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Punya Prasun Bajpai

पुण्य प्रसून बाजपेयी को है किसानों की खुदकुशी रोकने वाले बजट का इंतजार… पर सवाल है ऐसा हो पाएगा ?

नई दिल्ली, 05 जुलाई 2019. लोकसभा चुनाव 2019 के बाद मोदी सरकार पहला बजट (Modi government first budget after Lok Sabha Elections 2019) पेश करने जा रही है। मेधा के संकट से जूझ रहा मोदी जी के मंत्रिमंडल में अर्थशास्त्रियों का अकाल है। ऐसे में चर्चित एंकर पुण्य प्रसून बाजपेयी को किसानों की खुदकुशी (suicides of farmers) रोकने वाले बजट (Union Budget 2019: Live updates) का इंतजार है, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या जिस सरकार के पास अर्थशास्त्री ही न हो, वह ऐसा कर पाएगी ?

बहरहाल पुण्य प्रसून बाजपेयी ने अपने ब्लॉग में केंद्रीय बजट 2019 पर जो कुछ लिखा है उसके संपादित अंश हम यहां साभार दे रहे हैं –

वाकई ये सवाल तो है कि जब देश की सियासत में किसान-किसान की आवाज सुनायी देती है। सत्ता परिवर्तन से लेकर सत्ता बचाने के लिये किसान राग देश में गाया जा रहा हो। आने वाल वक्त में किसानों के संघर्ष के आसरे ही व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद-आस समाजसेवी जगाने में लगे हों, तब कोई पूछ बैठे कि क्या, 2019 का आम बजट ये वादा कर पाएगा कि आने वाल वक्त में किसान खुदकुशी नहीं करेगा ?

ये ऐसा सवाल है जिसे बजट के दायरे में देखा जाए या ना देखा जाए अर्थशास्त्री इसे लेकर बहस कर सकते हैं। लेकिन एक तरफ जब सरकार 2022-23 तक देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डालर तक पहुंचाने का वादा कर रही हो, तब उसका आधार क्या होगा। कैसे होगा ये तो कोई भी पूछ सकता है। क्योंकि दुनिया में भारत खेती पर टिकी जनसंख्या को लेकर नंबर एक पर है।

विश्व बैंक की एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 44 फीसदी जनसंख्या खेती पर टिकी है, जबकि अमेरिका-ब्रिटेन की सिर्फ एक फीसदी आबादी खेती से जुड़ी है। और एशिया में पाकिस्तान के 42 फीसदी तो बांग्लादेश के 40 फीसदी और श्रीलंका के 26 फीसदी लोग खती से जुडे हैं। और भारत के इकोनॉमी इन सब से बेहतर है। लेकिन खुदकुशी करते किसानों की तादाद भी भारत में नंबर एक है। सिर्फ महाराष्ट्र में हर तीसरे घंटे एक किसान खुदकुशी कर लेता है [ चार साल में 12000 किसानों ने खुदकुशी की ], तो देश में हर दूसरे घंटे एक किसान की खुदकुशी होती है।

… और देश का अनूठा सच ये भी है कि भारत की जीडीपी में 48 फीसदी योगदान उसी ग्रामीण भारत का है जहां 75 फीसदी लोग खेती से जुड़े हैं। तो फिर बजट से उम्मीद क्या की जाए ? क्योंकि 5 ट्रिलियन डालर इकोनॉमी का मतलब है उत्पादन की विकास दर 14.6 फीसदी हो जाए। कृषि विकास दर 10.1 फीसदी हो जाए। सर्विस क्षेत्र की विकास दर 13.7 फीसदी हो जाए। और जीडीपी की विकास दर 11.7 फीसदी हो। पर ये कैसे होगा कोई नहीं बताता।

हालांकि किसान की आय 2022 तक दुगुनी हो जाएगी, इसका राजनीतिक एलान पांच बरस पहले ही किया जा चुका है। लेकिन सच तो ये भी है किसान को फसल उगाने में जितने रकम खर्च होती है देश में एसएसपी उससे भी कम रहती है। मसलन हरियाणा को ही अगर आधार बना लें तो वहा प्रति क्विंटल गेहू उगाने में किसान का खर्च होता है 2047 रुपया लेकिन एसएसपी है 1840 रुपये प्रतिक्विंटल। एक क्विंटल काटन उगाने में खर्च आता है 6280 रुपये लेकिन काटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी है 5450 रुपये। इसी तरह एक क्विंटल मक्का को उगाने में खर्च आता है 2454 रुपये लेकिन एसएसपी है 1700 रुपये।

और देश में किसानी का सच तो ये भी है कि 2002 से 2015 तक किसानों की आय में वृद्धि 3.7 फीसदी रही है। और 2014 से 2018 के बीच कृषि जीडीपी ग्रोथ 2.9 फीसदी रही। यानी किसान की आय की वृद्धि की रफ्तार जब तक 15 फीसदी के हिसाब से नहीं बढ़ेगी तब तक दोगुनी आय कैसे होगी कोई नहीं जानता।

फिर आलम तो ये भी है कि गन्ना किसानों का बकाया तक देने की स्थिति में सरकार नहीं है। गन्ना मिल और राजनीति में शुगर लॉबी की रईसी किसी से छुपी नहीं है। और सरकार भी उन्हें कितनी राहत कितनी सब्सिडी देती है, ये सर्वव्यापी है, लेकिन यूपी में गन्ना किसानों का 10,183 करोड़ तो कर्नाटक में 1709 करोड़ और महाराष्ट्र में 1400 करोड़ रुपया बकाया है। और देश भर में गन्ना किसानों का बकाया 21000 करोड़ से ज्यादा का है।

तो बजट को कैसे परखा जाए ये सवाल तो हर जहन में होगा, क्योंकि देश में 5 करोड किसान बैंक से कर्ज लेने पहुंचते हैं, लेकिन कर्ज की रकम दस हजार पार नहीं करती कि उनके घर से बकरी-गाय तक उठाने बैंककर्मी पहुंच जाते हैं। यहां तक कि जमीन पर भी बैंक कब्जा कर लेती है और बैंक के बाहर किसानों की तस्वीर भी चस्पा कर दी जाती है। लेकिन इसी दौर में कोई कारपोरेट-उद्योगपति या व्यापारी बैंक से कर्ज लेकर ना लौटाने का खुला जिक्र कर ना सिर्फ बच जाता है, बल्कि सरकार ही उसकी कर्ज ली हुई रकम अपने कंधों पर ढोने के लिये तैयार हो जाती है।

आलम ये है कि बैकों से कर्ज लेकर ना लौटाने वालों की तादाद बरस दर बरस बढ रही है। 2014-15 में 5349 लोग थे तो 2016-17 में बढकर 6575 हो गये और ये बढ़ते-बढ़ते 2018-19 में 8582 हो चुकी है।

और तो और मुद्रा लोन के तहत भी एनपीए बीते एक बरस में 68 फीसदी बढ़ गया। 9769 करोड से बढ़कर 16,480 करोड हो गया। तो क्या बजट सिर्फ रुपये के हेर फेर का खेल होगा। जिसमें कहां से रुपया आयेगा और कहां जाएगा इसको लेकर ही बजट पेश कर दिया जाएगा। क्योंकि अमेरिका की कतार में खड़े होने की चाह लिये भारत ये भी नहीं देख पा रहा है कि जिस अमेरिका में सिर्फ एक फीसदी लोग किसानी से जुड़े हैं, उनके लिए भी 867 बिलियन डालर का विधेयक [ फर्म बिल 2019-28 ] लाया गया। जिसमें पोषण से लेकर बीमा और जमीन के संरक्षण से लेकर समुदायिक समर्थन तक का जिक्र है।

ऐसा भी नहीं है कि सरकार की समझ अब किसानी छोड़ टेकनोलॉजी पर जा टिकी हो। तो बजट में उसका जिक्र होगा। सच तो ये है कि टॉप 15 इंटरनेट कंपनियां 30 लाख करोड़ का कारोबार कर रही हैं और उनसे टैक्स वसूलने की हिम्मत सरकार कर नहीं पा रही है। गूगल ने ही 2015-16 में भारत में 6000 करोड़ का कारोबार बताया, लेकिन बिसने वर्ल्ड ने इस आंकडे को 4.29 लाख करोड़ बताया। अगले दो बरस में ई-कामर्स का बजट भारत में 200 बिलियन डालर हो जाएगा, लेकिन बजट बेफिक्र रहेगा और ईस्ट इंडिया की गुलामी से उबर चुका भारत अब इंटरनेट कंपनियों की गुलामी के लिये तैयार है।

और आखरी सच तो देश का यही है कि जिस महाराष्ट्र में बारिश ने कहर बरपा दिया, मुबंई पानी-पानी हो गई, फ्लाइट रुक गई, रेलगाड़ी थम गई, सत्ता का गलियारा बारिश में तैरता दिखा, बिजली के करंट और दीवार गिरने से 50 से ज्यादा मौत हो गईं, उस मुंबई के मेयर ये कहने से नहीं चूकते कि मुंबई में पीने का पानी खत्म हो चला है।

मराठवाडा-विदर्भ में भी पानी नहीं है। तो फिर किसानों की खुदकुशी का जिक्र किए बगैर कैसे किसानों का हित साधने वाला बजट आने वाला है इसका इंतजार आप भी कीजिए…हम भी करते हैं।

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