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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भंग : उच्च शिक्षा बाजार के हवाले

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भंग : उच्च शिक्षा बाजार के हवाले

उच्च शिक्षा आयोग : नौ दिन चले अढ़ाई कोस

ऋषभ कुमार मिश्र

हाल में भारत सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के स्थान पर उच्च शिक्षा आयोग की स्थापना और विकास का मसौदा प्रसारित किया गया है। इस मसौदे पर उच्च शिक्षा के भागीदारों की राय आमंत्रित की गयी है। विश्वविद्यालय के अध्यापक की भूमिका में जब इस मसौदे को देखता हूं तो प्रथम दृष्टया यह पहल दर्शाती है कि सरकार उच्च शिक्षा की स्थिति से चितिंत है और इसमें सुधार का रास्ता तलाश रही है। सरकार की चिंता के कारणों को इस मसौदे के लक्ष्यों के विलोम रूप में देख सकते हैं। उच्च शिक्षा की चिंताओं को ‘गुणवत्ता के अभाव‘ विशेषण द्वारा परिभाषित किया जा रहा है। इस विशेषण के अंतर्गत शिक्षण का कमजोर स्तर, शोध की लचर व्यवस्था, रोजगार पैदा करने की अक्षमता आदि संकेतक गिनाये जा रहे हैं।



समझें गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाले घटकों को

इस मसौदे के आधार पर गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले घटकों को समझने की कोशिश करते हैं। इसके अनुसार गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए शिक्षण के अंतिम लक्ष्य (आउटकम) निर्धारित हों, शोध, आकलन और शिक्षण की कसौटियां हों, अकादमिक प्रदर्शन का वार्षिक आधार पर आकलन हों और शोध को उत्प्रेरित किया जाए।

इन सकारात्मक प्रोत्साहनों के साथ निर्धारित मानकों का पालन न करने वाले संस्थानों के विरूद्ध कानूनी दंड का भी प्राविधान है। गुणवत्ता के इन पैमानों के संदर्भ में प्रथम पैराग्राफ में ही एक समान विकास का लक्ष्य रखा गया है।



उल्लेखनीय है कि गुणवत्ता संदर्भ सापेक्ष होती है। यदि कोई विश्वविद्यालय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए समर्पित है तो उसका मानदंड उस विश्वविद्यालय से अलग होगा जो हिंदी, उर्दू या किसी अन्य भाषा के लिए समर्पित है। इसी तरह कोई विश्वविद्यालय दुर्गम क्षेत्र में स्थित है या ऐसे स्थान पर है जहां प्रथम पीढ़ी के अधिगमकर्ता आ रहे हैं तो उसकी गुणवत्ता के निर्धारण का पैमाना ऐतिहासिक दृष्टि से परिपक्व संस्थानों से अलग होगा। वर्तमान में गुणवत्ता आकलन की यही सीमा है। हर संस्थान को एक ही जैसे मानकों द्वारा मूल्यांकित किया जा रहा है। देखना है कि यह आयोग से इस सीमा से कैसे पार पाता है?

इसके अतिरिक्त अध्ययन क्षेत्रों के अनुरूप गुणवत्ता निर्धारण के लिए इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन, कृषि जैसी विशेषीकृत शिक्षा के संदर्भ में इस आयोग की स्थिति स्पष्ट नहीं है। उक्त क्षेत्रों के लिए अलग-अलग संस्थाएं विकसित करना जहां सामान्य से विशिष्ट के सिद्धान्त की ओर था वहीं इस आयोग द्वारा पुनः विशिष्ट से सामान्य की ओर बढ़ रहे हैं। यदि इस दस्तावेज में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के प्रक्रियात्मक पहलुओं का अवलोकन करें तो आप पाएगें कि अधिकांश मुद्दे गवर्नेंस से जुड़े हैं जहां अध्यापकों और विद्यार्थियों पर अपेक्षाओं का बोझ और बाह्य निगरानी की व्यवस्था है। इस निगरानी को उच्च शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति की शर्त बताया जा रहा है जबकि इसमें अध्यापकों और विद्यार्थियों का पक्ष न के बराबर है। ऐसी स्थिति में अध्यापक केवल निर्धारित लर्निंग आउटकम या अन्य कसौटियों के क्रियान्वयक हो जाएगें। कौन इनकी मदद करेगा? जमीनी स्तर पर इनकी चुनौतियों को आकलन और तद्नुरूप नीति निर्माण आदि पर भी विचार करने की आवश्यकता है। इस निहितार्थ की आलोचना में ‘स्वायत्तता‘ का शगूफ़ा छोड़ा जा सकता है। लेकिन यह मत भूलिएगा कि उच्च शिक्षा व्यवस्था भी अफसरशाही की तरह सीनियर-जूनियर के मकड़जाल में फंस चुकी है। ऐसी स्थिति में युवा और अपेक्षाकृत कम अनुभवी अध्यापकों का समूह(जो कुल अध्यापकों का बड़ी आबादी हैं) केवल वरिष्ठों से छने हुए लाभों को प्राप्त करेंगे। अन्ततः न तो वे खुद अभिप्रेरित हो पाएगें न ही अपने विद्यार्थियों को अभिप्रेरित कर पाएगें। इसके समान्तर विश्वविद्यालयों या अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में रिक्त पदों की बड़ी संख्या, उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रही आबादी को समायोजित करने की समस्या, अध्यापकों के समयानुसार प्रमोशन आदि की समस्याओं पर भी यह मसौदा किसी खास बदलाव की उम्मीद नहीं प्रस्तुत करता है। जान पड़ता है कि ये पक्ष इसके कार्यक्षेत्र में ही नहीं है। यदि होंगे भी तो इसकी भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता है। आयोग की यह सीमा इसे सहयोगी या उत्प्रेरित करने वाले संस्थान के बदले सलाहकार मात्र बना देगी।

नुकसान होगा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भंग करने से

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या उच्च शिक्षा में सुधार के लिए एक संस्थानिक तंत्र के बदले दूसरे संस्थानिक तंत्र की स्थापना एकमात्र विकल्प है? क्या ऐसे विकल्प के लिए वर्तमान अभ्यासों का कोई मूल्यांकन किया गया? विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की असफलता या निम्न प्रभावशीलता को पुष्ट करने वाली कोई रिपोर्ट आयी? और यदि ऐसे कोई प्रमाण हैं तो वर्तमान व्यवस्था का इलाज करने के बदले नई व्यवस्था को जन्म देने का उपाय बचाव की रणनीति है जो वर्तमान की ज्वलंत समस्याओं से ध्यान भटकाने के काम आयेगी। किसी ठोस प्रमाण के अभाव में एक कार्यकारी संस्था को भंग करना कुछ खास लोगों के व्यक्तिगत मत को थोपने के समान है। इस निर्णय का तात्कालिक नुकसान होगा कि उच्च शिक्षा की हर योजना एक लंबी अवधि के लिए लंबित हो जाएगी। जब तक आयोग अपनी कार्यप्रणाली और संस्कृति को विकसित नहीं कर लेगा तब तक उच्च शिक्षा में अनिश्चितता और अस्पष्टता बनी रहेगी। उच्च शिक्षा से जुड़े तात्कालिक मुद्दे गौण हो जाएगें। सरकार से लेकर आम शिक्षक और विद्यार्थी इस संस्था के ‘ट्रायल और एरर‘ के भुक्तभोगी होंगे। इस आयोग की स्थापना के बाद अकादमिक मामले और वित्तीय अनुदान अलग-अलग एजेंसियों द्वारा देखे जाएगें। इस दशा में किसी भी योजना के क्रियान्वयन के लिए दो चैनलों से गुजरना होगा। यदि किसी कारण से इनमें विरोधाभास हो जाए तो उसके परिणाम की कल्पना आप कर सकते हैं। इसके अलावा वित्तीय शक्तियों के सीमित रहने की दशा में यह आयोग ‘आइवरी टॉवर‘ मात्र रह जाएगा। मानव संसाधन मंत्रालय ‘बिग ब्रदर‘ की भूमिका में हावी रहेगा। उसका हावी होना केवल प्रबंधकीय मामला नहीं है। इसके द्वारा विश्वविद्यालयों की राज्य पर प्रत्यक्ष निर्भरता बढ़ेगी। सरकार द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भेदभाव करने की गुंजाइश बढ़ेगी। अन्ततः उच्च शिक्षा केन्द्र राजनीतिक हस्तक्षेप और जोड़तोड़ के गढ़ बन जाएगें। जिस स्वायत्तता की बात की जा रही है उसे संस्थागत स्तर पर विश्वविद्यालय स्वयं तय कर सकते हैं। आयोग द्वारा इन्हें तय करना विकेन्द्राकरण के बदले केन्द्रीकृत प्रणाली को जन्म देगा जिसका परिणति लालफीताशाही में होगी। अन्ततः देश के सभी उच्च शिक्षा केन्द्र इस आयोग के सर्कुलरों द्वारा संचालित होगें।

उच्च शिक्षा में बाजार का रास्ता

वर्तमान के प्रतियोगी वैश्विक माहौल में इस आयोग का प्रस्ताव उच्च शिक्षा में बाजार का रास्ता खोलने की संभावना लिये हुए है। आयोग की स्थापना के मसौदे में नियंत्रित वृद्धि और विस्तार का प्रस्ताव है। लेकिन अनुदान की शक्ति मंत्रालय के पास है। इस दशा में राज्य प्रायोजित संस्था की स्थापना की प्रायिकता कम होगी। केवल स्थापित संस्थाओं के गुणवत्ता संवर्धन पर जोर होगा जिसके लिए प्रदर्शन में सुधार उपागम का सहारा लिया जाएगा। यह सुधार संसाधनों के अभाव में कैसे संभव होगा? यह विचारणीय है। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए आयोग की निगरानी में उच्च शिक्षा का प्रबंध और व्यवस्था करने वाले निजी संस्थान आएगें जो गुणवत्ता तो सुनिश्चित करेंगे लेकिन विद्यार्थियों से उसकी कीमत भी वसूलेगें। ध्यान रखना चाहिए कि भारत में उच्च शिक्षा के प्रसार की प्रमुख चुनौती इसकी लागत है। राज्य के हस्तक्षेप और पोषण के कारण विद्यार्थियों के लिए इसकी लागत कम रही है। कम लागत के कारण युवाओं की आबादी का बड़ा हिस्सा उच्च शिक्षा तक पहुंचा है। आशंका है कि उक्त आयोग की भूमिका उच्च शिक्षा में अवसरों की उपलब्धता का संतुलन भुगतान करने वालों के पक्ष में स्थानान्तरित न कर दें। इसके अलावा उच्च शिक्षा के क्षेत्रीय असंतुलन को कैसे संबोधित किया जाएगा? इस पर भी किसी ठोस प्रक्रियात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। प्रतिष्ठित और विकसित संस्थानों की दृष्टि से यह मसौदा लुभावना लगता है लेकिन जो संस्थान, शिक्षक और विद्यार्थी देश के दूर-दराज के इलाकों में सीमित संसाधनों के सहारे किसी तरह उपाधि के लिए संघर्ष कर रहे हैं उनके संदर्भ की उपेक्षा उच्च शिक्षा आयोग को दिल्ली-केन्द्रित बौद्धिक विलास संस्थान में तब्दील न कर दें!



ऋषभ कुमार मिश्र

सहायक प्रोफेसर शिक्षा विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा

 

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