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वादा फ़रामोशी : सरकारी वादों की मुकम्मल पड़ताल

Vada Faroshi Facts not fictions based on RTI शशि शेखर, संजॉय बसु और नीरज कुमार की किताब 'वादा फ़रामोशी पढ़िए'

राहुल गांधी (Rahul Gandhi), कॉमरेड कन्हैया कुमार (Comrade Kanhaiya Kumar), आरजेडी नेता तेजस्वी यादव (RJD leader Tejashwi Yadav), समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव (Samajwadi Party President Akhilesh Yadav), जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन और झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार, इन तमाम नेताओँ में एक बात कॉमन है। ये नेता अपनी हर सभा में कहते हैं कि मोदी नहीं मुद्दों पर वोट करिए। लेकिन सवाल ये है कि मुद्दा है क्या? क्या इस बार के लोकसभा चुनाव 2019 में असली मुद्दों (Real issues in Lok Sabha elections 2019) की बात हो रही है? क्या एक पूर्ण बहुमत वाली मजबूत सरकार से उसके 5 सालों का हिसाब लिया जा रहा है? जी नहीं असली मुद्दे नेपथ्य में हैं उन्हें सामने लाने की दरकार है।

एक ऐसे वक्त में जब मीडिया की भूमिका (role of media) सरकार के प्रचार से ज्यादा कुछ रह नहीं गई हो, आम वोटर्स मोदी सरकार के काम-काज की सही पड़ताल कैसे करे? इसका जवाब ये है कि आप ‘वादा फ़रामोशी पढ़िए’। शशि शेखर, संजॉय बसु और नीरज कुमार ने इस क़िताब को काफी मेहनत से तैयार किया है। आरटीआई के जवाब में सरकार की तरफ से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के जरिए, सरकार को उसी के वादों की तराजू पर तौलने की कोशिश ‘वादा फ़रामोशी की शक्ल में हमारे सामने’ है। अगर आपके इलाक़े में वोट नहीं पड़े हैं तो वोट डालने से पहले एक बार इस क़िताब को जरूर पढ़ें।

ये क़िताब हमें बताती है कि नेशनल गंगा काउंसिल जिसके अध्यक्ष खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं की एक भी बैठक नहीं हुई है। 2014 में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने राष्ट्रीय गोकुल ग्राम योजना की शुरुआत की जिसके तहत 20 गोकुल ग्राम बनाने की बात थी। इन गांवों में दुधारू के साथ-साथ बूढ़ी और बीमार देशी गायों के रख रखाव का इंतजाम होना था । लेकिन अब तक देश में केवल 4 गोकुल ग्राम तैयार हो पाए।

ये पुस्तक बताती है कि कैसे सरकार ने निर्भया फंड की पूरी राशि सही तरीके से रिलीज नहीं की और कैसे बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में फंड के बावजूद किसी भी ज़िले में महिला शक्ति केंद्र यानी डिस्ट्रिक्ट लेवल सेंटर फॉर वूमेन शुरू नहीं किया जा सका। यानी गाय और गंगा के साथ-साथ बेटी बचाओ के लिए भी सरकार गंभीर नहीं रही।

Pradhan Mantri Matru Vandana Yojana In Hindi

सबसे बुरा हाल है प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का जिसमें सरकार ने देश भर में गर्भवती महिलाओं को 5 हज़ार की सहायता देने की बात की थी। इसमें 30 नवंबर 2018 तक क़रीब 1656 करोड़ रूपये जारी किए गए लेकिन इस पैसे को बांटने के लिए 6966 करोड़ रूपये प्रशासनिक प्रक्रियाओं में खर्च कर दिए गए। ओडिशा में 2 साल में इस योजना का लाभ केवल 5 महिलाओं को यानी 25 हज़ार रूपए मिला और सरकार ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं में खर्च कर दिए तक़रीबन 275 करोड़। यानी सरकार ने सहायता राशि बांटने के लिए तक़रीबन साढ़े चार गुणा खर्च किया।

“Beti Bachao, Beti Padhao Yojana”

इस क़िताब को पढ़कर पता चलेगा कि कैसे युवा लड़कियों के कौशल विकास में लाभार्थियों की तादाद मोदी सरकार आने के बाद  क़रीब 6 गुणा कम हो गई। चौकानें वाली बात ये भी है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना में सरकार ने 2014 से लेकर 2018 तक केवल 39.49 करोड़ की राशि ही रिलीज की जबकि योजना के प्रचार प्रसार में अबतक करीब 209 करोड़ खर्च कर दिए गए।

क़िताब के जरिये एक और अहम खुलासा ट्राइबल सब प्लान को लेकर किया गया है। दरअसल इसके तहत हर मंत्रालय को अपने बजट का कुछ हिस्सा ट्राइबल सब प्लान में देना होता है जिसे आदिवासियों के कल्याण और विकास में खर्च किया जाना है। लेकिन पुस्तक पढ़कर आपको हैरानी होगी कि जनजाति वर्गों के विकास का पैसा उनके खिलाफ ही खर्च किया जा रहा है। मसलन सरकार इस पैसे को वहां खर्च कर रही है जिसका आदिवासियों से कोई लेना देना नहीं है या फिर इस रकम को आरकोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को दे रही है ताकि वो नई जगह पर खनिज का पता लगाकर वहां से जनजातियों को उजाड़ सके। यानी विकास का पैसा उनके विनाश के लिए लगाया जा रहा है।

किताब के जरिये हमें हैरान करने वाली जानकारी मिलती है कि सरकार एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय की स्थापना के लिए किस कदर लापरवाह है। कैसे वन बन्धु कल्याण जैसी महत्वाकांक्षी योजना महज जुमला बनकर रह गई और कैसे नोटबन्दी के दौरान उपजे लोगों के असन्तोष को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना का भ्रम जाल फेंक गया?

भारत की लाइफ लाइन रेलवे के बारे में भी किताब हैरान कर देने वाली आंकड़े बताती है। मसलन कैसे मोदी सरकार आने के बाद रद्द ट्रेनों की तादाद में बढ़ोतरी हुई, कैसे साल दर साल सफर करने वाले यात्रियों की तादाद कम हो रही है। किस तरह सरकार हर साल केवल 3.5% रेलवे ट्रैक का ही नवीकरण कर पा रही है। नया ट्रेक बिछाने के नाम पर सरकार केवल खानापूर्ति कर रही है। और रेलवे में बड़े पैमाने पर निवेश के जो दावे थे वे भी जुमले साबित हुए। 5 साल बीतने के बाद भी पीपीपी मॉडल के तहत रेलवे स्टेशन के विकास का वादा भी खोखला ही साबित हुआ।

बाकी विभागों की तरह नगर विमानन मंत्रालय ने भी आंकड़ों की बाजीगरी करने में कोई कमी नहीं की। इस क़िताब में सरकारी आंकड़ों के जरिये ये बताया गया है कि प्रधानमंत्री ने देश के एयरपोर्ट की संख्या को लेकर कितना बड़ा झूठ बोला?

ज्यादातर योजनाओं को छूते हुए पुस्तक ने लम्बी पड़ताल की है। किसी भी लोकतंत्र के एक बेहतर और जिम्मेदार नागरिक होने के लिए इन आंकड़ों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।

-राजेश कुमार

(लेखक टीवी पत्रकार हैं।)

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