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Jagadishwar Chaturvedi

मैं तो हिन्दी के बिना जी नहीं सकता, पर सरकार को जलसे की जरूरत क्यों है ॽ

आज 14 सितम्बर है। सारे देश में केन्द्र सरकार के दफ्तरों में हिन्दी दिवस का दिन है। सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दी भाषा में काम करती है, उससे ज्यादा ढोल पीटती है। सरकार को भाषा से कम प्रचार से ज्यादा प्रेम है, हम लोग प्रचार को हिंदी प्रेम और हिंदी सेवा समझते हैं !

सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है। अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है, उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई।

When we make language a part of the ceremony, we make it political.

भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं। छद्म भाषायी उन्माद पैदा करने की कोशिश करते हैं। हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है। यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल (Language and politics game) शुरू होता है।

भाषा में भाषा रहे, जन-जीवन रहे, लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है। हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे-धीरे गायब होती जा रही है, दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है। भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है। हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा, उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए। यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं ! मीडिया भाषा के रूप में देखना चाहते हैं।

Hindi is our life language

हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है। हिन्दी हमारी जीवनभाषा है, वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है। हम जिस संकट से गुजर रहे हैं ,बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं। अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं।

आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं। हमने विलक्षण खाँचे बनाए हुए हैं हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बंगला का दर्द महसूस नहीं करते।

भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है। इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है।

इन दिनों हम सब अपनी -अपनी भाषा के दुखों में फंसे हुए हैं। यह सड़े हुए आदमी का दुख है। नकली दुख है। यह भाषा प्रेम नहीं, भाषायी ढोंग है। यह भाषायी पिछड़ापन है। इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे। हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें, हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं।

सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है। हिन्दीवाला बना दिया है। यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है। यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है।

हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं। हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं। लेकिन हो उलटा रहा है। तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है। प्रतिस्पर्धा पैदा की है। बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें। जीवन में भाषाप्रेम पैदा करें। सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें। किसी भी भाषा की निंदा न करें, किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें।

दुख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है, हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं।

हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है। प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती। भाषा का विकास शिक्षा से होता है। शिक्षा में हिंदी पिछड़ गयी है। फलत: समाज में भी पिछड़ गयी है।

मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है। इसके बिना मैं जी नहीं सकता। मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूँ जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूँ। हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है।

भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है, राजनीति से नहीं। भाषा में विचारधारा नहीं होती। भाषा किसी एक समुदाय, एक वर्ग, एक राष्ट्र की नहीं होती वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है। यहां मुझे रघुवीर सहाय की कविता “भाषा का युद्ध” याद आ रही है। उन्होंने लिखा-

 

“जब हम भाषा के लिये लड़ने के वक़्त

यह देख लें कि हम उससे कितनी दूर जा पड़े हैं

जिनके लिये हम लड़ते हैं

उनको हमको भाषा की लड़ाई पास नहीं लाई

क्या कोई इसलिये कि वह झूठी लड़ाई थी

नहीं बल्कि इसलिए कि हम उनके शत्रु थे

क्योंकि हम मालिक की भाषा भी

उतनी ही अच्छी तरह बोल लेते हैं

जितनी मालिक बोल लेता है

 

वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध

जो सिर्फ़ अपनी भाषा बोलेगा

मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं

चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा

बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा

वह क्या करेगा अपने गूंगे गुस्से को वह

कैसे कहेगा ? तुमको शक है

गुस्सा करना ही

गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम

वह और खोज रहा है तुम जानते नहीं ।”

जगदीश्वर चतुर्वेदी

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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