ध्वज फहरायेंगे जहाँ से लोग इस धरना में शामिल हुए हैं; यह हमारी बीज सम्प्रभुता को फिर से प्राप्त करने की प्रतीकात्मक शुरूआत है। हम प्रधानमंत्री से भी इस साल लाल किले के प्राचीर पर इस ध्वज को फहराने का निवेदन करते हैं। संसद मार्ग पर यह विरोध ऐसे समय पर किया गया जब केन्द्र सरकार अपने पिछले (बजट) सत्र में संसद में जैवप्रौद्योगिकी नियामक प्राधिकरण (बी.आर.ए.आई.) बिल, 2013 को प्रस्तुत कर चुकी है। इस विधेयक ने संसद के अंदर और बाहर काफी विरोध का सामना किया है, क्योंकि यह हमारी कृषि और पर्यावरण में जी.एम.ओ. के जीव्र प्रवेष को आसान बना देगा। यह विधेयक एक केन्द्रीकृत एकल खिड़की सफाई तंत्र को स्थापित करने का प्रस्ताव देता है जिसे किसी निर्धारित जी.एम. उत्पाद के स्वतंत्र दीर्घकालिक सुरक्षा मूल्यांकन या आवष्यकता मूल्यांकन बिना जी.एम. फसल को स्वीकृति देने के लिये आने वाली रूकावटों को कम करने के लिये बनाया गया है। इसके अतिरिक्त, यह राज्य सरकारों से उनके संबंधित राज्यों में किये जाने वाले खुले क्षेत्र परीक्षणों की निर्णय शक्ति को भी हटा लेता है। इस विधेयक को सूचना के अधिकार अधिनियम का अधिरोहण करने का प्रस्ताव देने के कारण आर.टी.आई. समूहों का विरोध भी झेलना पड़ा है। यह विधेयक अब विज्ञान और तकनीक, पर्यावरण और वन की संसदीय स्थायी समिति की समीक्षा के तहत है। पश्चिम ओडिशा कृषक समन्वय समिति के सरोज मोहंती ने कहा, ‘‘भारत छोड़ो दिवस की 71वीं वर्षगांठ की इस शाम को हम पूरे देश से इकट्ठा हुये हैं क्योंकि जी.एम. तकनीक और मॉनसैंटो जैसी कम्पनियाँ हमारी बीज सम्प्रभुता और आजीविका के लिये खतरा बन रही हैं।’’ उन्होंने आगे कहा कि, ‘‘इतिहास में, वह ईस्ट इंडिया कम्पनी थी और अब हमारे सामने ‘‘ईट इंडिया कम्पनियाँ’’ हैं! हम यह माँग करते हैं कि ये कम्पनियाँ भारत छोड़ें और जी.एम. फसलों के प्रवेश को आसान बनाने के लिये लाये जा रहे बी.आर.ए.आई. विधेयक को वापस लेने और जी.एम.ओ. जैसी त्रुटिपूर्ण और खतरनाक तकनीकों के प्रचार को बंद करने की गुहार दृढ़ता के साथ भारत सरकार से लगाते हैं।’’ जी.एम. मुक्त भारत गठबंधन के सहसंयोजक राजेश कृष्णन ने कहा, ‘‘बी.आर.ए.आई. का विरोध न केवल किसानों या नागरिक समाजों द्वारा किया जा रहा है, बल्कि इसने सबसे अधिक विरोध ज्यादा राजनीतिक दलों से झेला है; एन.सी.पी. और कांग्रेस पार्टी के अंदर एक खंड के अतिरिक्त, सभी अन्य राजनीति समूह बी.आर.ए.आई. विधेयक के खिलाफ हैं। इसे हमारे ऊपर सूचना प्राप्ति को निषेध करने वाली, राज्यों की शक्तियों को घटाने वाली, लोगों के अदालत तक जाने के अधिकार को सीमित करने वाली इसकी धाराओं और स्पष्ट रूप से केवल जैवप्रौद्योगिकी उद्योगों के लिये लाभदायक आपत्तिजनक प्रावधानों के साथ धोपा जा रहा है।’’ जी.एम. फसलों के प्रतिकूल प्रभावों पर बढ़ते साक्ष्यों की ओर इषारा करते हुए स्थायी कृषि का प्रचार करने के लिये काम करने वाली संस्था, थनल के श्रीधर राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘यह जी.एम.ओ. के सुरक्षित होने के बारे में नहीं है। हर जगह से जी.एम.ओ. के साथ होने वाली समस्याओं के बारे में खबरें आ रही हैं। बढ़ती वैज्ञानिक रिपोर्टों में से नवीनतम, जिसमें जी.एम.ओ. के पर्यावरण रिलीज की विस्तृत समस्याओं के बारे में बताया गया है, वह उच्चतम न्यायालय (जी.एम.ओ. पर जनहित याचिका में) की तकनीकी विषेषज्ञ समिति (टी.ई.सी.) की अंतिम रिपोर्ट है। टी.ई.सी. ने स्पष्ट रूप से यह बताया है कि जी.एम. फसलों के खुले क्षेत्र के परीक्षणों को रोकना होगा और खाद्य फसलों में बीटी का आरम्भ करने के प्रयास भी ठीक नहीं हैं। इसके अतिरिक्त टी.ई.सी. ने यह भी कहा है कि शाक सहिष्णु (एच.टी.) जी.एम. फसलें, जिनमें से कई नियामक पाइपलाइन में हैं, भारत के लिये उपयुक्त नहीं हैं। पिछले साल कृषि पर संसदीय स्थायी समिति ने यह जोर दिया था कि जैवसुरक्षा का संरक्षण सर्वोपरि महत्व का है। संसदीय स्थायी समिति ने वर्तमान बी.आर.ए.आई. के स्थान पर व्यापक जैवसुरक्षा संरक्षण प्राधिकरण के निर्माण के लिये कहा था। क्यों सरकार इन अत्यंत विष्वसनीय रिपोर्टों को नजरअंदाज कर रही है और जी.एम.ओ. का प्रचार कर रही है और त्रुटिपूर्ण बी.आर.ए.आई. विधेयक पर जोर दे रही है?’’ जी.एम. मुक्त भारत गठबंधन के पंकज भूषण ने कहा, ‘‘भारतीय कृषि के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, जी.एम.ओ. के त्वरित समाषोधन को सुनिष्चित करने के लिये बी.आर.ए.आई. विधेयक का समाषोधन करना हमारे नागरिकों के हितों के लिये हानिकारक है। भारतीय किसान पहले ही मॉनसैंटो के ट्रेडमार्क बीटी कपास के द्वारा उसके बीजों और खेतों के अधिग्रहण के विनाशकारी परिणामों का अनुभव ले चुके हैं। हम जी.एम.ओ. और मॉनसैंटो जैसी बहुराष्ट्रीय बीज कम्पनियों के घातक आक्रमण के आगे अपने खाने और खेती का आत्मसमर्पण नहीं कर सकते हैं। इसी कारण से हम इन्हें भारत छोड़ने के लिये कहने के लिये आज यहां एकत्रित हुए हैं। बीज संप्रभुता का मुद्दा है और यह हमारा संघर्ष है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हमारे बीज और खाने में किसी और का नियंत्रण न हो सके।’’ बहुराष्ट्रीय बीज उद्योगों को भारत छोड़ने को एक मजबूत मामला बनाते हुये सतत एवं समग्र कृषि गठबंधन (आशा), की संयोजक और राष्ट्रीय महिला उच्चस्तरीय समिति की कार्यकर्ता कविता कुरूगंटी बताती हैं कि, ‘‘मॉनसैंटो ने हाल ही में यूरोप में, वहाँ सार्वजनिक अस्वीकृति का हवाला देते हुये, अपनी स्वेच्छा से अपने ट्रांसजेनिक उत्पाद अनुप्रयोगों को हटा लिया है; हम यहाँ मॉनसैंटो और ऐसे उद्योगों को यह बताना चाहते हैं कि भारतीय नागरिक भी उनके उत्पाद नहीं चाहते हैं। यह समय है जब वे यहाँ से भी चले जायें।’’ इस सभा ने देश के किसानों से महिला किसानों के उचित सम्मान के साथ और प्रकृति के अनुरूप कृषि पारिस्थितिकी खेती के पथ अनुसरण करने का निवेदन किया। विधानसभा ने भी यह माँग की है कि सरकार जी.एम.ओ. का प्रचार करना बंद करे और खाद्य तथा आजीविका सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये सतत कृषि समाधानों में तुरन्त निवेश करें। ‘‘सार्वजनिक क्षेत्र की कृषि आर.एंड.डी. प्रणाली को छोटे किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं के लिये उत्तरदायी और लोगों के प्रति जिम्मेदार किया जाना चाहिये। उन्होंने विज्ञान और तकनीक, पर्यावरण और वन की संसदीय स्थायी समिति से यह विनती की कि वे सरकार से बी.आर.ए.आई. विधेयक को वापस लेने की अनुशंसा करने के लिये इस विधेयक की समीक्षा करें। उन्होंने यह भी माँग की कि सभी राजनीतिक दलों को उन लोकतांत्रिक आवाजों की ओर ध्यान देना चाहिये जो कि हमारे खाने और खेती में जी.एम.ओ. का विरोध कर रहे हैं और पारिस्थितिकी खेती में अपने समर्पण की घोषण करनी चाहिये, और हमारे खाने, खेती और पर्यावरण में जी.एम.ओ. का विरोध करने के लिये दृढ़ता से खड़ा होना चाहिये। ‘‘यह वह समय है जब सभी राजनीतिक दल देश को यह बता दें कि वे किसान द्वारा नियंत्रित, सुरक्षित, वहनीय, कृषि-पारिस्थितिकी दृष्टिकोण के आधार पर स्थायी कृषि विकास की ओर खड़े हैं या नहीं।’’ इस सभा में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), समाजवादी पार्टी, बहुतन समाज पार्टी, बीजू जनता दल, तेलुगु देशम पार्टी आदि सहित विभिन्न राजनीतिक दलों से कई वरिष्ठ राजनीतिक नेता आयें, सभा को संबोधित किया और जी.एम. फसलों और बहुराष्ट्रीय बीज उद्योगों से खाने और कृषि को मुक्त रखने हेतु लोगों के इस संघर्ष का समर्थन करने की प्रतीज्ञा ली और संस में बी.आर.ए.आई. विधेयक का विरोध करने का वादा किया। देश की विविधताओं को प्रदर्शित करते हुये इस दिन के रंगीन और जीवंत कार्यक्रमों ने खाने, कृषि और स्वतंत्रता के इस समान संघर्ष पर भी प्रकाष डाला। गुजरात के किसानों ने एक गर्मजोशी भरे नाटक का प्रदर्शन किया, जबकि दिल्ली के विद्यार्थियों ने स्ट्रीट थियेटर और स्वयंसेवी कार्यों के माध्यम से यह बताया कि भारतीय युवा भी ट्रांसजेंसी को अस्वीकार करता है; केरल के युवाओं ने कृषि और खाद्य सुरक्षा के स्थायित्व के लिये पारिस्थितिकी कृषि पर गाना गया और विभिन्न राज्यों के नेताओं ने सभा को संबोधित किया। कई समूहों जैसे कर्नाटक के देशी बीज रक्षकों का समूह, बीज बचाओ आंदोलन और वृहि ने भारत में बीज विविधता की संपदा वैभव को प्रदर्शित किया, उस प्राकृतिक सम्पदा के वैभव को प्रदर्शित किया जो जी.एम.ओ. के लिये द्वार खुले होने पर खत्म या दूषित हो जायेंगी।

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