सुकमा : ‘देश’ पर हमला ! तो क्या अब सीआरपीएफ या एनडीए-2 ही देश हैं?

बदला नहीं समाधान की बात हो

शाहनवाज आलम

पिछली सदी की आखिरी दहाई के शुरूआत से आयी आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के साथ एक समाज के बतौर हमारे राजनीतिक व्यवहार में जो एक अहम बदलाव आया, वो ये था कि हम पहले से ज्यादा सरकार की तरह सोचने लगे। उससे पहले समाज और सरकार की राय अक्सर अलग-अलग और कई बार तो एक दूसरे के समानांतर भी खड़े होते थे। ये वो दौर था जब सरकारों के किसी भी कदम को समाज की स्क्रूटनी से गुजरना पड़ता था। इस प्रक्रिया में जहां समाज नीतिगत मामलों में खुद एक स्टेक होल्डर और वॉच डॉग की भूमिका में रहता था तो वहीं सरकार भी जनता की नजर में तार्किक और भारतीय राष्ट्र राज्य के समतामूलक समाज निर्माण के घोषित लक्ष्यों की तरफ बढ़ती दिखना चाहती थी।

ये बातें हमें सुकमा में सीआरपीएफ जवानों पर माओवादी विद्रोहियों द्वारा किए गए हमले, जिसमें 26 जवानों की जान चली गई, के संदर्भ में इसलिए याद करने की जरूरत है कि इस घटना के बाद लगभग पूरी मीडिया इसके बहाने जनता को सरकार के पक्ष में खड़े होकर बदले की कार्रवाई के लिए उकसाती दिख रही है।

जनता के एक बड़े हिस्से में भी इसे ‘देश’ पर हमला माना जा रहा है।

तो क्या अब सीआरपीएफ या एनडीए-2 ही देश हैं?

ये सारी कवायद समाज को सरकार का ही एक प्रतिरूप के बतौर पेष करती है जिसके परिणाम स्वरूप समाज भी सरकार की तरह बदले की बात कर रहा है। जबकि आज समाज को सबसे ज्यादा ‘बदले’ के बजाए इस सवाल के हल के लिए सरकार पर दबाव बनाने की जरूरत थी।

जाहिर है ये तरीका समाज के हित में नहीं है और इसकी आड़ में सरकार उन नीतिगत सवालों पर किसी भी बहस को दबा देगी कि आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा सरकार के खिलाफ माओवादियों के साथ क्यों खड़ा है? आखिर उनकी मांगें क्या हैं, सरकार उनसे कोई बातचीत का दौर क्यों नहीं चला रही है जैसा कि पहले हुआ करता था?

इन सवालों का एक सिरे से गायब होना साबित करता है कि सरकार और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन सवालों से घबरा रहा है। वो शायद उस गठजोड़ के खुल जाने से डर रही है जिसके तहत आदिवासियों की जमीनों पर देशी विदेशी कारपोरेट घरानों को खनन का अधिकार सरकार दे रही है। उसे इस बात से डर है कि जो जमीनें वन विभाग की सम्पत्ति हैं और जिनकी खरीद बिक्री नहीं की जा सकती, उनको कारपोरेट घरानों को बेचने की जानकारी से जनता उसके खिलाफ जा सकती है।

इसीलिए हम देखते हैं कि ऐसी किसी भी घटना पर घटना के मूल कारणों पर बात को हर सम्भव दबा दिया जाता है।

क्या हम इस स्थिति की कल्पना कर सकते हैं कि झारखंड के कई इलाकों में सैकड़ों साल से जहां आदिवासी रह रहे हैं उन्हें बिना उनकी अनुमति तो दूर जानकारी के ही कागजों पर कारपोरेट कम्पनियों को बेच दिया गया और लोगों को अपने गांवों और घरों के बिकने की जानकारी तब मिली जब कम्पनी सरकारी सेना लेकर उन्हें विस्थापित करने के लिए आयी।

यहां जिन लोगों की सहानुभूति सीआरपीएफ के मारे गए जवानों से हैं उन्हें क्या ये सवाल सरकारों से नहीं पूछना चाहिए कि जब जमीन छीन कर कारपोरेट को ही देना है तो फिर सरकार आम गरीब परिवारों से आने वाले अपने जवानों को नाराज आदिवासियों के सामने क्यों कर रही है?

क्यों नहीं सरकार कारपोरेट कम्पनियों से कहती है कि वे अपनी निजी सेना लेकर उनके गांवों पर कब्जा करने जाएं ताकि हमारे जवान न मारे जाएं। जाहिर है ऐसा न तो सरकार कभी कहेगी और ना ही कोई कारपोरेट कम्पनी अपनी निजी सेना वहां लेकर जाएगी। क्योंकि उसे सिर्फ मुनाफे से मतलब है जिसकी गांरटी देने की जिम्मेदारी सरकार की है। इसे ही सरकार के ‘फेसेलिटेटर’ की भूमिका में आ जाना कहा जाता है।

देश के जो जवान माओवादी हिंसा में मारे जाते है उनमें से अधिकतर इसी ’कारपोरेट’ सेवा में लगाए गए होते हैं, जिसके लिए निश्चित तौर पर वे भर्ती नहीं हुए हैं। ये एक तरह का षोषण है। ये कुछ ऐसे ही है जैसे किसी सिपाही को उसका अधिकारी अपने किसी डाकू या अपराधी दोस्त की रक्षा के लिए लगा दे और लूट की किसी वारदात के दौरान प्रतिहिंसा में उसकी मौत हो जाए। ऐसी स्थिति में क्या आप उस सिपाही को ‘शहीद’ मानेंगे या भ्रष्टाचार का शिकार?

यहां अगर किसी को भी सचमुच मारे गए जवानों से सहानुभूति है तो सरकारों द्वारा उनके इस भ्रष्ट शोषण पर सवाल उठाना ही होगा। दूसरे सरकार की इस मंशा पर भी जनता को सवाल उठाना होगा कि वह इस पूरे संघर्ष को मोओवादी लड़ाके बनाम सरकारी लड़ाकों में तब्दील करने की कोशिश क्यों कर रही है? ऐसा करके वो इस मसले के नीतिगत पक्ष को क्यों कमजोर कर रही है?

मोदी सरकार में समाज के इस खुद के खिलाफ साबित होने वाले रवैया के और कठोर होने का खतरा इसलिए भी है कि उनकी खुद की ‘पैकेजिंग’ एक कठोर नेता की है। जो उन्हें किसी भी तरह बातचीत के मेज पर जाने से रोकता है क्योंकि यही उनकी यूएसपी भी है। इसके बिना वे ‘वे’ नहीं रह जाएंगे। जाहिर है उनकी यह छवि उन्हें समस्या को हल करने का कोई मौका नहीं देगी। क्योंकि ये समस्या सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक और रचनात्मक इच्छा शक्ति वाले और कारपोरेट घरानों से पूरी तरह अप्रभावित नेतृत्व की मांग करता है।

हम एक समाज के बतौर सुकमा जैसी घटना पर सिर्फ दुख और आक्रोश व्यक्त कर सकते हैं जिससे कोई हल इसलिए नहीं निकलेगा कि ये गलत दिशा में और गलत लोगों पर लक्षित है। हम अभी और भी ऐसी हिंसा और प्रतिहिंसा में अपने ही हमवतनों को अखबारी शीर्षकों में ‘शहीद’ और ‘ढेर’ होने की खबरों को सुनने को अभिशप्त हैं।

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