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बाजार का आंवला एवं त्रिफला असर क्यों नहीं करता?

आयुर्वेद की अधिकतर दवाइयों में आंवले के पाउडर का मिश्रण (Amla powder mixture) होता है। त्रिफला में तीन औषधीय फल (Medicinal fruit) हर्र, बहेड़ा और आंवला, बीमारी के अनुसार निर्धारित अनुपात में मिलाये जाते हैं। मुझे अनेक पेशेंट शिकायत करते हैं कि उनको त्रिफला या आंवले का उपयोग (Use of gooseberry) करने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ या उतना फायदा नहीं मिला, जितना कि त्रिफला और आंवले का सेवन करने पर मिलना चाहिये था। अनेक पुराने वैद्य भी इस बात से बहुत परेशान हैं।

आज आपको इसका कारण बतला रहा हूं। जो लोग आंवले का व्यापार करते हैं, उनका पहला मकसद धन कमाना होता है। अत: उन्हें आंवले का पाउडर बनाने या आंवले के खोल यानी गिद्दे से गुठली को अलग करने हेतु परम्परागत घियाकस पद्धति खर्चीली एवं परिश्रमपूर्ण यानी मंहगी पड़ती है। अत: वे निष्ठुरतापूर्वक मशीनों का उपयोग करते हैं। आंवले से जुड़े ऐसे कुछ तथ्य (Some facts related to Amla) प्रस्तुत हैं, जिनसे अधिकतर पेशेंट और बहुत से वैद्य तक अनजान हैं:-

किसानों द्वारा खेतों के किनारे आंवले के जो वृक्ष उगाये जाते हैं, अकसर उन खेतों में साल में दो फसलों की उपज भी होती हैं। फसलों में उर्वरक एवं कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। इस कारण आंवला ऑर्गेनिक या जैविक (Organic) नहीं रह पाता है।

अधिकतर व्यापारी किसान से मात्र 5 रुपये किलो में आंवला खरीदते हैं। अत: अधिक उपज बढाने हेतु किसान आंवले के पेड़ों में भी उर्वरकों तथा कीटनाशकों का उपयोग करते हैं।

कच्चे आंवले को परम्परागत रीति से गुठली से अलग करने हेतु आंवले को घियाकस करना होता है, जो व्यापारी को बहुत महंगा पड़ता है। अत: व्यापारी आंवले को पानी में उबालता है। जिससे आंवले की गुठली और आंवले के ऊपरी हिस्से/खोल के टुकड़े अलग-अलग हो जाते हैं।

आंवले को पानी में उबालने में उसका अर्क/रस उबलने वाले पानी में निकल जाता है, लेकिन इससे आंवला रस रहित होने के साथ ही गुण रहित भी हो जाता है। आंवले से गर्म पानी में निकले इस अर्क के मिश्रण से अनेक औषधियों के सीरप/द्रव्य बनाये जाते हैं। अत: अर्क को व्यापारी औषधि निर्मातों को बेच देता है या खुद ही द्रव्यीय औषधियों में उपयोग क्र लेता है!

परम्परागत विधि में आंवले को घियाकस करने के बाद आवंले के गिद्दे को छाया में या सूर्य की धीमी धूप में सुखाकर औषधीय उपयोग किया जाता रहा है। मगर व्यापारी आंवले को पानी में उबालने के बाद आंवले के खोल के जो टुकड़े गुठली और अर्क से अलग होते हैं, उन्हें इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों से दो मिनट में सुखाकर और फिर सामान्य यानी ठंडे करके इसी रूप में या पाउडर बनाकर थैलियों में भरकर विक्रताओं को उपलब्ध करवा देते हैं।

इस प्रकार का आंवला बाजार में मिलता है। जिससे त्रिफला बनाया जाता है। यह काफी सस्ता भी होता है, लेकिन ऐसे आंवले से बीमारियों का उपचार कैसे संभव है? यह भारत के आदिवासियों के पूर्वजों की खोज अनमोल देशी-जड़ी बूटियों के विरुद्ध व्यापारियों का खुला अत्याचार और रोगियों का सरेआम शोषण है। मगर यह स्थिति अनियंत्रित हो चुकी है, क्योंकि सरकार इस बारे में मौन है। आम लोग इसके विरुद्ध संघर्ष करने की स्थिति में नहीं हैं।

इसके विपरीत मुझ जैसे छोटे जड़ी-बूटी उपचारक, उर्वरकों तथा कीटनाशकों का उपयोग किये बिना अथक परिश्रम से आंवले के देशी वृक्ष तैयार करते हैं। जिनमें तुलनात्मक रूप से आंवलों की उपज कम होती है। आंवलों का आकार भी छोटा होता है। आंवले को घियाकस करके उसको रस सहित छाया में सुखाने पर रस या अर्क से होने वाली अतिरिक्त आय नहीं मिल पाती है। अत: पेशेंट को ऑर्गेनिक आंवला पाउडर या ऑर्गेनिक आंवला पाउडर से बना त्रिफला कई गुना महंगा पड़ता है। मगर सबसे बड़ी बात परिणाम मिलते हैं। कम से कम मैं मेरे यहां उपलब्ध सभी जड़ी बूटियों को इसी प्रकार से तैयार करवाता हूं। इसी कारण मेरे पास औषधीय पाउडर बिक्री हेतु (For Sale) यानी व्यापारिक उपयोग हेतु नहीं होकर, केवल मेरी सेवा लेने वाले रोगियों के उपचारार्थ औषधीय उपयोग हेतु ही मुश्किल से पूरे पड़ते हैं।

एक सलाह: अपने घर में ऑर्गेनिक रीति से एक देशी आंवला वृक्ष अवश्य उगायें!

आदिवासी ताऊ डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा

वैधानिक सूचनाः यहां दी गयी सामग्री केवल पाठकों के ज्ञानवर्धन और जागरूकता हेतु दी गयी है। अपने योग्य स्थानीय चिकित्सक की राय के बिना खुद अपना उपचार नहीं करें।

Why does Amla and Triphala made by the market not affect?

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