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Irfan Engineer

हिंदुत्व को प्यार से क्यों नफरत है?

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का ‘विदेशियों’ से घृणा करो जिहाद-2
हिंदुत्ववादियों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि दो समुदायों के सदस्यों के बीच सद्भाव या प्रेम के रिश्ते बनें। उन्हें यह बिल्कुल नहीं भाता कि हिंदुओं और ‘शत्रु समुदायों’ के आराधना के तरीकों, संस्कृति या सभ्यता में कुछ भी समान हो। वे बिल्कुल नहीं चाहते कि दोनों समुदायों के सदस्य एक ही मोहल्ले में रहें या उनमें आपसी वैवाहिक रिश्ते बने। हिंदुत्व पर अपनी पुस्तक में सावरकर लिखते हैं,

‘‘हमारे और हमारे शत्रु के बीच जितनी समानतायें होंगी, हमारे लिए शत्रु का विरोध करना उतना ही मुश्किल होता जायेगा। जिस शत्रु से हमारी कुछ भी समानता न हो, उसका हम सबसे मजबूती से विरोध कर सकते हैं।’’

किसी भी प्रकार की समानता न बन सके और यदि हो, तो उसे समाप्त कर दिया जाये, इसके लिए दूसरे समुदायों को बदनाम करने के अभियान चलाये जाते हैं, जिनमें हिंसा का भी इस्तेमाल होता है। छोटे-मोटे अंतरों जैसे खानपान की आदतों, को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। यह धारणा कि मुसलमान व ईसाई ‘हम’ से एकदम अलग हैं उन इलाकों में अधिक मजबूत है जहां सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास है। इसका सबसे ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर है। सितंबर 2013 में वहां भड़की हिंसा के पहले तक, इलाके के जाटों और मुसलमानों की एक जैसी परंपराएं और सामाजिक रीतिरिवाज थे। वे एक ही बोली बोलते थे और यहां तक कि दोनों में ही सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध था। अंतर केवल एक था-और वह यह कि वे अलग-अलग जगहों पर अपने खुदा की इबादत करते थे। दंगों के बाद जब हम मुजफ्फरनगर गए तो हमने पाया कि वहां के हालात एकदम बदल चुके हैं। गांवों के लोग अब ‘वे’ और ‘हम’ की भाषा में बात करने लगे थे। सांप्रदायिक हिंसा की हर घटना के बाद, संबंधित शहर में मिलीजुली आबादी वाले मोहल्ले कम हो जाते हैं और लोग ऐसे इलाकों में रहना पसंद करने लगते हैं जहां उनके समुदाय के लोग अधिक संख्या में हों। सन् 1993 के दंगों के बाद मुंबई में भी यही हुआ। मीरा रोड और मुंबरा में मुसलमानों की बड़ी-बड़ी बस्तियां बन गईं। इन बस्तियों में आपको ढूंढने पर भी कोई हिंदू घर नहीं मिलेगा। हाल में प्रवीण तोगडि़या ने एक ऐसे मुसलमान के विरूद्ध हिंसा करने के लिए भीड़ को उकसाया जिसने एक हिंदू इलाके में फ्लैट खरीदा था। यहां तक कि यह धमकी भी दी गई कि अगर उसने यह फ्लैट नहीं छोड़ा तो फ्लैट पर जबरन कब्जा कर लिया जायेगा।

हम जिस समुदाय को हिन्दू कहते हैं, वह, दरअसल एक विविधवर्णी समाज है, जिसके सदस्य कई भाषाएं बोलते हैं, 33 करोड़ अलग-अलग देवी-देवताओं की आराधना करते हैं व जिसमें नास्तिक भी शामिल हैं। उनके विभिन्न समूहों के अलग-अलग दर्शन हैं, जिनमें मूलभूत अंतर हैं। उनके कई धार्मिक ग्रंथ हैं और वे असंख्य जातियों में विभाजित हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना बहुत कठिन है। हिंदुत्व का लक्ष्य यह था कि जहां एक ओर इस विविधता के महत्व को कम किया जाए, वहीं दूसरी ओर, जातिगत ऊँचनीच को मजबूती दी जाए। सावरकर के शब्दों में, ‘‘अगर भारत को अपनी आत्मा के अनुसार अस्तित्व में बने रहना है, चाहे आध्यात्मिक तौर पर या राजनैतिक दृष्टि से, तो उसे वह ताकत नहीं खोनी चाहिए जो राष्ट्रीय और नस्लीय एकता से मिलती है।’’ जातिगत ऊँचनीच को बनाए रखते हुए, राष्ट्रीय और नस्लीय एकता स्थापित करने के लक्ष्य को पूरा करने का तरीका सावरकर ने 1923 में हिंदुत्व पर लिखी अपनी पुस्तक में बताया है। उनका कहना है कि देश में उन लोगों की रगों में एक खून बह रहा है जिनकी पुण्यभूमि सिंधुस्तान में है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने एक खून और नस्लीय शुद्धता पर आधारित राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को हिटलर से लिया है।

एक समस्या यह थी कि इस एक खून वाले सिद्धांत से वह वर्ग प्रभावित नहीं होता जो जाति के पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर था और जिसका दर्जा जानवरों से भी नीचा था और जिसे रोजाना अपमान झेलने पड़ते थे। इसलिए इस विविधतापूर्ण समाज को हिन्दू राष्ट्र के सांचे में ढालने के लिए यह जरूरी था कि एक समान शत्रु का निर्माण किया जाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में हिंसा के इस्तेमाल से हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को कोई परहेज नहीं था।

यही कारण है कि इन संगठनों के लिए अंतर्धार्मिक विवाह एक बड़ा मुद्दा हैं। अगर अंतर्धार्मिक विवाह होंगे तो वे हिंदुओं जैसे विविधवर्णी समुदाय को एक राष्ट्र व एक नस्ल का स्वरूप नहीं दे सकेंगे। सावरकर ने बहुत पहले कहा था कि अपने शत्रु और स्वयं में किसी भी प्रकार की समानता को ढूंढने से राष्ट्र कमजोर होता है। उनकी पुस्तक में म्लेच्छों द्वारा साधुओं की लड़कियों का अपहरण करने की चर्चा है।

विभाजन के बाद हुए खूनी दंगों के पश्चात, भारत में पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा, जबलपुर में सन् 1961 में हुआ था जब ऊषा भार्गव नाम की एक लड़की, एक बड़े मुस्लिम बीड़ी व्यापारी के लड़के के साथ चली गई थी। मीडिया में इस घटना का बहुत आक्रामक ढंग से प्रस्तुतिकरण हुआ और यह आरोप लगाया गया कि मुस्लिम युवक ने ऊषा भार्गव के साथ बलात्कार किया है। इस दुष्प्रचार से तंग आकर ऊषा भार्गव ने आत्महत्या कर ली।

सन् 1998 में गुजरात के पंचमहल जिले के रणधीकपुर और बारडोली में अंतर्धार्मिक विवाहों के बहाने दंगे भड़काये गये। विहिप ने बिना किसी सुबूत के यह आरोप लगाया कि रणधीकपुर में मुस्लिम युवक, हिन्दू लड़कियों को अगवा कर उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं। उस छोटे से गांव में रहने वाले 60-70 मुस्लिम परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए गांव से भागना पड़ा। वे तीन महीनों तक अपने गांव नहीं लौट सके। बारडोली में जून 1998 में वर्षा शाह और हनीफ मेमन ने शादी कर ली। इसके बाद इस भाजपा शासित प्रदेश में हिंदुत्व की विचारधारा के अनुरूप, यह कानून बना दिया गया कि अंतर्धार्मिक विवाह के पंजीकरण के पूर्व,  प्रशासन से अनुमति लेना आवश्यक होगा। अगर किसी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन को ऐसा विवाह होने की सूचना मिलती है तो वे इतना हंगामा खड़ा कर देते हैं कि अगर लड़का-लड़की और उनके माता-पिता विवाह के लिए राजी हों तब भी विवाह नहीं हो पाता।

हाल में अहमदाबाद में मुस्लिम महिलाओं के लिए आयोजित एक कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने बताया कि गुजरात में अंतर्धार्मिक विवाह करना असंभव है। हमें बताया गया कि ऐसे युगलों के लिए एकमात्र रास्ता यह है कि वे किसी दूसरे राज्य में भाग जायें और वहां शादी कर लें। परंतु इससे उनके परिवार और विशेषकर ‘शत्रु समुदाय’ के परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। उन्हें अपना कामकाज भी छोड़ना पड़ता है। किसी दूसरे राज्य में जाकर रोजगार पाना आसान नहीं होता और ना ही अपने परिवार से नाता तोड़ लेना और मुसीबत के समय अपने समुदाय से सहायता मिलने की उम्मीद समाप्त कर लेना सब के लिए संभव होता है।

बाबू बजरंगी को ऐसे प्रेमी युगलों को अलग करने में विशेषज्ञता हासिल थी। तरीका बहुत आसान था। लड़के के विरूद्ध अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज करो और गुजरात पुलिस को उसके पीछे लगा दो। उसे पकड़ने के बाद उसका इस ढंग से ‘इलाज’ करो कि प्रेमी युगल के सामने अलग होने के सिवाए कोई रास्ता न बचे।

-इरफान इंजीनियर

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

अगले अंक में जारी ………

पिछली किस्त यहां पढ़ें-
हिन्दुत्ववादी संगठनों का ‘विदेशियों’ से “हेट जिहाद”
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Irfan Engineer, writer is Director, Centre for Study of Society and Secularism.

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