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क्या सैन्य और खुफिया तंत्र डेमोक्रेटिक पार्टी की शह से कई ‘लीक’करा रहा है ताकि ट्रंप की कुर्सी चली जाए ?

ट्रंप के सहयोगियों की विदाई
अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं कि उनकी करीबी टीम में वफादार लोग ही रहें. इस बारे में कोई संदेह होने पर वे सीधे बाहर का रास्त दिखा देते हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 13 मार्च को ट्विटर के जरिए यह घोषणा की कि अमेरिका के विदेश सचिव रेक्स टिलरसन को हटा दिया गया है. यह न सिर्फ टिलरसन का अपमान है बल्कि उस पद का भी है जिस पर वे थे. इसके बाद ट्रंप ने अटार्नी जनरल जेफ सेशंस के जरिए फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के डिप्टी डायरेक्टर रहे एंड्रयू मैकाबे को हटा दिया. वाइट हाउस से लगातार आलोचना झेलने की वजह से मैकाबे ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था और वे अपनी बची हुई छुट्टियों का इस्तेमाल कर रहे थे ताकि सेवानिवृत्ति के पहले वे 50 साल के हो जाएं. दूसरी घटना वफादारी नहीं निभाने की सजा जैसी लगती है. इससे यह संकेत भी मिलता है कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूस के दखल के मामले में रॉबर्ट मुलर की जांच को लेकर घबराहट का माहौल है. मुलर ने ट्रंप की कंपनियों के दस्तावेज के जांच के लिए रिट जारी किया है. इस जांच के जरिए इन कंपनियों के रूस से संबंधों को पता लगाया जाना है. उन्होंने वाइट हाउस को सवालों की एक सूची भी भेजी है. उम्मीद है कि इसके बाद खुद राष्ट्रपति से पूछताछ हो.



पत्रकार माइकल वॉल्फ की किताब फायर ऐंड फ्यूरीः इनसाइट दि ट्रंप वाइट हाउस जनवरी में आई थी. इस पुस्तक से यह पता चलता है कि ट्रंप के सहयोगी कुछ ही दिनों में यह समझ गए कि वे राष्ट्रपति पद के लायक नहीं हैं और आत्मुग्ध होने के साथ-साथ वे मानसिक तौर पर भी स्थिर नहीं हैं. यह पक्का है कि ट्रंप इससे वाकिफ थे. इसलिए कुछ ही दिनों के अंदर वाइट हाउस से उन्होंने अपने कई सहयोगियों को निकाला. आम लोगों के लिए चिंता का विषय यह है कि एक नव-फासिस्ट अमीर व्यक्ति राष्ट्रपति पद तक पहुंच गया है जो न सिर्फ नस्लभेद जैसी बुराइयों का समर्थन करता दिखता है. कोई यह नहीं कह सकता कि इसकी कोई उम्मीद नहीं थी. खास तौर पर तब जब पिछले चार दशक में अमेरिका में गैरबराबरी काफी तेजी से बढ़ी है और अभी सर्वोच्च स्तर पर है.

अमेरिका अर्थव्यवस्था ‘एक फीसदी का, एक फीसदी के द्वारा और एक फीसदी के लिए’है. इससे एक ऐसा सामाजिक माहौल तैयार हुआ कि ट्रंप जैसा व्यक्ति राष्ट्रपति बन गया. वे मानते हैं कि अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए उन्हें सभी कानूनी बंदिशों से मुक्त होना चाहिए. वे अमेरिका को भी वैसे ही चलाना चाहते हैं जैसे वे कंपनियों को प्रबंधन के शिखर पर बैठकर चलाते थे. चारलोटसेविले में विरोध-प्रदर्शन और अगस्त, 2017 में नस्लभेदी हिंसा के बाद ट्रंप ने नव-नाजियों की तारीफ की थी.

ऐसे में किसी के लिए कह पाना मुश्किल है कि ट्रंप ने क्या सोचकर उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन से मिलने का निर्णय लिया है. इस निर्णय के लिए उन्होंने उस वक्त के विदेश सचिव और रक्षा सचिव को भी भरोसा में लेना जरूरी नहीं समझा. संभव है कि उनकी योजना यह हो कि मिलने के बाद वार्ता को विफल करे और युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करें. उन्होंने सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के प्रमुख और अपने वफादार माइक पोंपियो को अपना नया विदेश सचिव बनाया है. अब चोटी का खुफिया अधिकारी अमेरिका की विदेश नीति का प्रतिनिधि होगा. सीआईए के टॉर्चर कार्यक्रमों की अगुवाई करने वाले व्यक्ति को सीआईए का निदेशक बनाया गया है.

सोवियत दौर गुजरने के बाद अमेरिका नाटो के जरिए बालकन, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में युद्ध में शरीक रहा है. यूक्रेन में तख्तापलट में भी उसकी भूमिका रही है. अब पूंजीवादी रूप अपना चुके रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया को खुद में मिला लिया और सीरिया में दखल देकर अमेरिकी हस्तक्षेप का मुकाबला करने की कोशिश की. अमेरिका वहां असद के खिलाफ चल रहे अभियानों का साथ दे रहा था. अब भी अमेरिका के सैन्य और खुफिया अधिकारी रूस को अपना दुश्मन मानते हैं. लेकिन ट्रंप प्रशासन उन अमेरिकी पूंजीपतियों की नुमाइंदगी करता है जो इस्लामिक स्टेट, ईरान, उत्तरी कोरिया और चीन को अमेरिका की परेशानी की मुख्य वजह मानते हैं.

पिछले डेढ़ साल में ट्रंप प्रशासन सैन्य और खुफिया तंत्र को अपने हिसाब से ढालने के लिए प्रयासरत है. लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली है. सच्चाई तो यह है कि सैन्य और खुफिया तंत्र डेमोक्रेटिक पार्टी की शह से कई ‘लीक’करा रहा है ताकि ट्रंप की कुर्सी चली जाए. महाभियोग के डर से ट्रंप अपनी टीम में सिर्फ वफादारों को ही बनाए रखना चाह रहे हैं. लेकिन न तो ट्रंप प्रशासन और न ही सैन्य और खुफिया तंत्र वैसी नीतियों के पक्ष में हैं जिससे अमेरिका और दुनिया में लोकतंत्र मजबूत होता हो. दुनिया भर में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए दोनों खतरनाक हैं.

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इकाॅनोमिक ऐंड पाॅलिटिकल वीकली EPW Hindi Editorials वर्षः 53, अंकः 12, 24 मार्च, 2018

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