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पुरुष इनफर्टिलिटी : बिना सर्जरी वेरीकोसील का काम तमाम

पुरुष इनफर्टिलिटी (Male infertility) का एक बड़ा कारण है वेरीकोसील (varicocele)

ये ठीक है कि हमारा देश जनसंख्या की लगातार बढ़ती जा रही दर से परेशान है और सरकार इस पर लगाम लगाने के लिए बड़े स्तर पर सक्रिय है. लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पक्ष भी है

जो इनफर्टिलिटी क्लीनिक्स में लगातार बढ़ती जा रही भीड़ से उजागर होता है. उम्र के एक विशेष पड़ाव पर अगर किसी वैवाहिक जोड़ी को माता-पिता बनने का सुख प्राप्त नहीं होता तो वह एक बहुत बड़ी पारिवारिक एवं व्यक्तिगत परेशानी का कारण हो जाता है. लेकिन समस्या यह है कि विशेष रूप से पुरुष, इस समस्या पर बात करने या चिकित्सक के पास जाने से हिचकते हैं. हालांकि, कई बार बहुत मामूली कारणों से भी इंफर्टिलिटी की समस्या पैदा हो सकती है. अब पुरुषों में पायी जाने वाली वेरीकोसील की समस्या को ही देखें।

10 प्रतिशत पुरुष इनफर्टिलिटी की समस्या से ग्रस्त 10 percent men suffer from infertility problem

अध्ययन बताते हैं कि लगभग 10 प्रतिशत पुरुष इस समस्या से ग्रस्त हैं। जहां तक नि:संतान दंपत्तियों का सवाल है तो उनमें से लगभग 30 फीसदी ऐसे हैं जो पति की वेरीकोसील से जुड़ी हुई समस्या के कारण संतान प्राप्ति नहीं कर पाते हैं।

क्या है वेरीकोसील (What is varicocele) और उम्र के किस पड़ाव पर पुरुष इसके शिकार बनते हैं ?

वेरीकोसील टेस्टिकल और स्क्रोटम की वेरीकोन नसें हैं जिनमें सूजन आ जाना कभी भयानक दर्द तथा कभी संतानहीनता का कारण बन जाता है. आमतौर पर 15 वर्ष से 35 वर्ष की आयु के बीच पुरुष इसका शिकार बनते हैं.

वेरीकोज नसों में वॉल्व होते हैं जो रक्त को अंडकोश (टेस्टिकल्स) तथा स्क्रोटम से ह्रदय की ओर ले जाते हैं। जब ये वॉल्व काम नहीं करते तब रक्त एक ही स्थान पर जमा हो जाता है जिससे स्क्रोटम में मौजूद अण्डकोश के आस-पास की नसें फूल जाती हैं और वेरीकोसील की समस्या पैदा हो जाती है. इस समस्या से ग्रस्त लोगों में वीर्य बनना बंद हो जाता है.

अध्ययनों से पता चला है कि वेरीकोसील का इलाज होने के बाद 50 से 70 प्रतिशत तक मरीजों में वीर्य बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

मजे की बात है कि कई बार वेरीकोसील से मरीज को जरा सी भी तकलीफ नहीं होती जब कि कई बार इतना भयानक दर्द होता है कि मरीज खड़ा भी नहीं रह पाता। कई बार भारी वजन वाला कोई सामान उठाने पर इसके लक्षण उभर आते हैं।

varicocele surgery

इस समस्या के निदान (varicocele diagnosed) के लिए ओपेन सर्जरी की तकनीक बहुत पहले से अपनायी जाती रही है। यह शल्य चिकित्सा यूरोलॉजिस्ट द्वारा की जाती है.

इस प्रक्रिया के अंतर्गत यूरोलॉजिस्ट चीरा लगाकर काम नहीं कर रही धमनियों का पता लगाता है और फिर उन्हें बांध देता  है ताकि सही तरह से काम रही धमनियों के माध्यम से रक्त ह्रदय की ओर वापस लौटे. लेकिन इस सर्जरी के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि मरीज को स्वस्थ होने में बहुत लंबा समय लगता है. इससे जुड़ा एक खतरा यह भी है कि इससे हाइड्रोसील की समस्या पैदा हो सकती है. इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी उपचार की स्थिति में इस तरह का कोई खतरा नहीं रहता.

varicocele treatment

वेरीकोसील की समस्या से निजात दिलाने के क्रम में एंबोलाइजेशन एक बहुत ही कामयाब तकनीक साबित हुई है. नई दिल्ली के वसंत कुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल के प्रमुख इंटरवेशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप मुले के अनुसार वेरीकोसील एंबोलाइजेशन (varicocele embolization in delhi) एक गैर-शल्य चिकित्सकीय प्रक्रिया है जो कि वेरीकोसील के इलाज की दृष्टि से बहुत ही असरदार है. इसमें मरीज को कुछ घंटों तक ही डाक्टरी निगरानी में रखना पड़ता है. उसके बाद वह घर लौट सकता है और अपनी दिनचर्या भी शुरू कर सकता है.

इस वाह्यरोगी निदान (आउटपेशेंट ट्रीटमेंट) के अंतर्गत इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट कैथेटर को शरीर के अंदर डालने के लिए इमेजिंग की सहायता लेता है.

हल्के सेडेशन और लोकल एनेस्थीसिया के बाद मरीज तनाव मुक्त हो जाते हैं और उन्हें किसी तरह के दर्द का एहसास नहीं होता.

इस गैर-शल्य चिकित्सकीय प्रक्रिया के अंतर्गत इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट लोकल एनेस्थीसिया के प्रयोग के बाद पेट के निचले हिस्से में पेंसिल की नोंक के बराबर एक छेद करता है. इसके बाद एक पतले से कैथेटर को फेमोटरल वेन के रास्ते सीधे टेस्टीकुलर वेन तक ले जाया जाता है.

डॉ. प्रदीप मुले का कहना है कि इसके बाद शल्य चिकित्सक कंट्रास्ट डाई को इंजेक्ट करता है ताकि इमेंजिंग के सहारे इस बात का पता लगाया जा सके कि समस्या वास्तव में कहां है और नस को ठीक किस स्थान पर अवरोधित करना है. इंटरवेंसनल रेडियोलॉजिस्ट तब तार, बैलून, छोटे टुकड़ों अथवा स्लेरोजिंग एजेंट का उपयोग करते हुए धमनियों के रक्त प्रवाह को अवरोधित कर देता है. इससे वेरीकोसील पर दबाव कम हो जाता है खराब एवं अक्षम धमनियों के बंद होने के बाद रक्त प्रवाह दूसरे रास्ते से होने लगता है. इस तरह से अपना काम ठीक से नहीं कर रही धमनी को आंतरिक रूप से बंद कर दिया जाता है जिससे रक्त प्रवाह सामान्य होने लगता है और मरीज के वीर्य बनने की प्रक्रिया (Semen process) भी सामान्य हो जाती है।

राजेंद्र कुमार राय

(यह खबर मूलतः देशबन्धु पर 2011-08-01 को प्रकाशित हुई थी, उसके संपादित अंश)

नोट – यह समाचार किसी भी हालत में चिकित्सकीय परामर्श नहीं है। यह समाचारों में उपलब्ध सामग्री के अध्ययन के आधार पर जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई अव्यावसायिक रिपोर्ट मात्र है। आप इस समाचार के आधार पर कोई निर्णय कतई नहीं ले सकते। स्वयं डॉक्टर न बनें किसी योग्य चिकित्सक से सलाह लें।)

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